Source :- LIVE HINDUSTAN
कभी महिलाओं को अपनी बॉडी शेप के लिए ऐसे टाइट कोर्सेट पहनने पड़ते थे, जिनमें सांस लेना तक मुश्किल हो जाता था। समय के साथ महिलाओं की जरूरतें बदलीं, सोच बदली और फिर इस अंडरगारमेंट का डिजाइन भी पूरी तरह बदल गया।
ब्रा महिलाओं के डेली वियर का अहम हिस्सा है। लेकिन जो ब्रा आज इतनी सामान्य और जरूरी लगती है, उसका इतिहास काफी लंबा और रोचक है। कम ही लोग जानते हैं कि जिस ब्रा को आज आराम और फिटिंग के लिए पहना जाता है, उसका शुरुआती रूप इतना आरामदायक नहीं था। कभी महिलाओं को अपनी बॉडी शेप के लिए ऐसे टाइट कोर्सेट पहनने पड़ते थे, जिनमें सांस लेना तक मुश्किल हो जाता था। समय के साथ महिलाओं की जरूरतें बदलीं, सोच बदली और फिर इस अंडरगारमेंट का डिजाइन भी पूरी तरह बदल गया। अब सवाल यह है कि आखिर ब्रा की शुरुआत कब हुई, इसका पहला रूप कैसा था और यह कैसे बदलते-बदलते आज हर महिला की जरूरत बन गई। चलिए जानते हैं क्या है आज हर लेडीज की रोजमर्रा की जरूरत बन चुकी ब्रा का इंटरेस्टिंग इतिहास।
प्राचीन समय से शुरू होती है ब्रा की कहानी
आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि ब्रा जैसी चीजों का इस्तेमाल हजारों साल पहले भी होता था। लगभग 4500 साल पहले मिस्र, यूनान, रोम और भारत जैसी सभ्यताओं में महिलाएं ब्रेस्ट को ढंकने या सपोर्ट देने के लिए कपड़े की पट्टियों या चमड़े के टुकड़ों का इस्तेमाल करती थीं। उस समय इसका उद्देश्य सुंदर दिखना नहीं बल्कि काम करते समय सुविधा पाना होता था। घर के काम, खेल या अन्य किसी फिजिकल वर्क्स में आसानी के लिए महिलाएं ऐसा करती थीं। भारत में कंचुकी नाम का एक परिधान भी मिलता है, जिसे ब्रा का शुरुआती रूप माना जाता है।
कोर्सेट का दौर जब- जब आराम से ज्यादा शेप को महत्व मिला
इसके बाद एक दौर वो आया जब ब्रा की जगह कोर्सेट ने ले ली। 17वीं से 19वीं सदी के दौरान कोर्सेट काफी लोकप्रिय हो गया था। यह एक टाइट अंडरगारमेंट था जिसे कमर से लेकर ब्रेस्ट तक बहुत कसकर बांधा जाता था। इसे पहनने का मकसद शरीर को ‘आवरग्लास’ शेप देना होता था। लेकिन इसे पहनना आसान नहीं था। इसमें लोहे की छड़ें लगी होती थीं और पीछे से डोरियों को कसकर बांधा जाता था। कई बार इससे महिलाओं को दर्द, सांस की परेशानी और हेल्थ से जुड़ी दिक्कतें भी होने लगती थीं। धीरे-धीरे यह महसूस किया जाने लगा कि सुंदरता के लिए इतना असहज कपड़ा पहनना सही नहीं है। यहीं से आरामदायक विकल्प की जरूरत महसूस हुई।
जब जरूरत ने दिया मॉडर्न ब्रा को जन्म
बात साल 1913 की है। अमेरिका की मेरी फेल्प्स जेकब्स को एक कार्यक्रम में जाना था, लेकिन उन्हें कोर्सेट पहनने में अनकंफर्टेबल फील हो रहा था। तब उन्होंने दो रुमाल और फीते की हेल्प से एक हल्का और आरामदायक अंडरगारमेंट बना लिया। यह डिजाइन बाद में ‘ब्रेसियर’ कहलाया और उन्होंने इसका पेटेंट भी कराया। महिलाओं को यह कोर्सेट से ज्यादा आरामदायक लगा और धीरे-धीरे इसका इस्तेमाल बढ़ने लगा।
विश्व युद्ध के समय आए बड़े बदलाव
विश्व युद्ध के समय भी ब्रा के विकास में बड़ा बदलाव आया। उस समय मेटल्स की कमी थी, इसलिए महिलाओं को कोर्सेट का इस्तेमाल कम करने को कहा गया। इसी दौरान कपड़े से बनी स्ट्रेचेबल ब्रा बाजार में आने लगी। इसी समय A, B, C और D जैसे कप साइज शुरू हुए और एडजस्ट होने वाले हुक्स भी आने लगे। इससे महिलाओं को सही फिट मिलना आसान हो गया। यहीं से ‘ब्रेसियर’ का छोटा नाम ‘ब्रा’ ज्यादा प्रचलित हो गया।
फिल्मों और फैशन का भी पड़ा असर
फिल्मों और फैशन इंडस्ट्री ने भी ब्रा के डिजाइन पर काफी इफेक्ट डाला। 1940 के दशक में नुकीले कप वाली ब्रा का ट्रेंड आया, जो फिल्म एक्ट्रेस की वजह से पॉपुलर हुआ। इसके बाद नर्सिंग ब्रा बनाई गई ताकि न्यू मॉम आसानी से बच्चों को ब्रेस्ट फीडिंग करा सकें। 1960 के दशक में वंडर ब्रा आई जिसने ब्रा को फैशन और स्टाइल से जोड़ दिया।
स्पोर्ट्स ब्रा और नई जरूरतों के हिसाब से हुआ बदलाव
समय के साथ महिलाओं का लाइफस्टाइल बदला तो ब्रा के डिजाइन भी बदले। जब लेडीज स्पोर्ट्स और फिटनेस एक्टिविटी से जुड़ने लगीं, तब स्पोर्ट्स ब्रा बनाई गई। इसके बाद पैडेड, सीमलेस, स्ट्रैपलेस और अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से कई तरह की ब्रा आने लगीं। अब डिजाइन बनाते समय सबसे ज्यादा ध्यान कम्फर्ट पर दिया जाने लगा। कंपनियां भी अब इस बात पर ध्यान देती हैं कि ब्रा ज्यादा आरामदायक हो और लंबे समय तक पहनने में परेशानी ना दे।
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