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शिवराम हरि राजगुरु को बचपन से ही तैराकी, तीरंदाज़ी और कुश्ती का शौक था. गुलेल का उनका निशाना भी पक्का था. बाद में उन्होंने पिस्टल चलानी भी सीख ली थी और कहा जाता है कि स्वतंत्रता सेनानियों में चंद्रशेखर आज़ाद के बाद राजगुरु का निशाना सबसे अच्छा था.
बनारस में संयोग से उनकी मुलाकात स्वतंत्रता सेनानी विश्वनाथ वैशम्पायन से हुई. उन्होंने राजगुरु को चंद्रशेखर आज़ाद से कानपुर में मिलवाया.
अनिल वर्मा अपनी किताब ‘राजगुरु द इंविंसिबिल रिवोल्यूशनरी’ में इस मुलाकात का दिलचस्प विवरण देते हुए लिखते हैं, “आज़ाद ने राजगुरु से पूछा, ‘तो तुम क्रांतिकारी बनना चाहते हो?'”
राजगुरु ने जवाब दिया. ”जी हाँ. मैं इस दिशा में काफ़ी कोशिश करता रहा हूँ.”
आज़ाद ने कहा, ”इसके बावजूद कि इसका अंजाम गोलियों से छलनी शरीर, देश निकाला या फाँसी तक हो सकता है ? ”
राजगुरु का जवाब था, ”मुझे इसका अंदाज़ा है लेकिन मैं इससे भयभीत नहीं हूँ.”
आज़ाद ने फिर सवाल किया, ”तुम्हारे क्या-क्या गुण हैं ?”
राजगुरु ने कहा, ”मैं समझता हूँ मैं शारीरिक रूप से मज़बूत हूँ. बिना हथियार की लड़ाई में दक्ष हूँ और दिया गया कोई भी काम कर सकता हूँ. मैं बिना खाए-पिए तीन-चार दिन तक रह सकता हूँ.”
इस पर आज़ाद बोले, ”अब अपने अवगुणों के बारे में बताओ.”
राजगुरू का जवाब था, “मेरी एक ही कमी है. मैं सोता बहुत हूँ. यहां तक कि मैं चलते हुए और खड़े-खड़े भी सो सकता हूँ.”
चंद्रशेखर आज़ाद राजगुरु से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें स्वतंत्रता सेनानियों के दल में शामिल कर लिया. उन्हें ‘रघुनाथ’ कोडनेम दिया गया.
कहानी मशहूर है कि चंद्रशेखर आज़ाद ने ओरछा में खलियाधाना के जंगलों में राजगुरु को पिस्टल चलाने की ट्रेनिंग दी थी.
सोने की आदत
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राजगुरु के सोने के कई किस्से मशहूर हैं. एक बार राजगुरु, भगत सिंह और शिव वर्मा सरकारी ख़ज़ाना लूटने के इरादे से गोरखपुर गए हुए थे.
उन्होंने एक दुकान किराए पर ली थी जहाँ पर वह सब रात को सोया करते थे.
शिव वर्मा अपनी किताब ‘रेमिनिसेंसेज़ ऑफ़ फ़ेलो रिवोल्यूशनरीज़’ में लिखते हैं, “पहली ही रात हम लोग ज़मीन पर गद्दे बिछाकर सोए हुए थे. अचानक एक बजे रात को फुफकारने की आवाज़ से मेरी आँख खुल गई. मैंने टॉर्च जलाई और देखा कि राजगुरु के सिर से दो फ़ीट की दूरी पर एक सांप फन काढ़े बैठा हुआ था. मैंने भगत सिंह को जगाया.”
“भगत सिंह ने राजगुरु का पैर पकड़ खींचा और चिल्लाए, ‘जागो तुम्हारे सिर के पास साँप बैठा हुआ है.’ जैसे ही साँप ने रोशनी देखी वह रेंगता हुआ दूसरे कमरे में चला गया. राजगुरू ने करवट बदली और कहा, ‘मुझे तंग मत करो’ और वह फिर सो गए.”
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स्कॉट को मारने टीम पुलिस मुख्यालय पहुंची
जब लाला लाजपत राय की एक लाठीचार्ज में मृत्यु हो गई तो आज़ाद के नेतृत्व में स्वतंत्रता सेनानियों ने इस लाठीचार्ज का आदेश देने वाले लाहौर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जेसी स्कॉट की हत्या की योजना बनाई.
सुखदेव को इस मिशन का संयोजक चुना गया. इसके बाद सुखदेव ने अपनी टीम चुनी जिसमें चंद्रशेखर आज़ाद. भगत सिंह, राजगुरु और जय गोपाल शामिल थे. राजगुरु को उनके सटीक निशाने की वजह से चुना गया था.
आज़ाद ने पिस्टल अपने पास रखी. राजगुरु को रिवॉल्वर और भगत सिंह को ऑटोमेटिक पिस्टल दी. राजगुरु पुलिस मुख्यालय तक पैदल पहुंचे जबकि भगत सिंह, सुखदेव और जय गोपाल साइकिल पर वहां पहुंचे.
जय गोपाल ने फ़ेल्ट कैप पहने एक अंग्रेज़ पुलिस अफ़सर को लाल रंग की मोटरसाइकिल स्टार्ट करते देखा. गोपाल समझे कि वह स्कॉट है जबकि वो जॉन साउंडर्स था. उन्होंने राजगुरू को इशारा किया.
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राजगुरु ने साउंडर्स पर गोली चलाई
अनिल वर्मा लिखते हैं, “साउंडर्स ने धीरे-धीरे मोटरसाइकिल पर मुख्य गेट की तरफ़ बढ़ना शुरू किया. तभी राजगुरू ने उस पर गोली चलाई. निशाना सटीक था. साउंडर्स ज़मीन पर गिर गया और उसका एक पैर चालू मोटर साइकिल के अंदर आ गया. भगत सिंह को उसी समय अंदाज़ा हो गया कि उन्होंने ग़लत व्यक्ति पर गोली चलाई है लेकिन उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था. उन्होंने साउंडर्स की मौत सुनिश्चित करने के लिए उन पर और कई गोलियां चलाईं.”
इसके बाद भगत सिंह और राजगुरु डीएवी कालेज की तरफ़ कोर्ट स्ट्रीट पर दौड़ने लगे. तभी ट्रैफ़िक इंस्पेक्टर डब्ल्यूजे फ़ीम और हेड कॉन्सटेबल चानन सिंह ने उनका पीछा करना शुरू कर दिया.
वर्मा लिखते हैं, “राजगुरु ने उन पर गोली चलाई लेकिन वह निशाना चूक गए. फ़ीम एक नाले में गिर गए लेकिन चानन सिंह ने उनका पीछा करना जारी रखा. दोनों दौड़ते हुए डीएवी कालेज के अहाते में पहुंच गए. आज़ाद वहाँ पहले से मौजूद थे. उन्होंने चानन सिंह को पीछा न करने के लिए सचेत किया लेकिन चानन ने उनकी एक न सुनी. आज़ाद ने गोली चलाई जो चानन सिंह की जाँघ में लगी. दूसरी गोली लगते ही चानन ज़मीन पर गिर गए. एक घंटे बाद उनकी अस्पताल में मृत्यु हो गई.
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लाहौर की दीवारों पर गुलाबी रंग के पोस्टर
भगत सिंह, राजगुरु और आज़ाद दीवार फाँदकर हॉस्टल में घुस गए. वो कुछ देर तक छत पर रहे ताकि ये सुनिश्चित कर सकें कि कोई उनका पीछा तो नहीं कर रहा. पुलिस ने पूरे इलाके की नाकेबंदी कर दी थी.
दीपाकांत रक्षे अपनी किताब ‘हुतात्मा शिवराम राजगुरु’ में लिखते हैं, “इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा कि अंग्रेज़ सरकार को हिला देने वाली इस घटना को अंजाम देने वालों के पास उस रात खाने तक के लिए पैसे नहीं थे. जय गोपाल ने किसी तरह अपने दोस्त बंशीलाल से दस रुपए उधार लिए तब उनके खाने का इंतज़ाम हो पाया.”
25 वर्षीय साउंडर्स भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी थे और उस समय के पंजाब के गवर्नर के पीए के दामाद थे.
अगले दिन शहर की कई दीवारों पर हाथ से लिखे गुलाबी रंग के पोस्टर चिपके दिखाई दिए. उनका शीर्षक था ‘साउंडर्स मर चुका है. लालाजी की हत्या का बदला ले लिया गया है.’ उस पर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के कमांडर इन चीफ़ बलराज के दस्तख़त थे.
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राजगुरु ने भगत सिंह के नौकर का वेश बनाया
अब सबसे बड़ी समस्या थी कि साउंडर्स की हत्या अंजाम देने वाले लोगों को किस तरह लाहौर से सुरक्षित बाहर निकाला जाए.
सुखदेव ने क्रांतिकारी भगवती चरण की पत्नी से पूछा कि क्या वह किसी की पत्नी बनकर लाहौर से बाहर जा सकती हैं? वह इसके लिए तैयार हो गईं, उन्हें सब दुर्गा भाभी कहते थे. राजगुरु नौकर के वेश में उनके साथ जाने के लिए तैयार हुए.
बाद में दुर्गा भाभी ने याद किया, “राजगुरु नौकर के वेश में गंदे कपड़े पहने हुए थे. वह दरी बिछाकर घर के बाहर ही लेट गए. मैं कभी भी उस समय राजगुरु के प्रति दिखाई गई अशिष्टता के लिए अपने-आप को माफ़ नहीं करूँगी.”
“भगत सिंह और सुखदेव ने तो मेरा बनाया हुआ खाना खाया लेकिन राजगुरु को एक प्लेट में खाना बाहर भिजवा दिया गया ताकि उनका नौकर रहने का भ्रम बना रहे. उस समय मेरा दिमाग इतनी उधेड़बुन में था कि मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि वह भी हमारे अपने हैं. लेकिन राजगुरु ने इसका बुरा न मानते हुए मुझसे एक शब्द भी नहीं कहा.”
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राजगुरु तीसरे दर्जे के डिब्बे में बैठे
20 दिसंबर की सुबह ओवरकोट पहने भगत सिंह और उनकी पत्नी बनी दुर्गा भाभी एक तांगे में लाहौर स्टेशन के लिए रवाना हुए. भगत सिंह ने अपने ओवरकोट का कॉलर ऊंचा कर रखा था ताकि उन्हें कोई पहचान न सके.
उनका दाहिना हाथ कोट की जेब में था और बाएं हाथ से उन्होंने दुर्गा भाभी के बेटे शचि को पकड़ रखा था. दुर्गा भाभी ने हाई हील की सैंडिल और कीमती साड़ी पहन रखी थी और वह एक अफ़सर की पत्नी दिख रही थीं.
राजगुरु ने पाजामे के ऊपर फटा पुराना कोट पहन रखा था. उनके सिर पर पगड़ी थी और कमर में दुपट्टा बँधा हुआ था. वह इन दोनों के पीछे नौकर की तरह एक बक्सा लिए चल रहे थे. भगत सिंह ने 14 डाउन देहरादून एक्सप्रेस के दो फ़र्स्ट क्लास और एक थर्ड क्लास के टिकट ख़रीदे.
वह सामान्य गति से चलते हुए पहले दर्जे के डिब्बे में सवार हुए जबकि राजगुरु तीसरे दर्जे के डिब्बे की तरफ़ बढ़ गए.
लखनऊ स्टेशन पर राजगुरु भगत सिंह और दुर्गा भाभी से अलग हो गए और कानपुर और आगरा होते हुए बनारस पहुंच गए. वहां पर उन्होंने नागरी प्रचारणी सभा के सामने एक व्यायामशाला में युवकों को कसरत कराना शुरू कर दिया.
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राजगुरु और चंद्रशेखर आज़ाद में बहस
कुछ दिनों बाद क्रांतिकारियों की गतिविधियों का केंद्र आगरा हो गया. वहाँ उन्होंने हींग की मंडी और नाई की मंडी में दो घर किराए पर लिए. एक दिन राजगुरु एक कैलेंडर लाए जिस पर एक सुंदर महिला का चित्र बना हुआ था. उसे उन्होंने दीवार पर टांग दिया.
अनिल वर्मा लिखते हैं, “जब चंद्रशेखर आज़ाद कमरे में घुसे तो उन्होंने वो कैलेंडर उखाड़ कर उसके टुकड़े-टुकड़े कर कूड़ेदान में फेंक दिया. जब राजगुरु वापस लौटे को उन्होंने कमरे का नज़ारा देख चिल्ला कर कहा, ‘किसने ये कलेंडर फाड़ा है?’ आज़ाद ने उतनी ही ऊँची आवाज़ में जवाब दिया ‘मैंने’.”
“राजगुरु ने उनसे पूछा ‘आपसे ऐसा क्यों किया? मुझे वो बहुत पसंद था.’ आज़ाद ने नाराज़ होकर कहा, ‘इस तस्वीर से तुम्हारा क्या वास्ता ?’ राजगुरु ने जवाब दिया ‘वो सुंदर तस्वीर थी. क्या आप हर सुंदर तस्वीर को नष्ट कर देंगे ?’ आज़ाद ने कहा, ”मेरा बस चले तो हाँ.’ तब राजगुरु ने उनसे कहा, ‘तो जाइए ताजमहल को भी नष्ट कर दीजिए’.”
फिर आज़ाद ने राजगुरु को समझाया, “हम अपना परिवार छोड़कर सिर्फ़ एक मक़सद से यहां आए हैं, वह है अपने देश को आज़ाद कराना. मेरी इच्छा है कि हम सब उसी पर अपना ध्यान केंद्रित करें. मुझे डर है कि सुंदरता के प्रति तुम्हारा प्रेम कहीं हमें अपने रास्ते से न डिगा दे और वह हमारी कमज़ोरी न बन जाए. यह सुनकर राजगुरु ठंडे पड़ गए.”
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गर्म चिमटे से पेट को जलाया
चंद्रशेखर आज़ाद हमेशा अपने साथियों से कहा करते थे कि पूरी कोशिश की जाए कि वह पुलिस के हाथ न आएं. लेकिन अगर ऐसी स्थिति आ जाए तो वह लड़कर अपनी जान दे दें. आज़ाद की ये बात सुनकर राजगुरु सोचने लगे कि अगर उनके साथ ऐसा होता है तो वो क्या करेंगे.
अनिल वर्मा लिखते हैं, “उन्होंने एक चिमटा उठाया और उसे आग में गर्म कर दिया. जब वो गर्म होकर लाल हो गया तो उन्होंने उसे अपने सीने से छुआ लिया. उन्हें बहुत पीड़ा हुई और उनकी पूरी खाल जल गई. ऐसा उन्होंने सात बार किया. वो अपनी सहनशक्ति की परीक्षा ले रहे थे. रात में वह जब सो रहे थे तो दर्द से उनकी कराह निकल गई.”
“आज़ाद उनकी बग़ल में सो रहे थे. कराह की आवाज़ से वह जाग गए. उन्होंने राजगुरु से कराहने का कारण पूछा. राजगुरु ने पहले टालने की कोशिश की लेकिन आज़ाद के ज़ोर देने पर उन्हें सारी बात बतानी पड़ी. आज़ाद ने राजगुरु की कमीज़ उतरवाई. मोमबत्ती की रोशनी में आज़ाद ये देख कर दंग रह गए कि राजगुरु के सीने पर छाले पड़े हुए थे. आज़ाद की आँखों में आँसू आ गए.”
वर्मा ने लिखा है कि जब राजगुरु को फाँसी दे जाने वाली थी तो स्वतंत्रता सेनानी सुशीला दीदी उनसे मिलने लाहौर जेल गईं. इस घटना को याद करते हुए उन्होंने राजगुरु से अनुरोध किया कि क्या वो उस जलने से पैदा हुए सीने पर दागों को उन्हें दिखा सकते हैं ?
राजगुरु ने मुस्कराते हुए अपनी कमीज़ के बटन खोल दिए. सुशीला दीदी ने एक सच्चे देशभक्त के दृढ़ निश्चय को अपनी आँखों से देखा.
राजगुरु और भगत सिंह की प्रतिद्वंद्विता
राजगुरु भगत सिंह को एक तरह से अपना प्रतिद्वंद्वी मानते थे. उन दोनों के बीच प्रतिद्वंदिता इस बात पर थी कि देश के लिए कौन पहले अपनी जान देता है. पार्टी से उनकी यही मांग रहा करती थी कि उन्हें सबसे पहले गोली चलाने का मौका दिया जाए.
शिव वर्मा लिखते हैं, “जब केंद्रीय एसेंबली में बम फेंकने की बात आई तो राजगुरु इस बात पर अड़ गए कि भगत सिंह के साथ न तो बटुकेश्वर दत्त को भेजा जाए और न ही किसी और को. यह काम वो खुद करना चाहेंगे.”
“तब चंद्रशेखर आज़ाद ने तर्क दिया, तुम्हें पकड़े जाने पर अदालत में बयान देना होगा और तुम्हें अंग्रेज़ी नहीं आती. अगर तुम एक उचित बयान नहीं दे पाओगे तो इस काम का राजनीतिक उद्देश्य पूरा नहीं हो पाएगा और सारे किए धरे पर पानी फिर जाएगा. तब राजगुरु ने कहा, भगत सिंह से कहिए कि वो मेरे लिए अंग्रेज़ी में बयान तैयार करें. मैं उसे रट लूँगा. जब आज़ाद ने तब भी राजगुरु की बात नहीं मानी तो वो नाराज़ होकर पूना चले गए.”
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अदालत ने सुनाई मौत की सज़ा
साउंडर्स की हत्या के कई दिनों बाद राजगुरु को पुणे से गिरफ़्तार किया गया. उनके पास से टिन का एक डिब्बा बरामद हुआ जिसमें एक रिवॉल्वर और 14 गोलियां रखी हुई थीं.
उनको ट्रेन से लाहौर ले जाया गया. ट्रेन जिन-जिन स्टेशनों से गुज़री हज़ारों लोग उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़े. ग्वालियर के पास अशोक नगर रेलवे स्टेशन पर जब राजगुरु ने अपना सिर ट्रेन की खिड़की से बाहर निकाला तो एक अंग्रेज़ अफ़सर ने उनके ऊपर बेंत चला दिया.
अनिल वर्मा लिखते हैं, “ये दृश्य देखकर वहां मौजूद एक 12 साल के लड़के का इतनी ज़ोर से ख़ून खौला कि उसने एक पत्थर उठाकर उस अफ़सर के ऊपर फेंक दिया. पुलिस ने उस लड़के की पिटाई करनी शुरू कर दी. उस लड़के का नाम कृष्ण सरल था. आगे जाकर उसने भारतीय क्रांतिकारियों पर कई पुस्तकें लिखीं.”
19 अक्तूबर को नेताजी सुभाष चंद्र बोस साउंडर्स की हत्या में गिरफ़्तार लोगों से मिलने लाहौर जेल आए. मुकदमे के दौरान मोतीलाल नेहरू, रफ़ी अहमद क़िदवई और मोहनलाल सक्सेना अदालत में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का मनोबल बढ़ाने पहुंचे.
अदालत ने इन तीनों को मौत की सज़ा सुनाई. मदनमोहन मालवीय ने वायसराय को तार भेज कर इन तीनों के मृत्युदंड को उम्रकैद में बदलने की अपील की लेकिन वायसराय ने उनके इस अनुरोध को ठुकरा दिया.
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वक़्त से पहले फाँसी देने का फ़ैसला
तय हुआ कि 24 मार्च, 1931 को इन तीनों को फाँसी पर चढ़ा दिया जाएगा. 23 मार्च को उनके वकील प्राणनाथ मेहता राजगुरु से मिलने जेल पहुंचे. वो ये देख कर दंग रह गए कि राजगुरु के चेहरे पर कोई शिकन नहीं है.
चार बजे जेल के नाई बरकत ने कैदियों को सबसे पहले ख़बर दी कि इन तीनों को 11 घंटे पहले ही फाँसी पर चढ़ाया जा रहा है.
कुलदीप नैयर अपनी किताब ‘विदआउट फ़ियर’ में लिखते हैं, “जेल के सभी कैदियों को चार बजे ही अपनी बैरक्स में जाने के लिए कह दिया गया. भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने आखिरी स्नान किया और काले रंग के कपड़े पहने. डॉक्टर ने उनका वज़न नापा.”
“उन्होंने मांग की कि उन्हें हथकड़ियाँ न पहनाई जाएं. उनकी यह बात मान ली गई. तीनों शेर अपनी कोठरियों से बाहर निकले और एक दूसरे को गले लगाया. भगत सिंह बीच में चल रहे थे. सुखदेव उनकी बाईं तरफ़ थे और राजगुरु उनके दाहिनी तरफ़. तीनों अपनी बाहें जोड़े हुए चल रहे थे.”
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तभी अचानक भगत सिंह ने गाना शुरू कर दिया- दिल से न निकलेगी न मरकर वतन की उल्फ़त/मेरी मिट्टी से भी ख़ुिशबू-ए-वतन आएगी’
अंग्रेज़ डिप्टी कमिश्नर इस दृश्य के अचंभे से देख रहा था. तभी भगत सिंह ने उसकी तरफ़ मुड़कर कहा, “आप भाग्यशाली हैं कि आप देख पा रहे हैं कि भारतीय क्रांतिकारी किस तरह ख़ुशी से मौत को गले लगाते हैं.” तीनों ने सीढ़ियां चढ़नी शुरू की और फांसी के तख़्ते के पास पहुंच गए.
अनिल वर्मा लिखते हैं, “वहां सबने नारा लगाया, ‘इंक़लाब ज़िदाबाद.’ जल्लाद ने काँपते हाथों से उनके पैरों और हाथों को बाँधा और उनके चेहरों को काले कपड़ों से ढ़ंक दिया. इससे पहले उन्होंने फाँसी के फंदे को चूमा. ठीक 7 बजकर 33 मिनट पर मजिस्ट्रेट ने अपनी घड़ी की तरफ़ देखकर अपना हाथ हिलाया.”
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कुछ ही क्षणों मे जीवन ने उनके शरीर को छोड़ दिया. डॉक्टर ने उनकी जांच कर उन्हें मृत घोषित किया. जेल के अंदर माहौल ऐसा था कि एक भारतीय अफ़सर ने मृत लोगों के शरीर को पहचानने से इनकार कर दिया.
उनको तुरंत नौकरी से निकाल कर हिरासत में ले लिया गया. जब भारत आज़ाद हुआ तो जेसी स्कॉट जिन्हें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु मारना चाहते थे, लाहौर रेंज के डीआईजी के पद पर थे.
उन्होंने अनुरोध किया कि उन्हें भारत में अपनी सेवाएं जारी रखने की अनुमति दी जाए लेकिन भारत सरकार ने उनके पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए उनके अनुरोध को ठुकरा दिया.
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