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बच्चे को सरकारी वैक्सीन लगवाएं या प्राइवेट? चाइल्ड स्पेशलिस्ट से जानें किस में है फायदा!

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Source :- LIVE HINDUSTAN

Government vs Private Vaccination: पेरेंट्स के मन में अक्सर ये सवाल रहता है कि बच्चे को वैक्सीन सरकारी अस्पताल में लगवाना बेहतर है या प्राइवेट अस्पताल में। चलिए जानते हैं चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. निमिषा अरोड़ा की इस बारे में क्या राय है।

बच्चे के जन्म के बाद उसकी सेहत का ठीक से ध्यान रखना पेरेंट्स की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। इसी जिम्मेदारी में सबसे अहम भूमिका निभाती है वैक्सीनेशन यानी टीकाकरण। बच्चे का सही समय पर वैक्सीनेशन कराने से उन्हें कई खतरनाक बीमारियों से बचाया जा सकता है, साथ ही उनकी इम्युनिटी भी स्ट्रॉन्ग होती है। हालांकि पेरेंट्स के मन में अक्सर ये सवाल रहता है कि बच्चे को वैक्सीन सरकारी अस्पताल में लगवाना बेहतर है या प्राइवेट अस्पताल में। चलिए जानते हैं चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. निमिषा अरोड़ा की इस बारे में क्या राय है।

सरकारी वैक्सीनेशन शेड्यूल क्या होता है

डॉ. निमिषा अरोड़ा बताती हैं कि सरकारी अस्पतालों में नेशनल इम्यूनाइजेशन शेड्यूल को फॉलो किया जाता है। इस शेड्यूल के तहत बच्चे को लगभग 12 बीमारियों से सुरक्षा देने वाले टीके लगाए जाते हैं। इन टीकों का उद्देश्य यह होता है कि बच्चे को जीवन के शुरुआती वर्षों में उन बीमारियों से बचाया जा सके जो बच्चों के लिए गंभीर हो सकती हैं। सरकार का यह कार्यक्रम पूरे देश में लागू होता है और इसका मुख्य लक्ष्य है कि हर बच्चे को जरूरी टीके समय पर मिल सकें।

प्राइवेट वैक्सीनेशन शेड्यूल में क्या अलग होता है

डॉ. निमिषा अरोड़ा के अनुसार प्राइवेट अस्पतालों में आमतौर पर इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के शेड्यूल को फॉलो किया जाता है। इसमें सरकार के शेड्यूल में शामिल 12 बीमारियों के टीकों के साथ-साथ कुछ अतिरिक्त बीमारियों से बचाव के टीके भी शामिल होते हैं। इन अतिरिक्त बीमारियों में टाइफॉइड, इन्फ्लुएंजा, हेपेटाइटिस ए, मम्प्स, चिकन पॉक्स, सर्वाइकल कैंसर और मेनिन्जोकोकल संक्रमण जैसी बीमारियाँ शामिल हैं। इसका मतलब यह है कि प्राइवेट वैक्सीनेशन में बच्चे को कुछ और बीमारियों से भी सुरक्षा मिल सकती है।

खर्च में सबसे बड़ा अंतर

डॉक्टर बताती हैं कि सरकारी अस्पतालों में वैक्सीनेशन पूरी तरह मुफ्त होता है। सरकार का उद्देश्य है कि हर बच्चा जरूरी टीकों से सुरक्षित रहे, इसलिए इनका कोई शुल्क नहीं लिया जाता। वहीं प्राइवेट अस्पतालों में वैक्सीन लगवाने के लिए फीस देनी पड़ती है। अलग-अलग अस्पताल और अलग-अलग वैक्सीन के हिसाब से खर्च भी अलग हो सकता है। इसलिए कई परिवार अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार फैसला लेते हैं कि उन्हें सरकारी सुविधा लेनी है या प्राइवेट।

दर्द वाली और पेनलेस वैक्सीन का फर्क

डॉ. निमिषा अरोड़ा के अनुसार सरकारी अस्पतालों में आमतौर पर DPT वैक्सीन लगाई जाती है, जिसे अक्सर पेन वाली वैक्सीन कहा जाता है। इस टीके के बाद बच्चे को थोड़ा दर्द, हल्का बुखार या इंजेक्शन वाली जगह पर सूजन हो सकती है। हालांकि घबराने की जरूरत नहीं होती। इन लक्षणों को साधारण पैरासिटामोल से आसानी से संभाला जा सकता है और यह आम प्रतिक्रिया होती है। वहीं प्राइवेट अस्पतालों में आपके पास पेन वाली और पेनलेस वैक्सीन दोनों का विकल्प होता है। पेनलेस वैक्सीन में बच्चे को इंजेक्शन के बाद कम दर्द महसूस होता है, इसलिए कुछ पेरेंट्स इसे चुनना पसंद करते हैं।

क्या पेनलेस वैक्सीन ज्यादा बेहतर होती है

डॉ. निमिषा स्पष्ट करती हैं कि अगर पेन वाली और पेनलेस वैक्सीन की तुलना की जाए तो दोनों का मुख्य काम एक ही है—बच्चे को लंबे समय तक बीमारी से बचाना। इसलिए सिर्फ दर्द के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि एक वैक्सीन दूसरी से ज्यादा प्रभावी है। दोनों ही टीके शरीर में इम्यूनिटी बनाने में मदद करते हैं।

सरकारी या प्राइवेट कौन सा विकल्प चुनना बेहतर?

यह फैसला पूरी तरह पेरेंट्स पर निर्भर करता है। आप अपनी फाइनेंशियल सिचुएशन, सुविधा और बच्चे की जरूरत को देखते हुए सरकारी या प्राइवेट वैक्सीनेशन में से किसी को भी चुन सकते हैं। सबसे जरूरी बात यह है कि चाहे टीका सरकारी अस्पताल में लगवाएं या प्राइवेट में, बच्चे का पूरा वैक्सीनेशन समय पर जरूर करवाएं।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN