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प्रेग्नेंसी में ऐसे रखें अपना और शिशु का ध्यान, डॉक्टर से जानें सही डाइट और जरूरी जांच

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Source :- LIVE HINDUSTAN

गर्भनाल के माध्यम से मां से भ्रूण तक सिर्फ पोषण नहीं पहुंचता, होने वाले बच्चे का भविष्य भी संवरता है। आइए जानें कैसे गर्भवती महिला अपनी सेहत का ध्यान रखकर आने वाली पीढ़ी का भविष्य संवार सकती हैं, बता रही हैं डॉ. लीना एन श्रीधर

नवजात शिशु के स्वस्थ विकास के लिए मां का सेहतमंद रहना बहुत आवश्यक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार साल 2020 में गर्भावस्था और प्रसव के दौरान दुनिया भर में 2,87,000 महिलाओं की मौत हुई। प्रसव के बाद शुरुआती दिनों में हर 10 में से 3 से अधिक महिलाओं और शिशुओं को पर्याप्त देखभाल नहीं मिल पाती है। गर्भावस्था के दौरान मां के शारीरिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य और पोषण का शिशु के विकास एवं स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यही वजह है कि गर्भावस्था के दौरान मां को उचित देखभाल और पोषण देना, उनके मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना तथा प्रसव के बाद उनकी देखभाल करना बहुत जरूरी होता है। गर्भावस्था के दौरान मां को मिलने वाले पोषण और उनकी मानसिक सेहत का शिशु के दीर्घकालिक विकास और स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ता है। मां के अच्छे पोषण, वजन प्रबंधन, मानसिक स्वास्थ्य और क्रोनिक बीमारियों की स्थिति से शिशु के वजन, प्रतिरक्षा प्रणाली और संपूर्ण स्वास्थ्य का निर्धारण होता है।

मां को चाहिए ये पोषण

गर्भावस्था के दौरान अल्प-पोषण या कुपोषण के कारण जन्म के समय कम वजन, समय पूर्व जन्म या विकास संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। दूसरी तरफ, अत्यधिक वजन या खराब पोषण के कारण डायबिटीज और उच्च रक्तचाप का जोखिम बढ़ सकता है, जिससे प्रसव में मुश्किल उत्पन्न हो सकती है और शिशु के स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है। स्वस्थ मां एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देती है, इसलिए गर्भावस्था के दौरान मां की सेहत को दुरुस्त रखने के लिए उनके आहार में निम्नलिखित पोषक तत्व शामिल होने चाहिए:

• फॉलिक एसिड: इससे न्यूरल ट्यूब के विकारों को रोकने में मदद मिलती है और मस्तिष्क का स्वस्थ विकास होता है।

• आयरन: यह एनीमिया को रोकने और शिशु को ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए जरूरी है।

• कैल्शियम: यह शिशु की हड्डियों और दांतों के विकास के लिए आवश्यक है।

मानसिक सेहत की सुध जरूरी

मां का मानसिक स्वास्थ्य नवजात शिशु की सेहत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। गर्भावस्था के दौरान अवसाद और चिंता के कारण समय से पहले जन्म, जन्म के समय कम वजन और नवजात शिशु के साथ लगाव में कमी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। क्रोनिक तनाव के कारण कॉर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ता है, जिससे नवजात शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली और भावनात्मक विकास प्रभावित होता है। गर्भावस्था के दौरान मां को मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए सपोर्ट समूहों, थेरेपी, तनाव कम करने की तकनीकों, जैसे योगा और माइंडफुलनेस का सहारा लिया जा सकता है।

बचकर रहें गलत आदतों से

मां की जीवनशैली का शिशु के स्वास्थ्य पर सीधा असर होता है। गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान बिल्कुल भी नहीं किया जाना चाहिए। धूम्रपान से समय पूर्व जन्म, जन्म के समय कम वजन होने और सांस संबंधी समस्याओं का जोखिम काफी बढ़ जाता है। वहीं, प्रेग्नेंसी के दौरान शराब का सेवन करने से फीटल अल्कोहल सिंड्रोम हो सकता है। इससे गर्भ में पल रहे शिशु की वृद्धि बहुत धीमे होती है, चेहरे में विकृतियां आ सकती हैं और मानसिक विकार हो सकते हैं।

फिटनेस पर भी दें ध्यान

पूरी गर्भावस्था के दौरान शारीरिक रूप से सक्रिय रहने और नियमित रूप से व्यायाम आदि करने से नींद अच्छी आती है, चिंता कम होती है और सेहत अच्छी रहती है। जो महिलाएं गर्भधारण से पहले नियमित रूप से कोई खास व्यायाम आदि करती हैं, वो गर्भावस्था के दौरान भी वो व्यायाम कर सकती हैं। पर, ऐसा करते वक्त अपने शरीर का ध्यान रखना आवश्यक होता है। अगर व्यायाम करते वक्त आपको कोई असुविधा महसूस हो रही है, तो गतिविधि को धीमा किया जा सकता है।

मां की खराब सेहत का भ्रूण पर असर

कुपोषण, एनीमिया, जेस्टेशनल डायबिटीज और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं के कारण भी समय से पहले जन्म, जन्म के समय कम वजन और विकास की धीमी गति जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इन समस्याओं का शिशु के दीर्घकालिक स्वास्थ्य और विकास पर गहरा असर होता है। मां को पूरा पोषण न मिलने के कारण कुपोषण होता है, जिसकी वजह से हर साल समय से पहले जन्म लेने वाले कई बच्चों की मौत हो जाती है। गर्भावस्था के दौरान महिला के आहार की शिशु के पहले 1000 दिनों के जीवन में अहम भूमिका है। गर्भावस्था के दौरान पोषण की कमी से उच्च रक्तचाप, समय पूर्व लेबर, सर्जिकल डिलीवरी और पोस्टपार्टम हैमरेज का जोखिम काफी बढ़ जाता है।

(लेखिका मणिपाल हॉस्पिटल, द्वारका के ऑब्सटेट्रिक्स और गाइनेकोलॉजी विभाग की प्रमुख हैं)

मां की सेहत का ये रखेंगे ध्यान

1 प्रीनेटल केयर: गर्भावस्था के दौरान समय-समय पर डॉक्टरी जांच कराते रहने से शिशु के विकास पर नजर रखी जा सकती है। इससे संभावित समस्याओं की तुरंत पहचान हो जाती है और मां को उचित मेडिकल देखभाल मिल पाती है।

2 पोषण: प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स युक्त संतुलित आहार से भ्रूण के संपूर्ण विकास में मदद मिलती है और गर्भ संबंधी समस्याएं कम होती हैं।

3 शारीरिक गतिविधि: प्रीनेटल योगासन और टहलना आदि जैसे शारीरिक व्यायाम रक्तसंचार में सुधार लाते हैं, जिससे जेस्टेशनल डायबिटीज का खतरा कम हो जाता है।

4 मनसिक स्वास्थ्य: गर्भ से संबंधित तनाव और्र ंचता का मां और शिशु के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है। काउंर्संलग और सपोर्ट समूहों की मदद से प्रेग्नेंसी के समय मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल की जा सकती है।

5 मेडिकल स्थिति: उच्च रक्तचाप, डायबिटीज और थायरॉइड जैसी क्रोनिक समस्याएं गर्भावस्था के दौरान जटिलताएं उत्पन्न कर सकती हैं, इसलिए उनका इलाज आवश्यक होता है।

गर्भावस्था के खतरे

1 जेस्टेशनल डायबिटीज: गर्भावस्था के दौरान खून में शुगर की मात्रा बढ़ जाने पर जेस्टेशनल डायबिटीज होता है। यदि इसे नियंत्रित न किया जाए, तो मैक्रोसोमिया (शिशु के अत्यधिक विकास) और समयपूर्व जन्म जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इससे बचने के लिए खून में शुगर की नियमित जांच करवाएं, अपनी जीवनशैली और आहार में सुधार लाएं और आवश्यकता पड़ने पर डॉक्टरी परामर्श पर इंसुलिन थेरेपी लें।

2 प्रिइक्लेंपसिया और इक्लेंपसिया: प्रिइक्लेंपसिया में गर्भ के 20वें हफ्ते में मूत्र में प्रोटीन और उच्च रक्तचाप होता है। इसकी वजह से इक्लेंपसिया हो सकता है, जिसके कारण दौरे पड़ सकते हैं, जिससे मां और शिशु, दोनों की जान को खतरा हो सकता है। इसके इलाज में ब्लड प्रेशर की दवा, गर्भ में शिशु की निगरानी और जरूरत पड़ने पर समय से पहले प्रसव शामिल है।

3 प्लेसेंटा प्रीविया: इस स्थिति में प्लेसेंटा सर्विक्स को ढक देता है, जिसकी वजह से गर्भावस्था के दौरान भारी रक्तस्राव होता है। यदि गर्भ बढ़ने के साथ प्लेसेंटा अपने आप ऊपर की ओर नहीं खिसकता है, तो सिजेरियन डिलीवरी करने की सलाह दी जाती है।

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