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रूस के सैनिकों ने बीबीसी को बताया: कमांडरों के आदेश पर उन्होंने अपने ही साथियों की हत्या होती देखी

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Source :- BBC INDIA

रूसी सैनिकों ने यूक्रेन जंग में भयावह हालातों के बारे में बताया है

आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुजर रहे हैं तो भारत सरकार की जीवनसाथी हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.

चेतावनी: इस रिपोर्ट में अत्यधिक हिंसा और आत्महत्या से संबंधित विवरण शामिल हैं

चार रूसी सैनिकों ने यूक्रेन के साथ जारी जंग में फ़्रंटलाइन के रूसी हिस्से में हालात की भयावहता और क्रूरता के बारे में बताया है.

इनमें से दो ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने आदेश मानने से इनकार करने पर सैनिकों की हत्या होते देखा.

एक सैनिक ने डॉक्यूमेंट्री टीम को बताया कि उसने अपने कमांडर के आदेश पर एक सैनिक को मारे जाते हुए देखा, वही कमांडर जिसे 2024 में ‘हीरो ऑफ़ रशिया’ का ख़िताब मिला था.

उन्होंने कहा, “मैंने अपनी आँखों से देखा- बस दो–तीन मीटर की दूरी पर… क्लिक, क्लैक, बैंग.”

एक दूसरे यूनिट के सैनिक ने कहा कि उसने अपने कमांडर को खुद चार लोगों को गोली मारते देखा.

वह उन मारे गए सैनिकों के बारे में कहते हैं, “मैं उन्हें जानता था. मुझे याद है उनमें से एक चिल्ला रहा था, ‘गोली मत मारो, जो कहोगे, मैं करूंगा!'”

एक सैनिक यह भी बताते हैं कि उन्होंने अपने साथियों की करीब 20 लाशें एक गड्ढे में पड़ी देखीं, जिन्हें कॉमरेड्स ने ‘ज़ीरो’ कर दिया था. ‘ज़ीरो करना’ रूसी मिलिट्री का स्लैंग (बोलचाल की भाषा) है, जिसका मतलब है अपने ही आदमी को मार देना.

‘मीट स्टॉर्म्स’

इलिया का कहना है कि उन्होंने एक कमांडर को बहुत नज़दीक से चार सैनिकों को गोली मारते देखा था

इमेज स्रोत, Ben Steele/BBC

डॉक्यूमेंट्री ‘द ज़ीरो लाइनः इनसाइड रशियाज़ वॉर’ (The Zero Line: Inside Russia’s War) में, इन लोगों ने विस्तार से बताया कि जब उन्होंने उन हमलों में हिस्सा लेने से इनकार किया जिन्हें वे लगभग आत्मघाती मिशन जैसा मानते थे तो उन्हें कैसे यातनाएं दी गईं.

रूसी सैनिक इन हमलों को ‘मीट स्टॉर्म’ कहते हैं, यानी सैनिकों को लगातार फ़्रंटलाइन पर आगे भेजते जाना ताकि यूक्रेनी फोर्सेज थक जाएं.

बीबीसी के मुताबिक, शायद पहली बार रूसी फ़्रंटलाइन के सैनिक सामने आकर रिकॉर्ड पर कह रहे हैं कि उन्होंने अपने कमांडरों को अपने ही आदमियों की हत्या के आदेश देते देखा है.

इनमें से एक सैनिक, जिसका काम मारे गए सैनिकों की पहचान करना और गिनती रखना था, ने विस्तृत सूची दिखाई. उनके मुताबिक, जिन 79 सैनिकों के साथ उसे भेजा गया था, उनमें से वह अकेले ज़िंदा बचे हैं.

वह कहते हैं कि उसने फ़्रंटलाइन पर जाने से इनकार किया तो उन्हें यातनाएं दी गईं और उन पर पेशाब तक किया गया. उनके यूनिट में जो भी जाने से इनकार करता, उसे बिजली के झटके दिए जाते, भूखा रखा जाता और फिर बिना हथियार के इन ‘मीट स्टॉर्म्स’ में धकेल दिया जाता.

ये चारों आदमी इस वक्त फ़रारी काट रहे हैं. उन्होंने रूस के बाहर एक गुप्त जगह पर उन भयावह घटनाओं के बारे में बताया, जो उन्होंने देखीं.

रूस में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के यूक्रेन पर हमले का विरोध लगभग पूरी तरह दबा दिया गया है. मॉस्को हताहतों के आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं करता, लेकिन ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय का कहना है कि 24 फरवरी, 2022 को शुरू हुए इस बड़े पैमाने के आक्रमण के बाद से अब तक 12 लाख से ज़्यादा रूसी सैनिक मारे गए या घायल हुए हैं.

रूसी सरकार का कहना है कि उसकी सेना “बेहद तनाव की परिस्थितियों वाले संघर्ष में भी पूरे संयम से काम करती है और अपने सैनिकों का ज़्यादा से ज़्यादा ध्यान रखती है.”

आगे कहा गया, “कथित उल्लंघनों और अपराधों से संबंधित जानकारी की विधिवत जांच की जाती है.”

“आपके द्वारा दी गई जानकारी की सत्यता और प्रामाणिकता की हम स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सकते.”

इन चारों व्यक्तियों के विस्तार से दिए गए प्रत्यक्ष बयान रूसी फ़्रंटलाइन पर कानून-व्यवस्था के छिन्न-भिन्न होने की ख़बरों की पुष्टि भी करते हैं.

‘तुम्हारी किस्मत तुम्हारे कमांडर पर निर्भर करती थी’

दिमा कहते हैं कि उन्होंने अपने साथी सैनिकों को अपने कमांडर के आदेश पर मारते हुए देखता है

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इलिया, वह सैनिक हैं जिनका काम मारे गए सैनिकों की पहचान और गिनती करना था. वह उन लोगों में से हैं, जिन्होंने कहा कि उसने कमांडरों को अपने ही कॉमरेड्स को मारते देखा है.

जंग से पहले 35 वर्षीय इलिया उरल पहाड़ों के कूंगुर शहर में विशेष आवश्यकताओं वाले और ऑटिज़्म वाले बच्चों को पढ़ाते थे.

फिर मई 2024 में पुलिस उनके माता-पिता के घर पहुंची और बताया कि उसे सेना में बुलाया जा रहा है.

वह कहते हैं कि उन्हें परम शहर के एक भर्ती केंद्र में 78 और आदमियों के साथ ले जाया गया था.

वह बताते हैं, “लगभग सभी ने शराब पी हुई.”

उन्हें याद है कि वे चिल्ला रहे थे, “चलो, लड़ाई में आगे बढ़ो! ज़ेलेंस्की को पकड़ेंगे और अपना झंडा लहराएंगे!”

वह कहते हैं, “मैं उन्हें देख रहा था और सोच रहा था, ‘मैं यहां कैसे आ गया?’ मैं बहुत डरा हुआ था.”

इलिया कहते हैं कि यूक्रेन पहुंचने के बाद ज़्यादातर लोगों को सीधे फ़्रंटलाइन पर भेज दिया गया. वह कहते हैं कि वह किसी पर गोली चलाना या किसी को मारना नहीं चाहते थे, इसलिए उन्हें कमांड पोस्ट पर लगा दिया गया.

हालात बेहद मुश्किल थे, और वह दावा करते हैं कि उन्होंने एक कमांडर को बेहद नज़दीक से चार लोगों को गोली मारते हुए- एक को पैंटेलीमॉनिव्का में और तीन को नोवोआज़ोव्स्क में.

ये दोनों इलाक़े पूर्वी यूक्रेन के रूसी-कब्ज़े वाले दोनेत्सक में हैं, और उन सैनिकों को गोली इसलिए मारी गई क्योंकि वे फ़्रंटलाइन से भाग गए थे और वापस जाने से इनकार कर रहे थे.

इलिया कहते हैं, “सबसे दुख की बात यह थी कि मैं उन्हें जानता था. मुझे याद है उनमें से एक चिल्ला रहा था, ‘गोली मत मारो, जो कहोगे मैं वह करूंगा!’ लेकिन उसने (कमांडर ने) फिर भी उन्हें ज़ीरो कर दिया.”

इन लोगों ने हमें बताया कि ‘ज़ीरो करना’ आमतौर पर आदेश मानने से इनकार करने की सज़ा के तौर पर किया जाता है.

इसके अलावा यह बाकी सैनिकों, जो ऐसा करने के बारे में सोच सकते हैं, में दहशत पैदा करने का तरीका भी होता है.

इलिया कहते हैं, “तुम्हारी किस्मत तुम्हारे कमांडर पर निर्भर करती थी. कमांडर रेडियो पर बोलता- ‘इसे ज़ीरो करो, उसे ज़ीरो करो’.”

जो सैनिक आदेश नहीं मानते थे, उनकी हत्या किया जाना सिर्फ इलिया की यूनिट तक सीमित नहीं था.

दिमा कहते हैं, “बिलकुल वे अपने ही लोगों को मारते हैं, यह आम बात है.”

जंग से पहले 34 वर्षीय दिमा अपनी पत्नी और बेटी के साथ रहते थे और मॉस्को में बर्तन धोने की मशीनें ठीक करने का काम करते थे.

वह बताते हैं कि अक्तूबर 2022 में जब वह एक काम से दूसरे काम के लिए जा रहे थे, तब पुलिसकर्मियों के एक समूह ने उन्हें बुलाया.

वह याद करते हुए अंग्रेज़ी में कहते हैं, “उन्होंने मेरा पासपोर्ट देखा, अपने लैपटॉप पर कुछ किया और मुझसे कहा- ‘अगर सेना में नहीं जाओगे तो जेल जाओगे’.”

दिमा कहते हैं कि वह किसी को मारना नहीं चाहते थे, इसलिए कोई मेडिकल अनुभव न होने के बावजूद उन्होंने एक पैरामेडिक यूनिट जॉइन कर ली.

बाद में उन्हें एक ऐसी ब्रिगेड में भेजा गया जहां उन्हें फ़्रंटलाइन से घायल सैनिकों को निकालकर लाना होता था.

दिमा कहते हैं कि इसी 25वीं ब्रिगेड में उन्होंने अपने साथी सैनिकों को अपने कमांडर के आदेश पर मारे जाते देखा.

वह कहते हैं, “मैंने अपनी आंखों से देखा- बस दो मीटर, तीन मीटर की दूरी पर. सीधे हत्या… क्लिक, क्लैक, बैंग. यह कोई ड्रामा नहीं है, कोई फ़िल्म नहीं है, यह असली ज़िंदगी है.”

दिमा के कमांडर, अलेक्सी केस्नोफ़ोंटोव को रूस का सबसे बड़ा राज्य सम्मान है गोल्ड स्टार, दिया गया था, और 2024 में उन्हें ‘हीरो ऑफ़ रशिया’ सम्मान से नवाज़ा गया.

लेकिन केस्नोफ़ोंटोव को उसकी यूनिट में मारे गए सैनिकों के परिवारों ने खुलकर निशाना बनाया है.

जनवरी 2025 में एक संयुक्त पत्र में, इन परिवारों ने सीधे पुतिन से अपील की कि वह उसकी यूनिट में हो रही क्रूरता के आरोपों की जांच करवाएं.

पत्र में लिखा गया, “उन्होंने हमारी मातृभूमि की इज़्ज़त और गर्व के साथ रक्षा की!!! लेकिन हकीकत में वे इन कमांडरों के गैंग के हाथों में पड़ गए, जिन्हें दसियों हज़ार मारे और लापता हुए लोगों पर पुरस्कार मिले!”

“और वे हमारे लोगों को ख़त्म करते जा रहे हैं! क्योंकि उन्हें पता है कि कोई उन्हें रोक नहीं रहा है!”

