Source :- BBC INDIA
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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
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15 फ़रवरी 2026, 12:32 IST
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अकबर के बारे में कहा जाता है कि उनके दरबार में देश के सबसे क़ाबिल लोगों का बोलबाला था जिनमें शामिल होते थे कवि, अध्येता, दार्शनिक, कलाकार, संगीतकार, सेनापति और प्रशासक.
बाद में इन लोगों को अकबर के दरबार के ‘नवरत्न’ कहकर पुकारा जाने लगा. इनमें से एक नवरत्न थे बीरबल जिनकी अकबर से दोस्ती और हाज़िरजवाबी के क़िस्से आज तक भारतीय जनमानस के बीच मशहूर हैं.
भारतीय इतिहास में ऐसे लोग कम मिलते हैं जो लोगों के बीच इतने लोकप्रिय हों लेकिन इसके बावजूद उनके जीवन के बारे में लोगों को इतना कम पता हो.
अकबर हमेशा बीरबल को अपने साथ रखना चाहते थे.
अकबर की जीवनी ‘अकबर द ग्रेट मुग़ल’ लिखने वाली इरा मुखौटी लिखती हैं, “अकबर जब फ़तेहपुर सीकरी बनवा रहे थे तो उन्होंने इसमें बीरबल के लिए एक महल बनवाने का आदेश दिया था. जनवरी, 1583 में जब ये महल बनकर तैयार हुआ तो अकबर इसके उद्घाटन समारोह में भी शामिल हुए थे.”
इन दोनों के बीच इस हद तक दोस्ती थी कि मुग़ल साम्राज्य के समाप्त हो जाने के सालों बाद भी अकबर और बीरबल के क़िस्से अब तक चटख़ारे लेकर सुनाए जाते हैं.
इरा कहती हैं, “इन क़िस्सों में बादशाह का हमेशा मज़ाक उड़ाया जाता है और बीरबल उनसे ज्यादा अक्लमंद दिखाई देते हैं. इस बात के बहुत कम प्रमाण हैं कि ये क़िस्से वास्तविक घटनाओं पर आधारित हैं लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि अकबर को मज़ाक और हाज़िरजवाबी पसंद थी.”
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बीरबल का असली नाम
एमएच आज़ाद अपनी मशहूर किताब ‘दरबार-ए-अकबरी’ में लिखते हैं, “राजा बीरबल का नाम अकबर से उसी तरह जुड़ा हुआ है जिस तरह अरस्तू का नाम सिकंदर महान से जुड़ा हुआ था. बीरबल की यादें भारतीय लोगों के मन में घर कर गई हैं, इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि बीरबल के असली नाम में न तो राजा जुड़ा हुआ था और न ही बीरबल. ये नाम उन्हें बाद में उपाधि के तौर पर दिया गया था जिसकी वजह से उनके असली नाम को भुला दिया गया था.”
बीरबल के बारे में कहा जाता है कि वह सन 1556 में ही अकबर के दरबार में आ गए थे. उस समय उनकी उम्र 28 वर्ष थी और वह अकबर से उम्र में 14 वर्ष बड़े थे.
बीरबल के असली नाम के बारे में इतिहासकारों में मतभेद है. अकबर के समय के इतिहासकार अब्दुल क़ादिर बदायूंनी के अनुसार बीरबल का असली नाम गदई ब्रह्मदास था. लेकिन जॉर्ज ग्रियरसन के अनुसार बीरबल का असली नाम महेश दास था.
‘दरबार-ए-अकबरी’ के लेखक एमएच आज़ाद भी इसकी पुष्टि करते हैं और एच ब्लॉकमेन ने भी ‘आईन-ए-अकबरी’ के अनुवाद में भी इसी नाम का इस्तेमाल किया है.
इलाहाबाद के किले में स्थित अशोक की लाट में भी बाद में अंकित किए गए वर्णन में बीरबल का असली नाम महेश दास और उनके पिता का नाम गंगा दास बताया गया है.
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अकबर के दरबार में कैसे आए बीरबल?
बीरबल अकबर के दरबार में चौबीस वर्षों तक रहे जो कि कार्यकाल का करीब आधा हिस्सा है. अकबर के दरबार में आने से पहले बीरबल कई दूसरे राजाओं के दरबार में दरबारी कवि की हैसियत से रहे थे.
बदायूंनी के अनुसार बीरबल रीवा के राजा राम चंद्र के यहां थे. बीरबल के अकबर के दरबार के आने के बारे में भी इतिहासकारों ने अलग-अलग विवरण दिए हैं.
कुछ इतिहासकारों के अनुसार अकबर और बीरबल के बीच आकस्मिक मुलाकात हुई थी और अकबर ने बीरबल की चतुराई से प्रभावित होकर उन्हें अपने यहां बुला लिया था.
दूसरे कुछ इतिहासकारों के अनुसार आमेर के राजा भगवान दास के दरबार में बीरबल थे, उन्होंने उपहार के तौर पर उन्हें अकबर के दरबार में भेज दिया था.
एक और जीवनीकार के अनुसार, बीरबल को अकबर के दरबार में टोडरमल लाए थे.
डॉक्टर आरपी त्रिपाठी अपनी किताब ‘पार्टीज़ एंड पॉलिटिक्स इन मुग़ल कोर्ट’ में लिखते हैं, “तानसेन की तरह बीरबल पहले रीवा के राजा राम चंद्र के दरबार में काम करते थे और अकबर ने उन्हें अपने यहां आमंत्रित किया था.”
बदायूंनी का मानना है कि बीरबल खुद अकबर के दरबार में आए थे और उनकी हाज़िरजवाबी और चतुर संवाद से प्रभावित होकर अकबर ने उन्हें अपने दरबार में रखा था.
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अकबर के प्रशासन में बीरबल की भूमिका
बीरबल की भूमिका के बारे में लिखते हुए जेएम शेलत अपनी किताब ‘अकबर’ में लिखते हैं, “इबादतख़ाने में धार्मिक मामलों पर होने वाली बहसों में अकबर ने कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ बीरबल की हाज़िरजवाबी और वाकपटुता का बेहतरीन इस्तेमाल किया था.”
शेलत लिखते हैं, “वैष्णव धर्म और सूर्य पूजा में विश्वास करने वाले बीरबल का अकबर पर इतना प्रभाव था कि वह भी सूर्य और अग्नि का महत्व मानने के लिए तैयार हो गए थे.”
एमएल रॉयचौधरी ‘दीन-ए-इलाही’ में इबादतख़ाने का वर्णन करते हुए लिखते हैं, “अकबर के दरबार में बीरबल का आसन उत्तर-पूर्व में होता था जबकि फ़ैज़ी उत्तर-पश्चिम में बैठते थे. अबुल फ़ज़ल दक्षिण-पूर्व दिशा में बैठा करते थे.”
बांबर गैसक्वाएन अपनी किताब ‘द ग्रेट मुग़ल्स’ में लिखते हैं, “बीरबल ने हिंदू धर्म समझने में अकबर की काफ़ी मदद की. बीरबल ने खुद इस्लाम और दूसरे धर्मों को समझने की कोशिश की. दो अलग-अलग धर्मों में बंटे समाज में अकबर और बीरबल कुछ ऐसी समानताओं को ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे थे जिससे लोग नज़दीक आ सकें और सद्भाव के साथ रह सकें.”
प्रशासन के क्षेत्र में भी बीरबल की महारत थी. अबुल फ़ज़ल की तरह मंत्री का पद न होते हुए बीरबल मंत्रियों का काम किया करते थे.
आज की भाषा में उनकी तुलना बिना विभाग के मंत्री से की जा सकती है. सन 1577 में उन्हें मथुरा ब्राह्मणों के मामले को सुलझाने भेजा गया था.
सन 1578 में उन्हें ‘मदद-ए-माश के’ संचालन के लिए जालंधर भेजा गया था. उन्हें मवेशियों की कीमत और बिक्री पर नियंत्रण रखने वाली मजलिस का सदस्य भी बनाया गया था.
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सैनिक अभियानों में बीरबल का इस्तेमाल
एक कूटनीतिज्ञ के तौर पर बीरबल का मुख्य काम अकबर और दूसरे हिंदू राजाओं के बीच एक कड़ी का काम करना था.
सन 1568 में बीरबल के हस्तक्षेप के बाद ही राजा राम चंद्र के क्षेत्र को मुग़ल साम्राज्य में मिलाने का विचार त्याग दिया गया था.
बीरबल को राजपूत राजा मुग़ल दरबार में अपने संरक्षक के तौर पर देखते थे. हिंदू और मुस्लिम कुलीन वर्ग के बीच बीरबल न सिर्फ़ लोकप्रिय थे बल्कि लोग बादशाह से उनकी निकटता की वजह से उनसे डरा भी करते थे.
अकबर के दरबार में बीरबल के महत्व का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अकबर उन्हें अपने सैनिक अभियानों में भी अपने साथ ले जाने लगे थे. उन्हें सबसे पहले पंजाब के अशांत क्षेत्र पर काबू करने के लिए भेजा गया.
इसके बाद कांगड़ा अभियान में उनकी भूमिका के बाद सन 1572 में उन्हें अकबर ने नागरकोट की जागीर दे दी थी. इसके बाद गुजरात और बिहार के अभियान में भी वह अकबर के साथ थे.
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कभी अकबर के ग़ुस्से का शिकार नहीं हुए बीरबल
बीरबल ब्रज भाषा के अच्छे कवि भी थे. अकबर ने उन्हें ‘कवि राय’ की उपाधि से विभूषित किया था.
इरा मुखौटी लिखती हैं, “बीरबल के रूप में अकबर को एक तेज़ दिमाग़ और अच्छी समझ वाला व्यक्ति मिला था जो अकबर के प्रति पूरी तरह से समर्पित था. उसकी वाकपटुता, उदारता और काव्य प्रतिभा के गुण मिलकर बीरबल को एक आदर्श मुग़ल दरबारी बनाते थे.
अकबर और बीरबल के निकट रिश्ते का सबसे बड़ा सबूत ये था कि अपने तीस वर्ष के कार्यकाल में उन्हें कभी भी अकबर की नाराज़गी का शिकार नहीं होना पड़ा.
अकबर के दूसरे निकट दरबारियों को गाहे-बगाहे अकबर के गुस्से का शिकार होना पड़ा था.
अन्टोनियो डे मॉन्सेरेट ने भी लिखा, “सरकारी काम में ग़लती करने वाले अधिकारियों को अकबर ने कभी नहीं बख़्शा. सिर्फ़ तीन दरबारी कभी भी अकबर के ग़ुस्से का शिकार नहीं हुए. वे थे कवि फ़ैज़ी, संगीतकार तानसेन और बीरबल.’
बंदायूनी ने भी, जो कभी बीरबल के पक्ष में नहीं रहे, लिखा, “अकबर के साथ बातचीत कर बीरबल ने देखते-देखते माहौल अपने पक्ष में कर लिया. न सिर्फ़ उनका पद बढ़ता गया बल्कि वह बादशाह के विश्वासपात्र भी बनते गए. कुछ दिनों में नौबत ये हो गई कि तुम्हारा मांस, मेरा मांस और तुम्हारा ख़ून, मेरा ख़ून जैसे हालात पैदा हो गए.”
सिर्फ़ एक बार बीरबल थोड़ी मुश्किल में फंसते दिखाई दिए. बदायूंनी अपनी किताब ‘मुंतख़ब-उत-तवारीख़’ में लिखते हैं, “एक बार अकबर ने फ़तेहपुर सीकरी की वेश्य़ाओं को बुलाकर पूछा कि उनके दरबारियों में कौन लोग ऐसे हैं जो उनके पास आकर उन्हें बहलाने की कोशिश करते हैं. वेश्याओं की दी हुई फ़ेहरिस्त में बीरबल का नाम भी शामिल था. जब बीरबल को इस बारे में पता चला तो उन्होंने दरबार में अपना प्राण त्यागने की पेशकश की. अकबर ने उन्हें सज़ा देना तो दूर उल्टे उन्हें मनाने की कोशिश की.”
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अकबर और बीरबल की नज़दीकी
अकबर के सबसे नज़दीकी सलाहकार होने के बावजूद उनकी गिनती चापलूसों में नहीं होती थी.
बदायूंनी का मानना था कि ‘अबुल फ़ज़ल अकबर के सबसे बड़े चापलूस थे’ लेकिन बीरबल की निष्ठा और ईमानदारी पर बदायूंनी समेत किसी इतिहासकार ने न तो सवाल उठाए और न ही कोई संदेह व्यक्त किया.
निष्ठा और वफ़ादारी के मामले में वह मान सिंह, रहीम और मिर्ज़ा अज़ीज़ से बेहतर साबित हुए. अकबर और बीरबल की नज़दीकी का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अकबर चार बार बीरबल के निजी आवास पर गए. दूसरे दरबारियों के यहां भी अकबर का जाना हुआ लेकिन दो बार से अधिक नहीं.
पहली बार अकबर, 1574 में इलाहाबाद जाने के दौरान अकबरपुर में बीरबल के निवास पर रुके. अबुल फ़ज़ल ने इस यात्रा का ज़िक्र अपनी किताब ‘अकबरनामा’ में किया है.
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अकबर ने बीरबल की जान बचाई
सन 1583 में फ़तेहपुर सीकरी में हुई एक घटना ने भी सिद्ध कर दिया कि अकबर और बीरबल में कितनी नज़दीकी है.
अमिता सरीन अपनी किताब ‘अकबर एंड बीरबल, टेल्स ऑफ़ विट एंड विज़्डम’ में लिखती हैं, “अकबर और उनके दरबारी एक मैदान में हाथियों की लड़ाई देख रहे थे. अकबर घोड़े पर बैठे हुए थे. लड़ाई के बीच अचानक स्वभाव से हिंसक एक हाथी ने बीरबल पर हमला कर दिया. जब अकबर ने देखा कि बीरबल की जान ख़तरे में हैं तो वह अपने घोड़े को दौड़ा कर बीरबल और हाथी के बीच ले आए. अकबर ने राजसी अंदाज़ में हाथी को रुक जाने का आदेश दिया. अकबर की रौबीली आवाज़ सुनकर हाथी वहीं का वहीं रुक गया.”
उसी तरह एक पोलो मुकाबले के दौरान बीरबल अपने घोड़े से गिर पड़े. पार्वती शर्मा अपनी किताब ‘अकबर ऑफ़ हिंदुस्तान’ में लिखती हैं, “बीरबल के बेहोश होने पर अकबर ने दौड़कर अपने होठों से बीरबल के मुँह में सांस फूंकी थी.”
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पश्तून अभियान में बीरबल की मृत्यु
सन 1586 में अकबर ने स्वात और बाजौड़ क्षेत्र में पश्तून यूसुफ़ज़ई लोगों की बग़ावत को दबाने के लिए ज़ैन ख़ां कोका और बीरबल को भेजा.
इस अभियान का नेतृत्व अबुल फ़ज़ल भी करना चाहते थे. अकबर ने दोनों के नामों की पर्ची डालकर बीरबल का चुनाव किया लेकिन 16 फ़रवरी, 1586 को मुग़लों की सेना को हार का स्वाद चखना पड़ा और उनके आठ हज़ार सैनिक मारे गए जिसमें बीरबल भी शामिल थे.
बदांयूनी लिखते हैं, “अफ़ग़ानों ने मलंदराई पास की ऊंचाइयों पर चढ़कर मुगलों पर हमला बोला. हमलावरों के लिए मुगल सैनिक एक कटोरी में मछली की तरह थे. उन्होंने उन पर तीर और पत्थरों से हमला किया.”
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अकबर हुए शोकमग्न
इरा मुखौटी लिखती हैं, “जब अकबर तक यह ख़बर पहुंची तो वो गहरे शोक में डूब गये. अगले दो दिनों और रातों तक उन्होंने न तो कुछ खाया और न ही पानी पिया. उन्होंने तूरान के दूत से मिलने से इनकार कर दिया और लोगों को दर्शन देने झरोखे की खिड़की तक नहीं आए.”
अबुल फ़ज़ल ने ‘अकबरनामा’ में लिखा, “अकबर ने किसी भी चीज़ में रुचि लेनी छोड़ दी. अपनी मां हमीदा बानो और अपने सहयोगियों के अनुरोध पर उन्होंने फिर से सामान्य जीवन जीना शुरू किया. उन्होंने मुझसे खुद स्वीकार किया कि अचानक आई इस आपदा ने उनके दिल को झकझोर दिया है.”
अकबर की मनोस्थिति का वर्णन करते हुए बदांयूनी ने भी लिखा, “अकबर को अपने किसी अमीर की मृत्यु पर इतना दुख नहीं हुआ जितना बीरबल की मृत्यु पर. वह अपने जनरलों ज़ैन ख़ां और अबुल फ़ज़ल से इतने नाराज़ थे कि उन्होंने हुक्म दिया वो उन्हें अपनी शक्ल न दिखाएं. उन्हें इस बात का भी रंज था कि उनके सैनिक बीरबल का पार्थिव शरीर भी उन तक नहीं ला पाए ताकि उसका उचित तरीके से अंतिम संस्कार किया जा सकता.”
अकबर इतने गुस्से में थे कि वह स्वयं काबुल जाकर बीरबल के पार्थिव शरीर को लाना चाहते थे लेकिन दरबारियों ने उन्हें समझाया कि उनके दोस्त के पार्थिव शरीर को पवित्र करने के लिए सूरज की रोशनी पर्याप्त है.
बीरबल की मौत के कुछ हफ़्तों के भीतर अकबर ने उनकी मौत का बदला लेने के लिए टोडरमल के नेतृत्व में स्वात और बाजौड़ पर हमला बोल दिया. इस बार मुग़ल फ़ौज विजयी होकर लौटी.
अकबर ने बीरबल को श्रद्धांजलि देते हुए कहा, ‘वह सर्वश्रेष्ठ में सर्वश्रेष्ठ थे. हमारे करीबी साथियों में वह सर्वोत्तम थे जिनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता था.’
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SOURCE : BBC NEWS


