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मध्य पूर्व में युद्ध की वजह से शिपिंग मार्ग बाधित होने से भारत की खाद आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है. इससे खेती की पैदावार घटने और खाद्य कीमतें बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.
भारत, चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खाद उपभोक्ता है, और कच्चे माल के साथ ही तैयार उत्पादों के लिए काफ़ी हद तक आयात निर्भर है. इनका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है और होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुज़रता है, जहां शिपिंग बाधित है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि सरकार ने ऐसे कदम उठाए हैं कि खाद आपूर्ति प्रभावित न हो और किसानों पर इसका असर न पड़े.
विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा स्टॉक आने वाले बुवाई सीज़न के लिए पर्याप्त है, लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो स्थिति बदल सकती है.
भारत में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली नाइट्रोजन खाद जैसे यूरिया किसानों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि धान और गेहूं जैसी फसलें सीधे हवा से पर्याप्त नाइट्रोजन नहीं ले पातीं.
भारत हर साल लगभग 4 करोड़ टन यूरिया इस्तेमाल करता है, जिस पर सरकार सब्सिडी देती है. आपूर्ति बाधित होने से किसानों के बुवाई के फ़ैसले प्रभावित हो सकते हैं.
‘पता नहीं यह स्टॉक कब तक चलेगा’
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मुख्य बुवाई सीज़न (जून-जुलाई) आने वाला है लेकिन बड़े अनाज उत्पादक क्षेत्रों, पंजाब और हरियाणा जैसे उत्तरी राज्यों, के किसानों के अनुसार अभी उन्हें दबाव महसूस नहीं हो रहा. वे आमतौर पर मई से यूरिया खरीदना शुरू करते हैं. फ़िलहाल सहकारी समितियों के साथ ही उत्पादकों और वितरकों के गोदामों में खाद उपलब्ध है, लेकिन आगे की चिंता बनी हुई है.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय से जुड़े किसान विशेषज्ञ मनप्रीत सिंह ग्रेवाल कहते हैं, “हमें पता नहीं कि अगर जंग लंबी खिंच गई तो ये स्टॉक कब तक चलेगा.”
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 19 मार्च तक भारत के पास लगभग 62 लाख टन यूरिया का स्टॉक था. जून से सितंबर के मानसून सीज़न में खाद की खपत चरम पर होती है. सामान्य स्थिति में मौजूदा स्टॉक से काम चल सकता है.
कुछ विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर मौजूदा दिक्कतें जारी रहीं तो हालात बिगड़ सकते हैं. पूर्व केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण सचिव सिराज हुसैन ने बीबीसी से कहा, “खाद उत्पादन ज़रूर प्रभावित होगा. सरकार को मानसून की फ़सल के लिए यूरिया और अन्य खाद की कमी के लिए तैयार रहना चाहिए.”
उन्होंने ध्यान दिलाते हैं कि भारत के कई हिस्सों में किसान निर्देशित मात्रा से ज़्यादा यूरिया डालते हैं, जिससे ‘पोषक तत्व उससे ज़्यादा डाले जाते हैं जितने फ़सल सोख सकती है’.
वह कहते हैं, “ऐसे में अस्थायी कमी से वहां पैदावार पर ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन जिन इलाकों में खाद का इस्तेमाल कम है, वहां के लिए उनकी आपूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए क्योंकि वहां फसलें ज़्यादा प्रभावित हो सकती हैं.”
दो खाद कंपनियों के कुछ अधिकारियों ने नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर कहा कि अगर संघर्ष जारी रहा तो सीज़न के बाद के हिस्से में कमी दिख सकती है- हालांकि समय और मात्रा इस पर निर्भर करनेगी की आपूर्ति में बाधा कितने समय तक जारी रहती है.
‘आने वाले सीज़न में जोखिम बढ़ सकता है’
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प्राकृतिक गैस यूरिया बनाने का मुख्य कच्चा माल है और भारत इसका लगभग 85% आयात करता है, ज्यादातर खाड़ी देशों से.
एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी के अल्बर्टो पर्सोना ने कहा, “चार हफ्ते तक की आपूर्ति में आने वाली बाधा को स्थानीय उत्पादन या अन्य क्षेत्रों से आयात कर संभाला जा सकता है. उससे ज़्यादा हुआ तो चिंता बढ़ेगी.”
सरकार के इस महीने जारी किए गए एक आदेश के बाद भारत में खाद कारखानों को फ़िलहाल अपनी गैस की ज़रूरत का केवल 70% ही मिल रहा है. उद्योग के अंदरूनी स्रोतों के अनुसार इसकी वजह से कुछ कंपनियों ने उत्पादन घटा दिया है.
यह भी साफ़ है कि आपूर्ति की कमी सिर्फ़ भारत तक सीमित नहीं है. पिछले कुछ हफ़्तों में वैश्विक स्तर पर भी खाद की कीमतें तेज़ी से बढ़ी हैं. पूरे एशिया में यूरिया और गैस दोनों के दाम चढ़े हैं. ऊंचे दाम और कम उपलब्धता की वजह से किसानों को खाद का इस्तेमाल घटाना पड़ सकता है, हालांकि पैदावार पर तात्कालिक असर सीमित रहेगा.
पर्सोना कहते हैं, “फ़सल के अगले सीज़न पर इस समस्या का असर बहुत कम होगा, लेकिन आने वाले सीज़न में यह जोखिम बढ़ सकता है.
विशेषज्ञों के अनुसार खाद्य कीमतों की दिशा वास्तविक पैदावार के बजाय बाज़ार की उम्मीदों पर ज़्यादा निर्भर करेगी.
पर्सोना कहते हैं, “असल समस्या यह है कि कीमतें हमेशा बाज़ार की वास्तविक स्थिति से तय नहीं होतीं, उम्मीदें भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं.”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि भारत ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने और आयात स्रोतों में विविधता लाने के कदम उठाए हैं ताकि कुछ ही देशों पर निर्भरता कम की जा सके. कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों से खाद की समान और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने को कहा है.
हुसैन कहते हैं कि इस संकट से सरकार का सब्सिडी बोझ भी बढ़ सकता है क्योंकि वैश्विक कीमतें ऊंची होने से किसानों को नियंत्रित दरों पर खाद उपलब्ध कराना महंगा पड़ेगा.
अब सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि यह संघर्ष कितने समय तक चलता है. विश्लेषकों का कहना है कि अगर शिपिंग सामान्य गति से फिर शुरू हो जाए तो आपूर्ति श्रृंखला कुछ ही हफ्तों में स्थिर हो सकती है.
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