दिमा केस्नोफ़ोंटोव को एक ‘कसाई’ कहते हैं.

वह कहते हैं, “उसने सैनिकों को मारने के इतने आदेश दिए… उसके हाथ बहुत ज़्यादा खून में सने हैं, बहुत ज़्यादा.”

‘किसी को ख़त्म करना मुश्किल नहीं, बस रिपोर्ट बना दो’

एक वरिष्ठ स्टाफ़ ऑफ़िसर का कहना है कि उन्होंने एक आदमी से बात की थी जिसने हाई-रैकिंग ऑफ़िसर्स के एक ग्रुप की हत्या करने में मदद की थी

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दिमा यह भी बताते हैं कि उन्होंने 20 आदमियों की लाशें एक खाई में पड़ी देखीं, वे पिछली रात ही उनके बेस पर आए थे, और सुबह उन्हें गोली मार दी गई थी.

वह कहते हैं कि उसने कई सैनिकों से बात भी की थी, वे सभी पहले कैदी थे. और फिर उसने देखा कि अगले दिन उन्हें ले जाया जा रहा है.

एक मेडिक होने की वजह से, हर मौत की रिपोर्ट दिमा को दी जाती थी, और वह कहते हैं कि उन्हें बताया गया कि उन लोगों को एक कमांडर ने गोली मारी थी और उनके बैंक कार्ड ले लिए थे.

वह बताते हैं, “बीस लड़के हमारे पास लाए गए थे. उनके बैंक कार्ड ले लिए गए और फिर उन्हें मार दिया गया. किसी को भी ख़त्म कर देना कोई मुश्किल बात नहीं है. बस एक रिपोर्ट बना दो.”

दिमा कहते हैं कि उन्हें बताया गया कि बैंक कार्ड कमांडरों ने ही लिए थे.

बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री में एक और पूर्व सैनिक से भी बातचीत की गई है.

यह एक सीनियर स्टाफ़ ऑफ़िसर हैं जिनका कहना है कि उन्होंने 17 साल तक रूसी सेना में सेवा की है. इस पूर्व अधिकारी- जिनका नाम बीबीसी नहीं बता रहा- का कहना है कि उन्होंने एक ऐसे आदमी से बात की थी जिसने उच्च अधिकारियों के एक समूह की हत्या में मदद की थी.

पूर्व अधिकारी याद करते हैं, “उस आदमी ने बताया था कि वह एक ‘लिक्विडेशन स्क्वाड’ का हिस्सा था- जिसे इसलिए भेजा गया था ताकि जो भी बचा हो, उसे ख़त्म कर दिया जाए.”

वह कहते हैं, “अपनी पूरी सेवा के दौरान मैंने ऐसा कभी नहीं देखा था.”

इन चारों लोगों ने हमें ‘मीट स्टॉर्म’ अभियानों के बारे में भी बेहद विस्तार से बताया- जो यूक्रेन के युद्धक्षेत्रों में रूसी सेना की बड़ी ‘मीट ग्राइंडर’ रणनीति का हिस्सा हैं.

ये स्टॉर्म्स इतने घातक होते हैं कि इन्हें आत्मघाती मिशनों जैसा माना जाता है.

एक और पूर्व सैनिक, डेनिस, कहते हैं, “मैंने देखा कि कमांडर कैसे लहरों की तरह एक के बाद एक, आदमियों को ऐसे फेंक रहे थे जैसे मांस के टुकड़े हों ताकि यूक्रेनियनों के पास गोलियां और ड्रोन खत्म हो जाएं, और फिर अगली लहर अपने टारगेट तक पहुंच सके.”

ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, 2025 में हर दिन करीब 900 से 1,500 रूसी सैनिक यूक्रेन में मारे जा रहे थे या घायल हो रहे थे.

दिमा बताते हैं कि असल में ये स्टॉर्म्स की प्रक्रिया कैसे चलती है.

वह कहते हैं, “पहले आप तीन लोगों को भेजते हैं, फिर तीन और को. अगर इससे काम नहीं बना तो 10 को भेजते हैं. 10 से भी काम नहीं हुआ, तो 50 को भेजते हैं.”

“और आखिरकार, आप रास्ता बना ही लोगे. फौज का यही तर्क है.”

‘कमांडर ने कहा, लो हमारा नया टॉयलेट मिल गया है’

डेनिस कहते हैं कि जब उन्होंने एक खोए हुए ड्रोन की तलाश के लिए जाने से इनकार किया तो उन्हें पीटा गया और उनके आगे के दो दांत तोड़ दिए गए

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वह कहते हैं, “तीन दिन में हमारे 200 आदमी मारे गए. हमारी रेजिमेंट के पहले ही मीट स्टॉर्म में हमें तोड़ दिया गया- सिर्फ तीन दिन में हमारा रेजिमेंट ख़त्म कर दिया गया.”

फिर दिमा एक वीडियो दिखाते हैं, जो अक्तूबर 2023 में सोशल मीडिया पर अपलोड हुआ था. इसमें उनकी यूनिट में मारे गए सैनिकों की माताएं और पत्नियां भारी नुक़सानों का विरोध कर रही हैं.

एक महिला की आवाज़ सुनाई देती है, “हमारे आदमियों को सिर्फ मशीनगन और फावड़े देकर आगे बढ़ने का आदेश दिया गया था.”

दूसरी कहती है, “भयानक नुक़सान हो रहे हैं. हमारे आदमियों को काटा जा रहा है.”

इलिया कहते हैं कि जो सैनिक मीट स्टॉर्म में जाने से इनकार करते थे, उन्हें मार न दिया जाए तो भी उनके साथ बेहद अपमानजनक और अमानवीय व्यवहार किया जाता था.

वह टेलीग्राम का एक वीडियो दिखाते हैं, जिसमें दोनेत्सक के पैंटेलीमॉनिव्का इलाके में उसकी यूनिट के सैनिक हैं.

एक आदमी कहता है, “चलो, जानवरों को खाना खिलाएं,” और फिर ढक्कन उठाकर एक गड्ढे में दुबके हुए तीन आदमियों को दिखाता है.

वीडियो बनाने वाला आदमी पूछता है, “ओह, भूख लगी है? खाना चाहिए?” तभी गड्ढे में बैठा एक आदमी सिर उठाकर हां में सिर हिलाता है और अपने हाथ आगे बढ़ाता है. तब ऊपर से सूखे दाने गड्ढे में डाले जाते हैं.

वीडियो बनाने वाला आदमी कहता है, “देखो कैसे खा रहा है,” और गड्ढे में पड़ा आदमी वह दाने खाता दिखता है.

इलिया कहते हैं कि कुछ आदमियों को ‘कई-कई दिनों तक भूखा रखा जाता’ और बिजली के झटके दिए जाते, फिर बिना हथियार के मीट स्टॉर्म में भेज दिया जाता.

वह कहते हैं कि जब उन्होंने एक स्टॉर्म में जाने से इनकार किया, तो उन्हें भी यातना दी गई.

वह बताते हैं, “उन्होंने मुझे पेड़ से बांध दिया, दो–तीन बार डंडे से मारा और मेरे सिर पर बंदूक तान दी.

“मैं कैसे कहूं… उन्होंने मेरे ऊपर पेशाब किया. कमांडर ने सबको कहा, ‘लो, हमारा नया टॉयलेट मिल गया है.’ मुझे आधे दिन तक बांधकर रखा गया.”

खोल दिए जाने के बाद, इलिया ने आत्महत्या की कोशिश की.

डेनिस ने बताया उन्होंने एक बार छुपकर गड्ढे में बंद सैनिकों को खाना और पानी पहुंचाया था. उन्होंने डॉक्यूमेंट्री टीम को एक वीडियो दिखाया है, जिसमें कथित तौर पर एक भगोड़े पर पेशाब किया जा रहा है. बीबीसी इसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका.

वह कहते हैं, “यह किसी इंसान की इज़्ज़त और गरिमा को रौंदने जैसा है. रूसी सेना में यह आम बात बन चुकी है.”

वह कहते हैं, “यह ग़ैरकानूनी है, लेकिन किसी को सज़ा नहीं मिलती. उल्टा, लड़कों को ऐसा करने के लिए और बढ़ावा दिया जाता है.”

इलिया कहते हैं टॉर्चर किए जाने और उन पर पेशाब किए जाने के बाद उन्होंने ख़ुदकुशी की कोशिश की थी

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27 साल के डेनिस एक फ़ोटो भी दिखाते हैं, जिसके बारे में उनका कहना है कि यह उस वक्त की है जब उनके आगे के दो दाँत उनके ही एक सीनियर ने तोड़ दिए थे, क्योंकि उन्होंने कहा था कि वह एक गुम हुए ड्रोन को ढूंढने नहीं जाना चाहते.

वह कहते हैं, “यह बहुत बुरा था, लेकिन मुझे बस काम जारी रखना पड़ा.”

दिमा को आखिरकार प्रमोशन मिल गया- हालांकि उन्होंने कहा था कि वह अफ़सर नहीं बनना चाहते. वह उस समारोह की फ़ोटो दिखाते हैं जिसमें उन्हें कमीशन दिया गया था.

वह कहते हैं कि प्रमोशन मिलने के बाद उन्होंने अपने लोगों को मीट स्टॉर्म में भेजने से मना कर दिया.

वह कहते हैं, “मैंने इनकार कर दिया. मुझे खुद आगे नहीं जाना पड़ता, लेकिन मैं उन्हें यह आदेश कैसे दे देता?”

दिमा बताते हैं कि इसके बाद उन्हें मिलिट्री पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और एक तरह की अस्थायी जेल, ज़ाइत्सेवो, ले जाया गया.

वह बताते हैं, “वहाँ मुझे इलेक्ट्रिक शॉक्स से यातना दी गई,” और कहते हैं पहला ही झटका इतना तेज़ था कि उनका अपने आप पर नियंत्रण नहीं रहा और उनका मल निकल गया.

वह कहते हैं कि उन्हें 72 दिन तक हर रोज़ यातना दी गई.

वह अपने यातना देने वालों के बारे में कहते हैं, “बस यातना… हर दिन, पत्थर जैसे चेहरे. कोई भाव नहीं, यह पागलपन था.”

हमने जिन चारों व्यक्तियों से बात की, वे अब रूस के बाहर हैं, लेकिन यूक्रेन की फ़्रंटलाइन ने उनके मन में गहरे ज़ख्म छोड़ दिए हैं.

दिमा कहते हैं, “मुझे सपने आते हैं. मैं जंगल देखता हूं… लाशों से भरा हुआ, कुचले हुए चेहरों वाले लोग, गंदे, सफ़ेद पड़े खून से भरे मुँह. वह गंध… वह सिर्फ महकती नहीं, वह जैसे मुँह में स्वाद की तरह महसूस होती है.”

वह कहते हैं, “मैं एक अपराधी हूँ- और किसी को फ़र्क नहीं पड़ता. मेरा ‘जुर्म’ बस इतना है कि मैं किसी को मारना नहीं चाहता था.”

“रूसी सेना में बहुत से लोग हैं जिन्हें इस युद्ध की ज़रूरत नहीं, जो अपने कमांडरों से नफ़रत करते हैं, पुतिन से नफ़रत करते हैं, इस सिस्टम से नफ़रत करते हैं- और वे हमें तोड़ना चाहते हैं.”

इलिया कहते हैं कि उन्हें अपने देश से प्यार है, “लेकिन पुतिन ने इसके साथ जो किया, उससे नहीं.”

वह कहते हैं, “वे वहां किसी को भी तोड़ सकते हैं- फर्क नहीं पड़ता कि आप मजबूत हैं या नहीं.”

“उन्होंने मुझे भी लगभग तोड़ दिया था, लेकिन पूरी तरह नहीं.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS