Source :- LIVE HINDUSTAN
क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ज्वेलरी रखने के लिए हमेशा केवल पिंक पेपर का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है? आखिर इसके पीछे की वजह क्या है। दरअसल इसके पीछे सालों का अनुभव, भरोसा और एक खास वजह छिपी है।
जब भी आप ज्वेलरी खरीदने जाते होंगे तो आपने ध्यान दिया होगा कि लगभग हर ज्वेलर गहनों को रखने के लिए गुलाबी (पिंक) पेपर का इस्तेमाल करता है। सोने की चेन हो, चांदी की पायल हो या हीरे की अंगूठी, सब कुछ हल्के गुलाबी कागज में बड़े ध्यान से लपेटकर दिया जाता है। क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ज्वेलरी रखने के लिए हमेशा केवल पिंक पेपर का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है? आखिर इसके पीछे की वजह क्या है। दरअसल इसके पीछे सालों का अनुभव, भरोसा और एक खास वजह छिपी है। तो चलिए जानते हैं सदियों से ज्वैलर्स, ज्वेलरी रखने के लिए पिंक पेपर का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं।
कैसे हुई इसकी शुरुआत?
पुराने समय में जब आज जैसी आधुनिक पैकेजिंग नहीं थी, तब भारतीय ज्वेलर्स अपने अनुभव के आधार पर गहनों को रखने के लिए एक खास तरह के कागज इस्तेमाल करते थे। ये कागज हाथ से रंगे जाते थे और पीढ़ी दर पीढ़ी सोनारों को यह सिखाया जाता था कि कौन सा कागज गहनों के लिए सुरक्षित होता है। इन सब के पीछे ज्वेलर्स का मकसद साफ था, गहनों को नमी, खरोंच और खराब होने से बचाना। इसलिए वे ऐसे कागज चुनते थे जो मेटल के साथ रिएक्शन ना करें और लंबे समय तक गहनों को सुरक्षित रखें।
गुलाबी रंग ही क्यों चुना गया?
अब बात आती है कि आखिर गुलाबी रंग ही क्यों। असल में उस समय जो लाल और गुलाबी रंग के डाई (रंग) इस्तेमाल होते थे, वे सबसे ज्यादा सुरक्षित माने जाते थे। ये रंग स्थिर होते थे और सोना-चांदी जैसी मेटल्स के साथ कोई नुकसान करने वाला रिएक्शन नहीं करते थे। इसलिए ज्वेलर्स ने इन्हीं रंगों वाले कागज को ज्वैलरी रखने के लिए चुना।
ब्रिटिश दौर में आया बदलाव
जब भारत में ब्रिटिश काल था, उस समय यूरोप के ज्वेलर्स भी गुलाबी टिशू पेपर का इस्तेमाल करते थे। वहां इसे नॉन-एसिडिक और मेटल-सेफ माना जाता था। इससे भारतीय ज्वेलर्स के पुराने तरीके को और मजबूती मिली। यानि जो काम भारतीय ज्वेलर्स अनुभव से कर रहे थे, वही बात बाद में आधुनिक पैकेजिंग में भी सही साबित हुई। इससे गुलाबी पेपर का इस्तेमाल और ज्यादा पक्का हो गया।
जब परंपरा बन गया यह तरीका
समय के साथ ज्वेलरी सिर्फ एक कीमती चीज नहीं रही, बल्कि शादी-विवाह और त्योहारों का अहम हिस्सा बन गई। ऐसे में गुलाबी रंग लोगों को गर्मजोशी, खुशी और शगुन जैसा महसूस कराने लगा। धीरे-धीरे सुरक्षा के लिए चुना गया यह रंग एक परंपरा बन गया। लोगों को भी यही उम्मीद रहने लगी कि ज्वेलरी गुलाबी पेपर में ही मिलेगी। इससे एक इमोशनल अटैचमेंट भी बन गया।
आज भी क्यों जारी है यह परंपरा
आज के समय में भले ही कई तरह की नई पैकेजिंग आ गई हो, लेकिन गुलाबी पेपर अभी भी ज्वेलर्स की पहचान बना हुआ है। यह एक तरह का संकेत बन गया है कि ज्वेलर अपने काम को ध्यान और जिम्मेदारी से करता है। अगली बार जब आप ज्वेलरी खरीदें और वह गुलाबी कागज में पैक होकर मिले, तो इसे सिर्फ एक रंगीन पेपर मत समझिए। ध्यान रखिए कि यह ज्वेलर्स के अनुभव, सावधानी और परंपरा का हिस्सा है।
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