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इंडिया-अमेरिका ट्रेड डील के बाद जम्मू -कश्मीर में ड्राई फ्रूट्स और सेब का उत्पादन करने वाले भी चिंता में हैं.
इस व्यवसाय से जुड़े सभी लोग डील को अपने लिए एक बड़े झटके के तौर पर महसूस कर रहे हैं.
उन्हें डर है कि ज़ीरो ड्यूटी पर आने वाले अमेरिकी सेब और ड्राई फ़्रूट्स की वजह से उनका बाज़ार ख़त्म हो जाएगा.
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री भी इस चिंता में शामिल हैं लेकिन फ़िलहाल इस समस्या का हल किसी के पास नज़र नहीं आ रहा है.
बड़गाम ज़िले के कनिहामा के रहने वाले मोहम्मद अयूब का परिवार कई पीढ़ियों से सेब की खेती करता आया है.
उनके घर के सभी खर्चे इसी काम से चलते आए हैं. हालाँकि, बीते कुछ वर्षों में उन्हें कुछ मुश्किलें भी आई हैं. अब उन्हें एक नई मुश्किल सिर पर मंडराती दिख रही है और वह है भारत और अमेरिका की ट्रेड डील.
अयूब कहते हैं, “आने वाला समय हमारे लिए काफ़ी मुश्किल है. इस उद्योग से जुड़ा हर एक शख्स प्रभावित होगा. अभी दस किलो सेब के डिब्बे की कीमत एक हज़ार तीन सौ रुपये हैं. जब वहां से (अमेरिका से) माल आएगा तो वह यहां पर आठ सौ या 9 सौ में दस किलो बिकेगा. इससे खुद ब खुद हमारे काम पर असर पड़ेगा. अपने सेब के बागों में हम जो पेस्टीसाइड्स इस्तेमाल करते हैं वे काफ़ी महंगे हैं, आने वाले दिनों में उसके दाम और भी बढ़ेंगे, लेकिन हमारे सेब के दाम घट जाएंगे.”
वह कहते हैं, “इंडिया और अमेरिका की जो ट्रेड डील से हमारे अंदर काफ़ी मायूसी पैदा हो गई है. इस समय सेब का मार्केट बेहतर होने के बावजूद हमारे खर्चे पूरे नहीं होते हैं, जब दाम ही गिर जाएंगे तो फिर ज़रूरतों को पूरा कैसे किया जा सकता है? सेब की खेती करने वाले किसानों को आने वाले समय में अपने बागों को काटना पड़ेगा.”
मोहम्मद अयूब के पास क़रीब 12 हेक्टर ज़मीन पर सेब के बाग़ हैं. वह कहते हैं, “जब मुझ जैसे बड़े बाग़ वाले पर डील से आर्थिक असर पड़ेगा, तो उन किसानों का क्या होगा जनके छोटे-छोटे बाग़ हैं.”
हालांकि इस ट्रेड डील की इन डीटेल्स के बारे में अभी ज़्यादा जानकारी नहीं है और इस बात की पुष्टि अभी नहीं की जा सकती कि वाकई इस डील से सेब किसानों को नुक़सान होगा या नहीं.
ट्रेड डील से क्यों है डर
भारत और अमेरिका ने इस महीने की शुरुआत में एक संयुक्त बयान जारी कर बताया था कि अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे को अंतिम रूप दिया गया है.
बताया गया है कि अमेरिका से आने वाले ड्राई फ्रूट और सेब पर कस्टम ड्यूटी ज़ीरो रहेगी.
इसी वजह से सेब और ड्राइ फ़्रूट्स के कारोबार से जुड़े लोगों को आशंका है कि जब बाहर से सेब और दूसरे ड्राई फ्रूट ज़ीरो कस्टम ड्यूटी पर भारत के बाजार में आएंगे तो जम्मू-कश्मीर के प्रोडक्ट कम दामों पर बाजार में बेचे जाएंगे जिसके कारण यहाँ के प्रोडक्ट्स को भारी नुक़सान होगा..
जम्मू -कश्मीर की जीडीपी में यहां का सेब उद्योग सात से आठ प्रतिशत तक योगदान देता है. कश्मीर में केवल सेब उद्योग के साथ कम से कम सात लाख लोग किसी न किसी तरह जुड़े हैं.
कश्मीर फ्रूट ग्रोवर्स एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष शहीद लतीफ़ चौधरी कहते हैं, “इस वक़्त अगर दिल्ली के मार्किट में हमारा सेब सौ रूपये के हिसाब से बिक रहा है. बाहर का सेब भारत के बाज़ार में आने के बाद 80-85 रुपए में बिकेगा तो हमारा सेब 40-45 रुपये में बिकने लगेगा. हमें लगता है कि बाहर का सेब आने के बाद किसान गुज़ारा नहीं कर पाएगा.”
वह कहते हैं, “हमें तो बचने की कोई सूरत ही नज़र नहीं आ रही है. अब तो हम केंद्र सरकार से गुज़ारिश कर रहे हैं कि हमें बचाए. हमारा किसान खत्म हो जाएगा. बीते साल रास्ता बंद हो गया था तो सेब उद्योग को दो हज़ार करोड़ का पहले ही नुकसान हो चुका है. अभी तक हम उस नुकसान से उबर नहीं पा रहे हैं. अब यह डील सामने आ गई.”
“बताया जा रहा है कि मार्च से बाहर का माल आना शुरू हो जाएगा. हमारा भी अभी माल स्टोरेज में पड़ा है. मार्च में हमारा भी प्रोडक्ट बाज़ार में आएगा. जब क़ीमत ही अच्छी नहीं मिलेगी तो किसान , दुकानदार और दूसरे लोगों पर सीधा असर पड़ेगा. हिमाचल के सेब कारोबारी इस डील को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे.”
बीते साल सेब के सीज़न में श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग कई दिनों तक ख़राब मौसम के कारण बंद रहा था और सेब से लदे ट्रकों के अंदर सेब सड़ गया था. इससे सेब उद्योग को भारी नुकसान उठाना पड़ा था.
हम एक बार फिर बता दें कि इस ट्रेड डील की इन डीटेल्स के बारे में अभी ज़्यादा जानकारी नहीं है और इस बात की पुष्टि अभी नहीं की जा सकती कि वाकई इस डील से सेब किसानों को नुक़सान होगा या नहीं.
जम्मू -कश्मीर सरकार ने क्या कहा
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बीते दिनों जम्मू -कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने इंडिया-अमेरिका ट्रेड डील से कश्मीर के ड्राई फ्रूट्स और सेब उद्योग को होने वाले नुकसान पर जम्मू -कश्मीर विधानसभा में कहा कि इस डील से हमारे तीनों उद्योगों को नुक़सान उठाना पड़ेगा.
उन्होंने कहा, “मैं अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि जम्मू -कश्मीर के लिए यह कहाँ से अच्छा हुआ. जिन चीज़ों को आप एंट्री फ्री करने दे रहे हो, उनमें आपने क्या डाला है- ट्री नट्स. ट्री नट्स क्या होते हैं, अखरोट ,बादाम जो जम्मू -कश्मीर की पैदावार है, आपने ड्राई फ्रूट्स उसमें डाला है, वह भी जम्मू -कश्मीर से ,ज़ीरो ड्यूटी पर.”
मुख्यमंत्री ने कहा, “हम यहाँ हॉर्टिकल्चर को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं, रूरल इकॉनमी को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं, ज़ीरो ड्यूटी पर आप ने अमेरिका से कहा कि आप फल यहाँ भेज दीजिए, हम यहाँ उसको खरीदने की बात करेंगे. तो कहाँ गई इनकी हमदर्दी जम्मू -कश्मीर के लिए. आप ने अखरोट और बादाम का सौदा तो कर दिया, कम से कम सेब को बचाते.”
ड्राई फ्रूट कारोबारियों की चिंताएं?
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श्रीनागर की परिमपोरा फल और सब्ज़ी मंडी में ड्राई फ्रूट की दुकान चलाने वाले फ़ारूक़ अहमद कहते हैं कि कई वर्षों से कश्मीर का ड्राई फ्रूट उद्योग बीमार है, क्योंकि चीन और चिली से भी ड्राई फ्रूट यहाँ आ रहा है जिसके कारण हमारे ड्राई फ्रूट की मार्किट में वैल्यू ही ख़त्म हो गया है. उनका कहना था कि अब जो इंडिया-अमेरिका की ट्रेड डील हुई है वह ड्राई फ्रूट उद्योग के लिए नया झटका है.
वह कहते हैं, “यहाँ से जब माल जाएगा तो उस पर टैक्स लगेगा. बाहर से माल आएगा तो उस पर टैक्स नहीं लगेगा. यह तो अमेरिका के किसानों के लिए फ़ायदेमंद है. इस डील से यहाँ के उद्योग को बहुत नुकसान होगा. जब इम्पोर्ट ड्यूटी खत्म होगी तो हमारे प्रोडक्ट की वैल्यू नहीं रहेगी. यहाँ सेब ,अखरोट और बादाम तीन प्रोडक्ट हैं. ये तीनों उद्योग इस डील के शिकार होंगे. हमारा ड्राई फ्रूट उद्योग तो पहले ही जूझ रहा है अब इस डील से ये ख़त्म ही हो जाएगा.”
फ़ारूक़ अहमद की मांग है कि केंद्र सरकार और केंद्र शासित प्रदेश की सरकार ऐसा कोई क़दम उठाए ताकि हम नुकसान से बच सकें.
अखरोट के मार्केट की क्या है हालत?
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श्रीनगर के मुनिवारा इलाके में अखरोट का कारखाना चलाने वाले नूर मोहम्मद के लिए इस डील से कोई ख़ास बदलाव नज़र नहीं आ रहा है. वह बताते हैं कि कश्मीर में अखरोट के प्रोडक्शन में सख्त कमी आई है और मांग बहुत ज़्यादा है.
वह कहते हैं कि जब बाज़ार में हमारा अखरोट है ही नहीं तो ट्रेड डील से अब अखरोट उद्योग पर क्या फ़र्क़ पड़ सकता है! नूर के अनुसार उनके पास पूरे साल खरीदारों के आर्डर होते हैं ,लेकिन माल नहीं होता.
वह इसकी वजह भी बताते हैं, “यहां वॉलनट वुड इंडस्ट्री के लिए हर साल हज़ारों अखरोट के दरख़्त काटे जाते हैं. किसान को नए दरख़्त लगाने की तरफ रुझान ही नहीं है. किसान लोग सेब के बाग़ बनाने में ज़्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं. यही वजह है कि अखरोट के प्रोडक्शन कम हो गई है. हमारे पास सिर्फ एक महीने के लिए माल होता है और एक महीने के बाद ख़त्म हो जाता है.”
कश्मीर के ग्रामीण इलाकों में अखरोट और बादाम की फसल सबसे ज़्यादा हुआ करती थी.
ट्रेड डील पर सरकार का रुख़
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भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम ट्रेड डील में भारत की ओर से कई खाद्य और कृषि उत्पादों पर टैरिफ़ ख़त्म करने की ख़बर के बीच किसान संगठनों ने विरोध दर्ज कराया था.
किसान संगठनों के मंच संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने इस ट्रेड डील को भारत सरकार का ‘पूर्ण आत्मसमर्पण’ करार देते हुए वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के ‘तत्काल इस्तीफ़े’ की मांग की है.
उधर, ट्रेड डील की सहमति को लेकर जारी संयुक्त बयान साझा करते हुए वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने एक्स पर लिखा था कि ‘संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पादों में’ भारतीय किसानों के हितों की रक्षा की गई है.
जबकि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 7 फ़रवरी को कहा कि ‘हमारे लिए किसान सर्वोपरि है. आदरणीय प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में किसान हित सुरक्षित रखे गए हैं.’
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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