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सिकाडा: कोविड-19 का नया वेरिएंट कितनी तेज़ी से फैल रहा है और क्या यह बच्चों के लिए ज़्यादा ख़तरनाक है?

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Source :- BBC INDIA

बच्चों की इम्युनिटी बड़ों के मुक़ाबले कम होती है

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सिकाडा कोविड-19 का एक बहुत ज़्यादा म्यूटेटेड वैरिएंट है जो 23 देशों में पाया गया है और उस पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की नज़र बनी हुई है.

सिकाडा- जिसे आधिकारिक रूप से वेरिएंट बीए 3.2 कहा जाता है, अमेरिका, हांगकांग, मोज़ांबिक और ब्रिटेन में पाया गया है.

हालांकि यह कहने की कोई वजह नहीं है कि यह वेरिएंट बाकियों से अधिक ख़तरनाक है, लेकिन जानकारों का कहना है कि बड़ों से ज़्यादा बच्चों के इसकी ज़द में आने की ज़्यादा आशंका है.

तो, हमें कितना चिंतित होने की ज़रूरत है?

सिकाडा वेरिएंट क्या है ?

इस वेरिएंट का नाम सिकाडा कीड़े के नाम पर रखा गया है. बीए 3.2 वेरिएंट को सिकाडा नाम इसलिए दिया गया क्योंकि पहली बार पाए जाने के बाद यह दुनिया के उन हिस्सों में उसी तरह सुप्त पड़ा रहा जिस तरह यह कीड़ा लंबे वक्त तक अंडरग्राउंड रहता है.

पहली दफ़ा यह वेरिएंट नवंबर 2024 में साउथ अफ़्रीका में पाया गया था लेकिन इससे जुड़े मामले सितंबर 2025 तक नहीं बढ़े थे. फिर पिछले महीने अमेरिका के सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रेवेंशन ने 25 राज्यों में इसके होने की बात कही.

इस वेरिएंट का नाम सिकाडा कीड़े के नाम पर रखा गया है

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बताया गया कि बीए 3.2 को चार यात्रियों के नैज़ल स्वैब यानी नाक में से लिए सैंपल, पांच मरीज़ों के क्लिनिकल सैंपल और 132 वेस्टवॉटर सैंपल में पाया गया. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वेरिएंट को निगरानी में रखा है. इसका अर्थ यह है कि इस पर अनिवार्य रूप से ध्यान देने की ज़रूरत है और फिलहाल जांच की जा रही है कि क्या यह वैश्विक स्तर पर लोगों की सेहत के लिए ख़तरा है.

क्या बच्चों में इसके पाए जाने की ज़्यादा आशंका है?

कोविड वेरिएंट रिसर्चर रयान हिस्नर ने न्यूयॉर्क के मामलों का डेटा विश्लेषण करके पाया कि बड़ों की तुलना में बच्चों के बीए 3.2 के टेस्ट में पॉज़िटिव होने की आशंका ज़्यादा है.

कैम्ब्रिज इंस्टीट्यूट ऑफ थेराप्यूटिक इम्यूनोलॉजी एंड इंफेक्शियस डिज़ीज़ के प्रोफ़ेसर रवींद्र गुप्ता कहते हैं, “किसी पीयर या सहकर्मी ने रिव्यू या प्रकाशित नहीं किया है, लेकिन ऐसा लगता है कि यह सच है.”

ऐसा क्यों हो सकता है, इसके बारे में अलग-अलग विचार हैं. एक तो यह कि किसी भी इम्यून सिस्टम के लिए सिकाडा को पहचानना कठिन है क्योंकि यह एक ऐसा वेरिएंट है जिसे हमने पहले नहीं देखा है.

गुप्ता कहते हैं, “सामान्य तौर पर बच्चों में बड़ों की तुलना में इम्युनिटी कम होती है क्योंकि उन्होंने इतने सारे अलग-अलग वायरस और कोविड संक्रमण नहीं देखे हैं और इसलिए उनमें इस वायरस के प्रति प्रतिरोधक क्षमता और भी कम होगी.”

इस तस्वीर में अमेरिका के इंडियाना में एक बच्ची ब्रूड एक्स सिकाडा को पकड़ती दिख रही है

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बड़ों में, वह ग्लैंड्स जो वायरस से हमारी रक्षा करने के लिए एंटीबॉडी बनाते हैं कई सालों में परिपक्व होते हैं और ये इम्युनिटी को बढ़ाने में हमारी मदद करते हैं.

उन्होंने आगे कहा, “इस परिपक्वता की प्रक्रिया के लिहाज से बच्चों में बहुत कम साल होते हैं और इसलिए यह एक हद तक समझा जा सकता है कि वे इस वायरस के प्रति ज़्यादा संवेदनशील क्यों हैं?”

अन्य शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि सिकाडा में बहुत ज़्यादा बदला जा चुका (हाईली म्यूटेटेड) प्रोटीन है जिसका बच्चों में संक्रमण से कुछ लेना-देना हो सकता है.

गुप्ता और उनकी टीम इस बात पर आगे शोध करने के लिए बाल चिकित्सा से जुड़े नमूनों की तलाश कर रही है कि यह वेरिएंट बच्चों को अधिक प्रभावित क्यों करता दिख रहा है?

इसके लक्षण क्या हैं?

फ़िलहाल इस बात का कोई सबूत नहीं है कि सिकाडा लोगों को वायरस के बाकी के वेरिएंट की तुलना में ज़्यादा बीमार बनाता है.

ब्रिटेन में यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया के महामारी मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर पॉल हंटर कहते हैं, “न ही ऐसे कोई ख़ास लक्षण हैं जो इसे ज़्यादा कॉमन बनाते हैं.”

कोविड-19 में बुखार, खांसी, गले में खराश, कंजेशन, थकान, सिरदर्द, शरीर के बाकी हिस्सों में दर्द, सांस लेने में तकलीफ और दस्त जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं.

यूके में यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के वायरोलॉजिस्ट इयान जोन्स बताते हैं, “वेरिएंट कोई भी हो वायरस उन्हीं सेल्स को लक्षित कर रहा है… इसलिए आपको जो लक्षण दिखते हैं वे कमोबेश एक जैसे होते हैं.”

यह इतना म्यूटेटेड क्यों है?

कोविड-19 जैसे वायरस बहुत ज़्यादा म्यूटेट होते हैं

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सभी वायरस समय के साथ बदलते हैं और कोविड-19 जैसे आरएनए वायरस तो ख़ासतौर पर तेज़ी से बदलते हैं.

यूएस सीडीसी ने बीए 3.2 को ‘ज़्यादा ही अलग’ बताया है. इसका मतलब है कि यह मूल ओमीक्रॉन स्ट्रेन से बहुत अलग है.

जोन्स कहते हैं, ये म्यूटेशन्स आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को वायरस को पहचानने से रोक सकते हैं और ‘कुछ हद तक’ इसे आपके द्वारा पहले से बनाई गई किसी भी इम्युनिटी से बचने का रास्ता भी देते हैं.

उन्होंने आगे कहा, “वायरस स्पष्ट रूप से आबादी में एंटीबॉडी को चकमा देकर धीरे-धीरे बढ़ रहा है.”

तो क्या कोई वैक्सीन काम करेगी?

इन म्यूटेशन्स की वजह से कोविड के टीके हमें सिकाडा वेरिएंट से बचाने में कम असरदार हो सकते हैं, लेकिन विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि पिछले टीके अभी भी नए वाले वेरिएंट के ख़िलाफ़ कुछ बचाव तो कर ही सकते हैं.

जोन्स कहते हैं, “आप संक्रमित हो सकते हैं, लेकिन आपको हल्का संक्रमण ही होगा.”

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, अब तक, कुल आबादी के 67% लोगों को कोविड-19 का टीका लगाया गया है.

हालांकि नए स्ट्रेन्नस से बचाने के लिए अपडेटेड ‘बूस्टर’ टीके में बदलाव किया गया है और दुनिया भर में यह एक जैसे नहीं हैं.

जोन्स बताते हैं कि दवाई कंपनियां सिकाडा को ध्यान में रखकर नई वैक्सीन को तभी तैयार करेंगी अगर मामलों की संख्या और गंभीरता तेज़ी से बढ़ती है.

तो क्या हमें चिंतित होना चाहिए?

एपिडोमॉलॉजिस्ट हंटर का कहना है कि इसमें कोई चकित होने वाली बात नहीं होनी चाहिए कि हमें कोविड-19 वायरस के नए वेरिएंट्स दिखते रहेंगे.

उन्होंने आगे कहा, “जब तक इस ग्रह पर इंसान रहेगा तब तक हम वायरस के नए वेरिएंट देखते रहेंगे. लगता नहीं कि SARS-CoV-2 कभी ख़त्म होगा.”

उनका कहना है कि तथ्य यह है कि सिकाडा वेरिएंट के मामले बढ़े हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि कोविड-19 मामलों या मौतों की कुल संख्या भी बढ़ेगी.

उन्होंने आगे कहा, “वेरिएंट नियमित रूप से सामने आएंगे और योगदान देते रहेंगे लेकिन संभावना है कि हम मौतों और गंभीर बीमारियों में कमी देखना जारी रखेंगे.”

कोविड-29 की वैक्सीन लेती एक महिला

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दिसंबर में डब्ल्यूएचओ ने कहा कि सिकाडा से जुड़ी गंभीरता, अस्पताल में भर्ती होने या मौतों में वृद्धि का सुझाव देने वाला कोई डाटा नहीं था, और कहा कि इससे पब्लिक हेल्थ को जोखिम कम है.

जोन्स कहते हैं, “कोविड-19 अब हमारे रोज़मर्रा के सर्दी संक्रमणों में से एक है और लोगों को इसके बारे में जागरूक होने की ज़रूरत है”

“अगर उन्हें लगता है कि उन्हें वैक्सीन से फायदा होगा, तो उन्हें जाकर इसे लेना चाहिए”

हालांकि इससे जल्दी प्रभावित होने वाले लोग, जिनमें 65 साल से ज़्यादा उम्र वाले, कमज़ोर इम्युनिटी वाले और लंबे वक्त की बीमारी से जूझने वाले लोग शामिल हैं, कोविड-19 इन्फेक्शन से गंभीर रूप से बीमार हो सकते हैं.

गुप्ता कहते हैं, “यदि आपके बच्चे को पहले से ही फेफड़ों की बीमारी, दिल का रोग या इम्यून की कमी है, तो ज़रूरी है कि वह जल्दी मेडिकल हेल्प ले.”

वो आगे कहते हैं, “लेकिन ज्यादातर स्वस्थ बच्चों के शरीर में यह नुक़सान पहुंचाने की कोशिश ही नहीं करेगा.”

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SOURCE : BBC NEWS