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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आर्कटिक में एक सेमी-ऑटोनॉमस इलाक़े ग्रीनलैंड पर कंट्रोल करना चाहते हैं, जो डेनमार्क के अधीन है. इतिहासकार अमेरिका के विस्तार के लिए ज़मीन ख़रीदने के उसके इतिहास को याद कर रहे हैं.
मिसौरी यूनिवर्सिटी के इतिहासकार जे सेक्सटन कहते हैं, “ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका कहता है कि इससे पहले वह दूसरी ताक़तों के हाथ लग जाए, उसे इस इलाक़े पर क़ब्ज़ा करने की ज़रूरत है.”
ट्रंप इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सुरक्षा के लिए अमेरिका का ग्रीनलैंड पर “मालिकाना हक़” होना चाहिए.
हालांकि एक समय उन्होंने कहा था कि वह इसे “मुश्किलों के बावजूद” करने के लिए तैयार हैं, अब वह कहते हैं कि वह “तुरंत बातचीत” चाहते हैं और इसके लिए “ज़बरदस्ती नहीं करेंगे.”
यहां, हम पिछली दो सदियों में अमेरिका की कुछ सबसे बड़ी ज़मीन ख़रीद का ज़िक्र कर रहे हैं, जिसकी बदौलत अमेरिका ने अपनी सीमा का विस्तार किया है.
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लुइसियाना (1803)

अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति थॉमस जेफ़रसन ने साल 1803 में फ़्रांस से लुइसियाना को ख़रीदने का फ़ैसला किया था. यह एक अहम मोड़ था.
20 लाख वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा इलाक़े में फैले लुइसियाना को ख़रीदने से एक नए देश और महाद्वीप में एक अहम ताक़त बनने के लिहाज़ से अमेरिका के लिए यह एक बड़ा टर्निंग पॉइंट था.
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लुइसियाना का इलाक़ा नॉर्थ अमेरिका में फ्रांस का सबसे बड़ा उपनिवेश था. लेकिन फ्रांस के कंट्रोल वाले सेंट डोमिंगु (जिसे अब हैती के नाम से जाना जाता है) आइलैंड पर बार-बार ग़ुलामों के विद्रोह और ब्रिटेन के साथ युद्ध के ख़तरे ने फ्रांसीसी नेता नेपोलियन बोनापार्ट को इसे अमेरिका को बेचने पर मजबूर कर दिया.
उस समय लुइसियाना आज के लुइसियाना प्रांत से भी बहुत बड़ा था. यहां अब 15 आधुनिक राज्य शामिल हैं जो मिसिसिपी नदी और रॉकी पहाड़ों के बीच बसे हैं.
इस ज़मीन का मालिक होना जेफ़रसन के पश्चिम की ओर बढ़ने के सपनों के लिए ज़रूरी था, जिसे वह अमेरिका का भविष्य मानते थे.
अमेरिकी और फ्रांसीसी सरकारों के बीच नवंबर 1803 में एक समझौता हुआ, जिसमें अमेरिका ने लुइसियाना के लिए डेढ़ करोड़ डॉलर दिए, जो आज के हिसाब से चालीस करोड़ डॉलर से ज़्यादा होता है.
मेक्सिकन सेशन (1848)
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1840 के दशक तक ज़्यादातर अमेरिकी लोगों को लगने लगा था कि उनकी “पक्की किस्मत” पश्चिम की ओर प्रशांत महासागर के तट तक फैलने में है. आख़िर में ऐसा मेक्सिको की क़ीमत पर होना था.
अमेरिका की सीमाओं को बढ़ाने के सबसे बड़े समर्थकों में से एक राष्ट्रपति जेम्स के पोल्क थे. उन्होंने साल 1845 में शपथ ग्रहण की थी.
राष्ट्रपति पोल्क को टेक्सस पर कंट्रोल को लेकर चल रहा झगड़ा विरासत में मिला, जिसे 1836 में मेक्सिको से आज़ादी मिली थी.
अमेरिका ने सन 1845 में टेक्सस पर कब्ज़ा कर लिया और यह एक अमेरिकी राज्य बन गया. अगले साल, अमेरिका और मेक्सिको के सैनिकों के बीच झड़प के बाद अमेरिकी कांग्रेस ने मेक्सिको के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा को मंज़ूरी दे दी, लेकिन झगड़े की वजहें और भी गहरी थीं.
इतिहासकार जे सेक्सटन के मुताबिक़, “अमेरिका ने कैलिफ़ोर्निया में दिलचस्पी दिखाई थी, जो उस समय मेक्सिको का था और महाद्वीप के सबसे ज़्यादा आर्थिक रूप से मज़बूत इलाक़ों में से एक था, जिसमें गहरे पानी वाले बंदरगाह थे जो एशिया के साथ व्यापार के लिए बहुत मशहूर थे.”
सेक्सटन बताते हैं कि उस वक़्त मेक्सिको की कोई भी सरकार कैलिफ़ोर्निया को बेचने और सत्ता में बने रहने की उम्मीद नहीं कर सकती थी.
इस युद्ध में अमेरिका की जीत के बाद दोनों देशों ने 1848 में ग्वादालूप हिदाल्गो की संधि पर हस्ताक्षर किए.
अमेरिका को जो ज़मीन मिली उसके लिए उसने डेढ़ करोड़ डॉलर दिए, जो आज के लिहाज़ से लगभग 60 करोड़ डॉलर से ज़्यादा है. इसमें आज के कैलिफ़ोर्निया, नेवाडा और यूटा के साथ-साथ एरिज़ोना, कोलोराडो, न्यू मेक्सिको और व्योमिंग के कुछ हिस्से भी शामिल थे.
सेक्सटन कहते हैं कि अगर मेक्सिकन पक्ष युद्ध नहीं हारता तो वह इस इलाक़े को बेचने को तैयार नहीं होता.
वह बताते हैं, “यह बंदूक की नोक पर बेचा गया था.”
कुल मिलाकर, मेक्सिको ने युद्ध से पहले के अपने आधे से ज़्यादा इलाक़े अमेरिका को सौंप दिए, जिससे अमेरिका को लगभग साढ़े तेरह लाख वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा ज़मीन मिली.
ला मेसिला (1853)
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1848 में मेक्सिको-अमेरिका युद्ध ख़त्म होने के बावजूद, दोनों देशों के बीच तनाव बना रहा. साल 1854 में हुए अंतिम समझौते में, दोनों सरकारें दक्षिण में मेक्सिकन इलाके़ की एक छोटी सी पट्टी बेचने पर सहमत हुईं, जो बाद में एरिज़ोना और न्यू मेक्सिको का हिस्सा बन गई.
मेक्सिको में वेंटा डे ला मेसिला और अमेरिका में गैड्सडेन परचेज़ के नाम से जानी जाने वाली यह डील कुछ हद तक ट्रांसकॉन्टिनेंटल रेलवे बनाने में अमेरिकी दिलचस्पी का नतीजा थी. कुछ हद तक यह मेक्सिको की सरकार की आर्थिक मुश्किलों की वजह से भी हुई थी.
अमेरिकी सरकार ने इस डील में लगभग 77 हज़ार वर्ग किलोमीटर ज़मीन के लिए एक करोड़ डॉलर का पेमेंट किया, जो आज के लिहाज़ से चालीस करोड़ डॉलर से ज़्यादा था. यह इलाक़ा आज के अमेरिका का दक्षिणी बॉर्डर बन गया.
रूस से अलास्का की ख़रीद (1867)
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बहुत से लोग यह नहीं समझ पाए कि 1867 में अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम सीवार्ड ने रूसी साम्राज्य से अलास्का के दूर-दराज़ का आर्कटिक क्षेत्र ख़रीदने का इरादा क्यों दिखाया.
सीवार्ड का मानना था कि इस ज़मीन का सामरिक महत्व बहुत ज़्यादा है क्योंकि यह ब्रिटिश लोगों को नॉर्थ अमेरिका में दख़ल देने से रोकेगा और इससे अमेरिका को प्रशांत महासागर में मछली पकड़ने की अच्छी जगहों तक पहुँच मिलेगी.
रूस का मानना था कि वह ख़ुद को एक ऐसे इलाक़े से छुटकारा दिला रहा है जिसकी कोई कीमत नहीं थी, जिसे मैनेज करना महंगा था और माना जाता था कि इस पर उस समय रूस के मुख्य दुश्मन ब्रिटेन के हमले का ख़तरा था.
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जब सीवार्ड ने रूस से 72 लाख डॉलर में 15 लाख 54 हज़ार वर्ग किलोमीटर ज़मीन ख़रीदने की डील की, जो आज के हिसाब से क़रीब 16 करोड़ डॉलर है, तो बहुत सी अमेरिकी जनता ने इसे ग़लत सौदा माना.
उनके विरोधियों ने इसे “सीवार्ड की बेवकूफी” भी कहा, जिस पर काफ़ी विवाद हुआ. कुछ लोगों का मानना था कि अमेरिका ने बेकार ज़मीन ख़रीदी है.
आलोचना के बावजूद, अमेरिकी कांग्रेस ने इस ख़रीद समझौते को मंज़ूरी दे दी और अलास्का अमेरिका का हिस्सा बन गया, हालांकि यह साल 1959 तक एक राज्य नहीं बना.
आखिरकार, अलास्का में सीवार्ड का निवेश सोने और तेल के बड़े भंडार की खोज के साथ रंग लाया और शीत युद्ध के दौरान इस इलाक़े की सैन्य अहमियत और बढ़ गई.
डेनमार्क से अमेरिकी वर्जिन द्वीप समूह की ख़रीद (1917)
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पिछली बार अमेरिका ने किसी देश से कोई इलाक़ा ख़रीदा था तो वह डेनमार्क था. डेनिश वेस्ट इंडीज़, जैसा कि उन्हें तब जाना जाता था, कैरिबियन में द्वीपों का एक समूह था. इस पर 19वीं सदी के बीच से ही अमेरिकी रणनीतिकारों की नज़र थी.
विलियम सीवार्ड ने इस इलाक़े को शांति के साथ विस्तार के अपने प्लान का एक अहम हिस्सा माना.
सेंट थॉमस पर बना पोर्ट, जो आज के वर्जिन आइलैंड्स को बनाने वाले तीन मुख्य आइलैंड्स में से एक है, ख़ास अहमियत रखता था. ऐसा इसलिए था क्योंकि इसके हार्बर को कैरिबियन को कंट्रोल करने के लिए एक आइडियल बेस माना जाता था.
लगभग उसी समय, डेनमार्क की इन आइलैंड्स में दिलचस्पी कम होने लगी थी. इसने पहले इस ज़मीन पर गन्ने के बड़े खेत विकसित किए थे, जिन पर यूरोपियन व्यापारियों के अटलांटिक के पार से लाए गए गुलाम अफ्रीकियों ने काम किया था.
लेकिन जैसे-जैसे दुनिया भर में चीनी की कीमतें कम होने लगीं, वैसे-वैसे उन प्लांटेशन को बनाए रखने के लिए डेनमार्क का जोश भी कम होने लगा.
1867 तक, दोनों देशों ने दो द्वीपों को 75 लाख डॉलर में बेचने के लिए एक शुरुआती समझौता किया. हालांकि, यह डील पूरी नहीं हो पाई क्योंकि अमेरिकी कांग्रेस ने इसे मंज़ूरी नहीं दी.
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पहले वर्ल्ड वॉर के शुरू होने और जर्मन सबमरीन से अमेरिकी जहाज़ों को होने वाले ख़तरे ने अमेरिका की दिलचस्पी फिर से जगा दी. उसे डर था कि जर्मनी डेनमार्क पर हमला कर देगा और आइलैंड्स के साथ-साथ सेंट थॉमस के सामरिक तौर पर अहम पोर्ट पर भी कब्ज़ा कर लेगा.
अमेरिकी विदेश विभाग की वेबसाइट के मुताबिक़, राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के विदेश मंत्री ने डेनमार्क को चेतावनी दी थी कि, ‘अगर वह यह इलाक़ा बेचने से मना करता है, तो अमेरिका आइलैंड्स पर कब्ज़ा कर सकता है ताकि उन पर किसी और का कब्ज़ा होने से रोका जा सके.’
डेनिश इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज़ की सीनियर रिसर्चर एस्ट्रिड एंडरसन के लिए, अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स के साथ जो हुआ और जो हम आज देख रहे हैं, उसके बीच समानताओं को न देखना मुश्किल है.
एंडरसन कहती हैं, “ग्रीनलैंड के साथ जो हम अभी सुन रहे हैं, उस दौर में भी इसकी झलक मिलती है. अमेरिका ने उस वक़्त भी कहा था कि ‘या तो तुम इसे हमें बेच दो या हम इस पर हमला’ करेंगे.”
साल 1917 तक दोनों पक्षों के बीच एक समझौता हो गया था, जिसके तहत कैरिबियन द्वीपों को उस वक़्त अमेरिका को 2.5 करोड़ डॉलर की कीमत पर बेचा जाना था.
उस डील के तहत अमेरिका इस बात पर भी सहमत हुआ कि वह डेनमार्क के “पूरे ग्रीनलैंड पर अपने राजनीतिक और आर्थिक हित बढ़ाने” का विरोध नहीं करेगा.
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