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मिलिट्री सक्सेस, स्ट्रैटेजिक फेल; ईरान में US-इजरायल की जीत-हार पर बोले पूर्व इजरायली NSA अधिकारी

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Source :- LIVE HINDUSTAN

अमेरिका और ईरान के बीच कायम नाजुक युद्धविराम को लेकर सवाल उठने लगे हैं। युद्ध ने ईरान की सैन्य क्षमता को भले ही कमजोर कर दिया हो, लेकिन सत्ता परिवर्तन, परमाणु कार्यक्रम समाप्ति और मिसाइल क्षमता में भारी कमी जैसे प्रमुख उद्देश्य अधूरे रह गए।

अमेरिका और ईरान के बीच कायम नाजुक युद्धविराम को लेकर सवाल उठने लगे हैं। युद्ध ने ईरान की सैन्य क्षमता को भले ही कमजोर कर दिया हो, लेकिन सत्ता परिवर्तन, परमाणु कार्यक्रम समाप्ति और मिसाइल क्षमता में भारी कमी जैसे प्रमुख उद्देश्य अधूरे रह गए। क्षेत्रीय स्थिरता पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर संदेह बना हुआ है। इन सवालों के बीच इंडिया टुडे से बात करते हुए इजरायल के पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ( NSA ) प्रोफेसर चक फ्रीलिच ने कहा कि युद्ध सैन्य रूप से सफल रहा, लेकिन रणनीतिक दृष्टि से विफलता मानी जा सकती है।

फिलहाल युद्धविराम काफी समस्याग्रस्त है

एक सवाल के जवाब में प्रो चक फ्रीलिच ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि ईरान की सैन्य क्षमता काफी हद तक कमजोर हो गई है, यही सैन्य सफलता है। समस्या यह है कि युद्ध शुरू होने पर जो उद्देश्य रखे गए थे, सत्ता परिवर्तन, परमाणु क्षमता का खात्मा और मिसाइल क्षमता में भारी कमी, इनमें से कोई भी पूरा नहीं हुआ। ईरान ने खाड़ी में समुद्री यातायात बंद करने की क्षमता हासिल कर ली है, जिससे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और तेल संकट पैदा हो गया। वे भविष्य के लिए यह विकल्प सुरक्षित रख रहे हैं, इसलिए फिलहाल युद्धविराम काफी समस्याग्रस्त है।

सीजफायर पर उन्होंने कहा कि अनुमान है कि यह दो सप्ताह तक टिक सकता है। दोनों पक्ष ( अमेरिका और ईरान ) लड़ाई दोबारा शुरू होने से रोकने में गहरी रुचि रखते हैं। युद्धविराम जारी रहने की अच्छी संभावना है, लेकिन इससे कोई वास्तविक समझौता या स्थायी शांति की राह आसान नहीं दिखती। सबसे संभावित परिदृश्य यह है कि स्थिति खुद-ब-खुद शांत हो जाएगी और बिना औपचारिक समझौते के एक अनौपचारिक युद्धविराम कायम रहेगा। ईरान के लिए अमेरिका के साथ सीधा टकराव झेलना खुद में एक बड़ी उपलब्धि है।

नहीं ली गई इजरायल से सलाह

अमेरिका-ईरान शांति वार्ता में पाकिस्तान क्या भूमिका निभा सकता है? इस पर फ्रीलिच ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि इस मामले में इजरायल से वास्तव में सलाह ली गई। यह मुख्य रूप से अमेरिका की पहल लगती है। इसका इजरायल की तुलना में अमेरिका के अन्य देशों के साथ संबंधों पर ज्यादा असर पड़ेगा। इजरायल का पाकिस्तान के साथ कोई संबंध नहीं है, इसलिए यह हमारे लिए कम प्रासंगिक है। उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका किसी ऐसे पक्ष की तलाश में था जो राजनयिक समाधान निकालने में मदद कर सके और पाकिस्तान, मिस्र तथा तुर्की ने इसमें सहयोग किया।

फ्रीलिच ने आगे कहा कि मौजूदा स्थिति में ईरान युद्धविराम के तहत होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने पर अड़ा हुआ है। युद्ध के दौरान चीनी जहाजों के लिए रास्ता खुला रहा, क्योंकि चीन ईरानी तेल का बड़ा खरीदार है। अब ईरान ने अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए रास्ता खोलने पर सहमति जताई है, लेकिन शुल्क की शर्त के साथ। अंतरराष्ट्रीय कानून में इसका कोई आधार नहीं है। अगर यह मंजूर होता है तो ईरान के लिए बड़ी जीत होगी, जिससे वह अपनी सेना का पुनर्निर्माण और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए धन जुटा सकेगा। मुझे उम्मीद है कि यह अंतिम समझौते का हिस्सा नहीं बनेगा।

होर्मुज और बाब अल-मंडेब पर क्या बोले?

उन्होंने आगे कहा कि मिडिल ईस्ट में संघर्ष अभी जारी है। सैन्य स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन यह निर्णायक जीत नहीं है। यह इजरायल और ईरान के बीच लंबे संघर्ष का एक हिस्सा है। इजरायल के लिए यह मुद्दा रणनीतिक प्राथमिकताओं को लगातार प्रभावित करता रहेगा। होर्मुज और बाब अल-मंडेब जैसे चोकपॉइंट्स पर उन्होंने कहा कि ईरान ने इन मार्गों का प्रभावी उपयोग किया है। इनकी बाधा से वैश्विक स्तर पर बड़ा असर पड़ सकता है। हाल के संघर्ष में इस पहलू पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया। भविष्य में इसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN