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कभी-कभी बेहद हैरानी होती है कि क्रिकेट के सबसे बुनियादी स्टूडेंट को भी जो बात पता होती है, वह महंगे लैपटॉप और ढेर सारे डेटा से लैस कोचों की नज़रों से क्यों छूट जाती है.
यह या तो सरासर अज्ञानता का मामला है या फिर टेलीविज़न प्रसारण की सीमाओं को देखते हुए, ऐसे बेतुके फ़ैसले लिए जाते हैं जिनकी व्याख्या करना असंभव है.
डेढ़ साल पहले, जब रमीज़ राजा ने बाबर आज़म और शाहीन अफ़रीदी को टेस्ट टीम से बाहर किए जाने के ख़िलाफ़ विरोध जताया था, तो उनका सबसे बड़ा तर्क यह था कि अगर ‘स्टार’ खिलाड़ी नहीं खेलेंगे, तो टीवी कौन देखेगा, प्रायोजक कहां से आएंगे और फिर क्रिकेट कैसे आगे बढ़ेगा.
पिछले मैच में ,जब पाकिस्तान ने एक तेज़ गेंदबाज़ की जगह स्पिनर को टीम में शामिल करने का फ़ैसला लिया, तो इस कड़वे फ़ैसले की कीमत मैच के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ सलमान मिर्ज़ा को चुकानी पड़ी.
लेकिन जब शाहीन अफ़रीदी दूसरे मैच में भी अपनी लय में वापस नहीं लौट सके तो उन्हें प्लेइंग इलेवन में रखने के फ़ैसले को सिर्फ़ एक ही तर्क से सही ठहराया जा सकता है- ‘अगर स्टार खिलाड़ी नहीं खेलेगा, तो टीवी कौन देखेगा?’
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भारत के ख़िलाफ़ मुकाबले से पहले पाकिस्तान को अपनी प्लेइंग इलेवन में सिर्फ एक बदलाव करना चाहिए था, वो था सलमान मिर्ज़ा को शामिल करना. मिर्ज़ा इस पिच पर हार्दिक पांड्या जितने ही प्रभावी साबित हो सकते थे.
लेकिन सलमान मिर्ज़ा कोई ‘स्टार’ खिलाड़ी नहीं थे और ऐसे मैच में जहां करोड़ों डॉलर का दांव लगा हो, तो किसी स्टार खिलाड़ी का खेलना तो लाज़िमी है, हैं ना?
टॉस जीतकर चुनी गेंदबाज़ी
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लेकिन इस सवाल का महत्व तो मैच के महत्व से भी बढ़कर है कि एक ऐसे खेल में जहां सारा ध्यान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए टॉस पर लिए गए फ़ैसले पर टिका होता है, वहां सलमान आगा को किस अक्लमंद ने ये सलाह दे दी थी कि वह टॉस जीतने के बाद पहले सूर्यकुमार यादव को बल्लेबाज़ी दे दें.
यह समझना इतना मुश्किल क्यों है कि क्रिकेट चमड़े की गेंद से खेला जाता है और ये चमड़ा अलग-अलग हवाओं, रोशनी और मिट्टी के संपर्क में आने पर रंग बदलने का गुण रखता है?
पाकिस्तानी टीम को दो सप्ताह पहले जिन परिस्थितियों से रू-ब-रू होने का मौका मिला हुआ था, उनमें ये मूलभूत तथ्य अभी तक उन्हें कैसे पता नहीं चल सका? जब श्रीलंकाई परिस्थितियों में पहली पारी में पुरानी गेंद से रन बनाना मुश्किल है, तो दूसरी पारी में और वो भी पुरानी पिच पर इतने बड़े लक्ष्य का पीछा कौन कर सकता है?
इस पिच का पहले भी इस्तेमाल हो चुका है और इस पर खेला गया पिछला मैच भी इस बात का गवाह है कि यहां दूसरी पारी में लक्ष्य का पीछा करना बेहद मुश्किल होगा.
भले ही पाकिस्तान को अपने स्पिनरों पर गर्व हो, लेकिन भारतीय स्पिनर भी टी-20 क्रिकेट के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ों में शुमार हैं.
ऐसी स्थिति में, यह सोचना मूर्खता से कम नहीं था कि भारतीय गेंदबाज़ी के ख़िलाफ़ लक्ष्य का पीछा करना आसान हो जाएगा, सिर्फ़ इसलिए कि कोलंबो में अचानक बारिश शुरू हो जाएगी और गेंद गेंदबाज़ों के हाथों से फिसलने लगेगी.
स्पिनर्स नहीं छोड़ पाए छाप
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हेड कोच माइक हेसन की ओर से किए मोटे खर्च पर विचार-विमर्श के लिए नियुक्त दल भी अपने नाकाफ़ी आँकड़ों के साथ यह भी नहीं बता सका कि जिन पिचों पर गेंद अपने आप रुक रही है, वहां गेंद को स्पिन करने के बजाय ब्रेक करना चाहिए क्योंकि हद से ज़्यादा स्पिन गेंद को पिच पर पकड़ बनाने से रोकती है और फंसे हुए बल्लेबाज़ों के लिए चारा बन जाती है.
यकीनन, अगर ये बात शादाब ख़ान और अबरार अहमद को बताई गई होती, तो वे भी स्टंप्स पर पूरा ध्यान रखते और अपनी गेंदबाज़ी में वैरिएशन दिखाकर मैच नहीं हारते.
अगर कोई समझना चाहे तो सीधी सी बात है कि क्रिकेट कोई रियलिटी शो नहीं है, यह भौतिकी के बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित खेल है.
‘चैट जीपीटी’ जैसा मूर्ख जीनियस भी आपको बताएगा कि श्रीलंका की पिचें स्पिन गेंदबाज़ों के लिए अनुकूल हैं और अगर श्रीलंका में स्पिन के ख़िलाफ़ बल्लेबाज़ी के आँकड़ों की ही तुलना की जाए तो बाबर आज़म से भी बेहतर नाम मिलेंगे.
जिस तरह पाकिस्तान ने मैच के पहले ओवर में भारत को स्तब्ध कर दिया था, उसी तरह दूसरे ओवर में सारा दबाव शाहीन अफ़रीदी के सपनों के आगे फीका पड़ गया, क्योंकि गेंद उनके हाथ से निकल चुकी थी, इसलिए वह जहां भी गिरेगी कुछ न कुछ ज़रूर करेगी.
बीच के ओवरों में, जब स्पिनरों ने मैच को फिर से बराबरी पर ला दिया था, तो आख़िरी ओवर ने भारत को कुल स्कोर में वह अतिरिक्त बढ़त दिला दी जो साठ ओवर की पुरानी पिच पर वास्तव में अजेय थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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