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दिल्ली एआई सम्मेलन में रोबोट पर विवादः रोबोटिक्स में अमेरिका और चीन के मुक़ाबले कहां खड़ा है भारत?

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Source :- BBC INDIA

एआई इम्पैक्ट समिट

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दिल्ली में जारी एआई समिट के दौरान एक निजी यूनिवर्सिटी के रोबोट को लेकर किए गए दावे पर विवाद हुआ.

इसके बाद बहस ये शुरू हो गई कि भारत एआई और रोबोटिक्स के क्षेत्र में कहां खड़ा है और क्या इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त क़दम उठाए जा रहे हैं.

ग्रेटर नोएडा की गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एआई सम्मेलन के दौरान चीन में निर्मित एक रोबोट को अपना डेवलपमेंट बताकर पेश किया, जिसे लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया.

हालांकि, गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने बाद में सफ़ाई देते हुए कहा कि संस्थान ने इस रोबोट का निर्माण करने का दावा नहीं किया है.

बीते कुछ साल में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित तकनीक और उत्पादों के क्षेत्र में दुनियाभर में उल्लेखनीय प्रगति हुई है.

अमेरिका और चीन की कंपनियां फ़िलहाल इस दौड़ में सबसे आगे हैं.

अब कृषि से लेकर मेडिकल और उत्पादन तक हर क्षेत्र में एआई और रोबोटिक्स का इस्तेमाल हो रहा है.

भारत में भी इस क्षेत्र में क़दम उठाए जा रहे हैं लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अभी काफ़ी कुछ करने की ज़रूरत है.

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में रोबोटिक्स अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है और इसे अभी एक विकसित हो रहे इकोसिस्टम के रूप में देखा जा रहा है.

पिछले 20 सालों से रोबोटिक्स के क्षेत्र में काम कर रहे और आईआईटी मंडी में रोबोटिक्स के प्रोफ़ेसर अमित शुक्ला के मुताबिक़ भारत के पास तकनीकी क्षमता और प्रतिभा होने के बावजूद इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी चुनौतियां इस क्षेत्र की रफ़्तार को सीमित कर रही हैं.

रोबोटिक्स के विशेषज्ञ प्रोफेसर अमित शुक्ला कहते हैं, “रोबोटिक्स और कुछ नहीं, बल्कि ‘एआई की आत्मा का एक रोबोटिक शरीर खोजने’ जैसा है. यह एक कठिन क्षेत्र है, क्योंकि इसमें इंजीनियरिंग की लगभग हर शाखा के समन्वय की आवश्यकता होती है.”

एआई समिट

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अभी रोबोटिक्स में भारत कहां है?

भारत ने 1980 के दशक में रोबोटिक्स की दिशा में पहले क़दम उठाए थे. आज भारत के आईआईटी संस्थानों में अलग रोबोटिक्स लैब हैं लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक़ भारत में रोबोटिक्स अभी शुरुआती चरण में है और बिखरा हुआ है.

अमित शुक्ला कहते हैं, “अमेरिका ने 1950 के दशक में रोबोटिक्स शुरू किया था, जबकि भारत में पहली लैब 1980 के दशक में आईआईटी कानपुर में बनी. हम इस दौड़ में लगभग 20 से 30 साल पीछे हैं, लेकिन अब हम तेज़ी से इस दूरी को कम कर रहे हैं.”

हालांकि, उत्पादन और अन्य क्षेत्रों में रोबोट के इस्तेमाल के मामले में भारत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है.

इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रोबोटिक्स (IFR) के आंकड़ों के अनुसार, भारत अब औद्योगिक रोबोट स्थापना के मामले में दुनिया के प्रमुख बाज़ारों में शामिल हो चुका है, जहाँ हर साल लगभग 9 हज़ार नए रोबोट लगाए जा रहे हैं.

यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और वेयरहाउस ऑटोमेशन जैसे क्षेत्रों में देखी जा रही है.

रेयर अर्थ रिसायक्लिंग जैसे क्षेत्रों में भी आज रोबोट का इस्तेमाल भारत में शुरू हो गया है. भारत की शीर्ष रेयर अर्थ रिसायक्लिंग कंपनियों में शामिल अटेरो के संस्थापक नितिन गुप्ता बताते हैं, “भारत अब इंडस्ट्रियल रोबोट इंस्टॉलेशन के मामले में दुनिया के शीर्ष छह बाजारों में शामिल है, जहाँ सालाना 9,000 से अधिक इकाइयाँ तैनात की जा रही हैं.”

”अटेरो इस गति का उपयोग हाई-प्रिसिजन रीसाइक्लिंग में कर रहा है, जहाँ रोबोटिक बैटरी कटिंग, ऑटोमेटेड डिस्मेंटलिंग लाइन्स और एआई-सक्षम प्रोसेस कंट्रोल अब मैन्युअल ऑपरेशन्स की जगह ले रहे हैं.”

नितिन गुप्ता के मुताबिक़ इस बदलाव ने मुख्य वर्कफ्लो में उत्पादन क्षमता को 50 से 60 प्रतिशत तक बेहतर बना दिया है, साथ ही हाई-वोल्टेज लिथियम-आयन बैटरी को संभालने में सुरक्षा को भी काफी मजबूत किया है.

नितिन गुप्ता कहते हैं, “हमारी रुड़की सुविधा में, मेक्ट्रोनिक कटिंग सिस्टम और इंटेलिजेंट मटेरियल हैंडलिंग जटिल वेस्ट स्ट्रीम्स में निरंतरता और ट्रैसेबिलिटी लाते हैं. जैसे-जैसे ईवी निर्माण का विस्तार होगा, औद्योगिक स्तर पर महत्वपूर्ण सामग्रियों की विश्वसनीय और उच्च-क्षमता वाली रिकवरी प्राप्त करने में रोबोटिक्स की केंद्रीय भूमिका होगी.”

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मान रहे हैं कि रोबोटिक्स के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए भारत को अभी लंबा रास्ता तय करना होगा. प्रति दस हज़ार कर्मचारियों पर रोबोट की संख्या के मामले में भारत अभी चीन, दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसे देशों से काफी पीछे है.

भारत एआई, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और रोबोट्स को ट्रेन करने के मामले में तो आगे बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी रोबोट के निर्माण में जरूरी उपकरणों के लिए बाहरी देशों पर निर्भर है.

प्रोफ़ेसर अमित शुक्ला कहते हैं, “भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती एक मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की कमी है. हम आज भी मोटर्स, कंट्रोलर, चिप्स और सेंसर्स के लिए चीन पर निर्भर हैं.”

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में रोबोट उत्पादन इकोसिस्टम विकसित करने में सबसे बड़ी चुनौती संसधानों की कमी है.

प्रोफ़ेसर शुक्ला कहते हैं, “चीन के एक विश्वविद्यालय का बजट भारत के सभी आईआईटी के संयुक्त बजट से पाँच गुना अधिक हो सकता है, जो संसाधनों के भारी अंतर को दर्शाता है.”

इसका एक बड़ा कारण निजी निवेश की कमी भी है. प्रोफ़ेसर अमित शुक्ला कहते हैं, “हमें अपनी ‘गरीबी की मानसिकता’ और नौकरशाही से बाहर निकलना होगा. अमेरिका में जोख़िम उठाने वाली पूंजी बहुत अधिक है; वहां 10% सफलता की संभावना पर भी फंडिंग मिल जाती है जबकि भारत में निवेशक अक्सर 200% गारंटी की तलाश करते हैं.”

प्रोफ़ेसर शुक्ला ने रोबोटिक्स के क्षेत्र में एक स्टार्ट अप भी शुरू किया है. उन्हें सरकारी स्तर पर तो समर्थन मिल रहा है, लेकिन अभी भी निजी निवेश की कमी है.

प्रोफ़ेसर शुक्ला कहते हैं, “भारत में अगर आप आईटी, एआई या सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में स्टार्ट अप लाते हैं तो निवेश की संभावना अधिक होती है क्योंकि इन क्षेत्रों में जोख़िम कम है. लेकिन रोबोटिक्स के क्षेत्र में जोख़िम बहुत अधिक है, ऐसे में निवेशक भारी पूंजी लगाने में झिझक रहे हैं.”

इंडिया एआई

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भारत में कहां हो रहा है काम?

भारत में रोबोटिक्स रिसर्च और इनोवेशन का नेतृत्व मुख्यतः आईआईटी जैसे शीर्ष तकनीकी संस्थान और तेजी से उभरते स्टार्टअप्स कर रहे हैं.

आईआईटी मद्रास, आईआईटी दिल्ली और आईआईटी कानपुर जैसे संस्थानों में रोबोटिक्स के लिए समर्पित रिसर्च लैब और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित हैं, जहाँ अंडरवॉटर रोबोटिक्स, ड्रोन, मोबाइल रोबोट और औद्योगिक ऑटोमेशन पर काम हो रहा है.

मिसाल के तौर पर आईआईटी मद्रास की रोबोटिक्स लैब मोबाइल और मेडिकल रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में शोध कर रही है, जबकि आईआईटी दिल्ली का बायोलॉजिकली इंस्पायर्ड रोबोट्स एंड ड्रोन्स सेंटर बहु-विषयी रोबोटिक्स विकास पर केंद्रित है.

दूसरी ओर, एडवर्ब, ग्रेओरेंच, अति मोटर्स, जेनरोबोटिक्स और सिस्टेमेंटिक्स जैसे भारतीय स्टार्टअप्स वेयरहाउस ऑटोमेशन, स्वायत्त मोबाइल रोबोट और औद्योगिक रोबोटिक्स में अग्रणी बनकर उभरे हैं और वैश्विक बाजार में भी अपनी पहचान बना रहे हैं.

हालांकि, इस क्षेत्र में भारतीय कंपनियों को उच्च शोध और विकास (आर एंड डी) निवेश की कमी, हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की सीमाएँ, विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा और कुशल हार्डवेयर इंजीनियरों की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे भारत अभी रोबोटिक्स में चीन और अमेरिका जैसी महाशक्तियों से काफ़ी पीछे है.

वैश्विक स्तर पर रोबोटिक्स उद्योग पर जापान, यूरोप, अमेरिका और अब तेजी से उभरते चीन की कंपनियों का दबदबा है.

एबीबी (स्विट्ज़रलैंड), फानुक और यसकावा (जापान), कूका (जर्मनी), बॉस्टन डॉयनेमिक्स और इंट्यीटुव सर्जिकल (अमेरिका) जैसी कंपनियाँ औद्योगिक ऑटोमेशन, मेडिकल रोबोटिक्स और उन्नत एआई-आधारित मशीनों में तकनीकी नेतृत्व कर रही हैं.

इन कंपनियों की ताक़त मजबूत मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम, भारी शोध एवं विकास निवेश और दशकों की इंजीनियरिंग विशेषज्ञता है.

इसके मुक़ाबले भारत की रोबोटिक्स कंपनियाँ अभी शुरुआती विकास चरण में हैं, जहाँ एडवर्व, ग्रेओरेंट, अति मोटर्स और सिस्टेमेंटिक्स जैसी स्टार्टअप्स वेयरहाउस ऑटोमेशन, मोबाइल रोबोट और इंडस्ट्री 4.0 समाधानों पर काम कर रही हैं, लेकिन वैश्विक दिग्गजों के मुक़ाबले उनका पैमाना और निवेश सीमित है.

विशेषज्ञों के मुताबिक़, भारतीय कंपनिया हार्डवेयर निर्माण में अक्सर आयातित तकनीक पर निर्भर रहती हैं, जबकि उनकी असली प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त सॉफ्टवेयर, एआई एल्गोरिद्म और सिस्टम इंटीग्रेशन में दिखाई देती है. इसलिए वैश्विक तुलना में भारत अभी रोबोटिक्स का अग्रणी निर्माता नहीं, बल्कि तेज़ी से उभरता हुआ खिलाड़ी माना जाता है, जो सही निवेश और नीति समर्थन मिलने पर आने वाले सालों में अपनी स्थिति मज़बूत कर सकता है.

प्रोफ़ेसर अमित शुक्ला कहते हैं, “हमें अपनी क्षमताओं का ईमानदार मूल्यांकन करना चाहिए. यह सच है कि भारत ज्यादातर हार्डवेयर बाहर से ख़रीदता है. हमारी असली ताक़त एआई एप्लिकेशन, सॉफ्टवेयर और इंटेलिजेंस बनाने में है, और हमें उसी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए बजाय उन चीजों का श्रेय लेने के जो हमने नहीं बनाईं.”

एआई समिट

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सरकार क्या क़दम उठा रही है?

वैश्विक महाशक्तियों के मुक़ाबले भले ही भारत अभी एआई और रोबोटिक्स के क्षेत्र में पीछे हो, लेकिन हाल के सालों में भारत सरकार ने इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए कई नीतिगत प्रयास किए हैं.

भारत सरकार ने रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को रणनीतिक तकनीक के रूप में देखते हुए कई नीतिगत पहल की है, जिनका उद्देश्य भारत को वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में आगे लाना है.

नीति आयोग द्वारा जारी नेशनल स्ट्रेटेजी फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई फॉर ऑल) दस्तावेज़ में एआई को आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख साधन बताते हुए स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, स्मार्ट शहर और मोबिलिटी जैसे पाँच प्राथमिक क्षेत्रों की पहचान की गई थी.

सरकार ने इंडियाएआई मिशन शुरू किया, जिसका लक्ष्य देश में कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा प्लेटफॉर्म, स्किलिंग और स्वदेशी एआई मॉडल विकास को बढ़ावा देना है, ताकि “एआई संप्रभुता” और तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके.

रोबोटिक्स क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय (MeitY) की तरफ़ से जारी नेशनल स्ट्रेटेजी ऑन रोबोटिक्स भारत को 2030 तक वैश्विक रोबोटिक्स हब बनाने की दिशा में मैन्युफैक्चरिंग, कृषि, स्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों में रोबोटिक्स अपनाने पर जोर देती है.

सरकार के आधिकारिक बयानों में यह भी कहा गया है कि रोबोटिक्स को राष्ट्रीय मिशनों के लिए “फ़ोर्स मल्टीप्लायर” के रूप में देखा जा रहा है, जो हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग और औद्योगिक विकास को गति देगा.

इसके साथ ही डिजिटल इंडिया, स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रमों और एआई गवर्नेंस गाइडलाइंस के जरिए सरकार ज़िम्मेदार और मानव-केंद्रित एआई इकोसिस्टम बनाने की कोशिश कर रही है, ताकि नवाचार और नियमन के बीच संतुलन कायम रखा जा सके.

पीआईबी में दी गई जानकारी के मुताबिक़ केंद्र सरकार ने साल 2024 में इंडियाएआई मिशन के लिए लगभग ₹10,372 करोड़ का कुल बजट दिया है जो देश में एआई कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा प्लेटफॉर्म और रिसर्च इकोसिस्टम को मज़बूत करने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है. ये बजट पांच सालों के लिए है.

इसके अलावा एआई सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, सुपरकंप्यूटिंग मिशन और सेमीकंडक्टर मिशन जैसी योजनाओं के जरिए तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिश की जा रही है.

हालांकि तुलना करें तो अमेरिका में संघीय स्तर पर ही गैर-रक्षा एआई अनुसंधान पर सालाना लगभग 3.3 अरब डॉलर का निवेश किया जा रहा है, जबकि निजी क्षेत्र का निवेश इससे कई गुना अधिक है.

वहीं चीन ने राज्य-प्रेरित औद्योगिक नीति के तहत बड़े पैमाने पर शोध एवं विकास निवेश बढ़ाया है और कई रिपोर्टों के अनुसार उसका कुल शोध खर्च अमेरिका के बराबर या उससे आगे निकलने की दिशा में है, जिससे AI और रोबोटिक्स में तेज़ प्रगति संभव हुई है.

विश्लेषकों के मुताबिक़ इस संदर्भ में देखा जाए तो भारत की रणनीति अभी “टार्गेटेड और सीमित संसाधनों वाली” मानी जाती है, जहाँ फोकस बड़े पैमाने की हार्डवेयर प्रतिस्पर्धा के बजाय एआई एप्लिकेशन, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टार्टअप इकोसिस्टम पर अधिक दिखाई देता है.

प्रोफ़ेसर अमित शुक्ला कहते हैं, “मैं भारत में रोबोटिक्स और एआई के भविष्य को लेकर बहुत आशावादी हूँ. सरकार ने स्टार्टअप इंडिया जैसी पहलों के माध्यम से माहौल बदला है, जिससे अब रिसर्च केवल पब्लिकेशन तक सीमित नहीं है बल्कि प्रोडक्ट बनाने पर जोर दिया जा रहा है. अब हमारी कार्यक्षमता को चीन और अमेरिका के बराबर कुशल बनाने की जरूरत है.”

हालांकि प्रोफ़ेसर अमित शुक्ला इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि भारत को बड़े पैमाने पर लोगों को प्रशिक्षित करने की भी ज़रूरत है.

वो कहते हैं, “जब तक हम बड़े पैमाने पर जनशक्ति (मैनपॉवर) को प्रशिक्षित नहीं करेंगे, हम चीन और अमेरिका के स्तर तक नहीं पहुँच पाएंगे. केवल डिग्री देना काफ़ी नहीं है, हमें वास्तविक लैब और विशेषज्ञ फैकल्टी की आवश्यकता है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS