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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की अंतरिम सरकार के रक्षा मंत्रालय ने देश के पूर्वी प्रांतों में पाकिस्तानी हवाई हमलों की कड़ी निंदा की है और चेतावनी दी है कि इन हमलों का ‘उचित समय पर भरपूर जवाब दिया जाएगा.’
तालिबान के रक्षा मंत्रालय ने 22 फ़रवरी को ‘एक्स’ पर जारी एक बयान में पाकिस्तानी हवाई हमलों को ‘आपराधिक कृत्य’ और ‘अफ़ग़ानिस्तान की संप्रभुता और इस्लामी मूल्यों का खुला उल्लंघन’ बताया था.
इस बयान में कहा गया कि राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय “देश की संप्रभुता और जनता की सुरक्षा को राष्ट्रीय और धार्मिक कर्तव्य समझता है और वादा करता है कि इस कार्रवाई का उचित और समय पर जवाब दिया जाएगा.”
ध्यान रहे कि पाकिस्तान में सैन्य सूत्रों का दावा है कि पाकिस्तान की तरफ़ से किए गए हवाई हमलों में तीन प्रांतों नंगरहार, पकतीका और ख़ोस्त में मौजूद टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) और दूसरे चरमपंथी संगठनों के सात केंद्रों को नष्ट कर दिया गया.
यह दावा भी किया गया है कि इन हमलों में 80 से अधिक चरमपंथी मारे गए हैं.
दूसरी तरफ़ तालिबान अधिकारियों का दावा है कि इन हमलों में महिलाओं और बच्चों सहित बेगुनाह लोग मारे गए हैं.
पहले से ही तनावग्रस्त संबंध हुए और कड़वे
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पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी का कहना है कि पाकिस्तान अच्छी तरह जानता है कि चरमपंथी तत्व, उनके मददगार और संरक्षक कहां मौजूद हैं और अगर देश में आतंकवादी कार्रवाइयां जारी रहीं तो ज़िम्मेदार लोग बच नहीं पाएंगे.
अगस्त 2021 में अफ़ग़ान तालिबान के सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के बाद से अब तक पाकिस्तान ने काबुल और दूसरे क्षेत्रों में कई हवाई हमले किए हैं और इस वजह से सीमा पर झड़पें भी हुई हैं.
पाकिस्तान सरकार लगातार यह आरोप लगाती रही है कि प्रतिबंधित टीटीपी को अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार का समर्थन मिला हुआ है. उधर, अफ़ग़ान तालिबान इसका खंडन करते हैं और इसे पाकिस्तान का आंतरिक मुद्दा बताते हैं और इस बात पर ज़ोर देते हैं कि पाकिस्तान अपने देश की सुरक्षा बेहतर करे.
इस हालिया तनाव ने पिछले साल दोनों देशों के बीच होने वाली सरहदी झड़पों और उसके बाद क़तर और तुर्की की मध्यस्थता में हुए युद्धविराम के बाद पहले से ही तनावग्रस्त संबंधों को एक बार फिर कड़वा कर दिया है.
पाकिस्तान की तरफ़ से अफ़ग़ानिस्तान में हवाई हमलों और अफ़ग़ान तालिबान की ‘उचित समय पर भरपूर जवाब देने की धमकी’ के बाद सवाल यह है कि आगे क्या होगा? अफ़ग़ान तालिबान की सैन्य क्षमताएं क्या हैं और ‘उचित समय पर भरपूर जवाब’ से उनका क्या मतलब है और आने वाले दिनों में क्या हो सकता है?
‘किसी पारंपरिक युद्ध की संभावना फ़िलहाल नहीं’
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अफ़ग़ान मामलों पर नज़र रखने वाले विश्लेषक और ‘ख़ुरासान डायरी’ से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार इफ़्तिख़ार फ़िरदौस के अनुसार, “पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच किसी पारंपरिक युद्ध की कोई संभावना फ़िलहाल नहीं है.”
बीबीसी उर्दू से बात करते हुए उन्होंने कहा, “यह एक अजीब, निराशाजनक और बार-बार दोहराया जाने वाला सिलसिला है जिसमें पाकिस्तान हमला करेगा, अफ़ग़ान तालिबान जवाबी कार्रवाई करेंगे, सीमा पर तनाव होगा और राजनयिक बातचीत शुरू हो जाएगी. यह एक बार-बार दोहराया जाने वाला सिलसिला है क्योंकि किसी देश पर हवाई हमला करना कोई मामूली बात नहीं है.”
इफ़्तिख़ार फ़िरदौस का कहना है कि तालिबान के लिए यह मुमकिन नहीं है कि वह पाकिस्तान के साथ पारंपरिक युद्ध करे क्योंकि इसके लिए सैन्य क्षमताओं, हवाई संसाधनों, सप्लाई चेन और प्रशिक्षित सैनिकों की ज़रूरत होती है.
“अफ़ग़ानिस्तान की आर्थिक स्थिति और मौजूदा सैन्य संसाधनों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि संभावित जवाबी कार्रवाई बस ख़लल डालने वाली गतिविधियों से ज़्यादा नहीं होगी.”
उन्होंने कहा कि निकट भविष्य में तालिबान जवाब ज़रूर देंगे क्योंकि यह उनके सम्मान का मामला है लेकिन पूर्ण युद्ध की संभावना नहीं है.
डॉक्टर ख़ुर्रम इक़बाल इस्लामाबाद की क़ायद-ए-आज़म यूनिवर्सिटी में इंटेलिजेंस ऐंड सिक्योरिटी स्टडीज़ के एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने अफ़ग़ान तालिबान को टीटीपी के ख़िलाफ़ निर्णायक कार्रवाई के लिए राज़ी करने के सभी शांतिपूर्ण रास्ते इस्तेमाल कर लिए हैं.
उन्होंने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान के भीतर टीटीपी की सुरक्षित पनाहगाहों के बारे में पाकिस्तान की चिंताओं को संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने भी स्वीकार किया है.
“एक बार नहीं बल्कि 2023 से शुरू होने वाली संयुक्त राष्ट्र की लगातार तीन रिपोर्टों में इस बात की पुष्टि की गई है कि टीटीपी के अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षित ठिकाने हैं. इन तमाम शांतिपूर्ण माध्यमों के इस्तेमाल के बाद पाकिस्तान को ताक़त के इस्तेमाल पर मजबूर होना पड़ा.”
डॉक्टर ख़ुर्रम इक़बाल ने कहा, “अफ़ग़ानिस्तान के भीतर हमें गवर्नेंस, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्तर पर गंभीर समस्याएं नज़र आ रही हैं. कई अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों के अनुसार, दस में से आठ अफ़ग़ान परिवार गुज़र-बसर के लिए अपना घरेलू सामान तक बेचने को मजबूर हैं.”
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“जब अफ़ग़ान तालिबान आंतरिक मुद्दों को संभालने में नाकाम रहते हैं तो वह ध्यान बाहरी मोर्चे की तरफ़ मोड़ देते हैं, यानी अपने मुद्दों को बाहरी रुख़ दे देते हैं. पाकिस्तान के साथ तनाव उन्हें आंतरिक एकता मज़बूत करने और समस्याओं से ध्यान हटाने में मदद करता है, इसीलिए वह तनाव को बरक़रार रखना चाहते हैं.”
उन्होंने कहा कि दूसरा कारण कुछ व्यावहारिक भी है. “अगर वह (अफ़ग़ान तालिबान) टीटीपी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हैं तो डर है कि टीटीपी के लड़ाके आईएस (दाएश) की ओर जा सकते हैं और पहले ऐसा हो भी चुका है. यह भी एक वजह है कि वह टीटीपी के ख़िलाफ़ कार्रवाई से कतरा रहे हैं.”
संभावित जवाबी कार्रवाई कैसी हो सकती है?
इफ़्तिख़ार फ़िरदौस के मुताबिक़, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच स्थिति में हालांकि ‘कुछ नया नहीं है’ लेकिन तालिबान के पास टीटीपी जैसे संसाधन तो हैं और वह ऐसे संसाधनों (टीटीपी) का भरपूर इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तान के नागरिक क्षेत्रों को निशाना बना सकते हैं.
तालिबान की क्षमता और संभावित प्रतिक्रिया के बारे में डॉक्टर ख़ुर्रम इक़बाल भी इफ़्तिख़ार फ़िरदौस से सहमत हैं. उन्होंने कहा कि पारंपरिक युद्ध में अफ़ग़ान तालिबान पाकिस्तान का मुक़ाबला करने की क्षमता नहीं रखते, इसलिए वह अतीत की तरह अपारंपरिक तरीक़ा अपनाएंगे.
“पाकिस्तान के बड़े शहरों में चरमपंथियों के हमलों की संख्या बढ़ सकती है और देश के शहरी क्षेत्रों में हिंसा में इज़ाफ़ा हो सकता है.”
डॉक्टर ख़ुर्रम इक़बाल के अनुसार, तालिबान इसलिए भी पाकिस्तान के साथ पूर्ण या पारंपरिक युद्ध का बोझ नहीं उठा सकते क्योंकि उन्हें गंभीर आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.
उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर सीमित झड़पें हो सकती हैं, कुछ दिखावटी हमले किए जा सकते हैं और दोनों तरफ़ से ज़्यादा कड़े बयान, दावे और आरोप देखने को मिल सकते हैं.
“अतीत में भी जब तनाव बढ़ा तो इसी तरह की कार्रवाइयों के ज़रिए अफ़ग़ान तालिबान ने अपनी स्थानीय आबादी को यह संदेश देने की कोशिश की है कि बदला ले लिया गया है. वह सीमा पर तोपख़ाने का सीमित इस्तेमाल कर सकते हैं.”
अफ़ग़ानिस्तान की सैन्य शक्ति कितनी है?
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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार की सेना के पास जो हथियार हैं, वह ज़्यादातर तीन तरह के हैं: पूर्व अफ़ग़ान सेना के हथियार और साज़ो-सामान, वैसे हथियार जो अमेरिका सहित विदेशी सेनाओं की वापसी के बाद अफ़ग़ानिस्तान में रह गए थे और वैसे नए हथियार जो तालिबान ने ब्लैक मार्केट वग़ैरा से हासिल किए हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार अफ़ग़ान तालिबान और पाकिस्तानी सेना के बीच पिछली सीमाई झड़पों के कथित वीडियो से पता चलता है कि तालिबान के लड़ाकों ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ ज़्यादातर हल्के हथियारों का इस्तेमाल किया है. इनमें भारी और लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियारों के बहुत कम निशान मिले हैं.
अफ़ग़ानिस्तान में बीस वर्षों के दौरान नवनिर्माण के लिए अमेरिकी स्पेशल इंस्पेक्टर जनरल और देश के रक्षा मंत्रालय की रिपोर्टों के अनुसार पिछली सरकार को 16 लाख से अधिक हल्के और भारी हथियार और विभिन्न सैन्य साज़ो-सामान दिए गए थे. इनमें से लगभग 70 फ़ीसद या दस लाख से अधिक हथियार अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के हाथों में चले गए थे.
इस वक़्त तालिबान सरकार की सेना के पास जो हल्के हथियार हैं उनमें ज़्यादातर क्लाश्निकोव, अमेरिकी एम-16, एम-4 और एम-29 लाइट मशीन गन शामिल हैं.
इनमें पीका एम-2 और एम-240 जैसी हेवी मशीन गनें, ग्रेनेड लॉन्चर के अलावा आरपीजी-7 और एटी-4 जैसे रॉकेट लॉन्चर और एंटी-टैंक मिसाइलें भी शामिल हैं.
अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) की ओर से अफ़ग़ानिस्तान से वापसी के बाद जारी होने वाली रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ने पहले की अफ़ग़ान सरकार की सेना को जो भारी बख्तरबंद गाड़ियां, जहाज़ और दूसरे भारी सैन्य साज़ो-सामान दिए थे, वह भी तालिबान के क़ब्ज़े में चला गया था.
इन भारी हथियारों में 122 एमएम की हॉवित्ज़र बंदूक़ें हैं जिन्हें डी-30 कहा जाता है. एक अंदाज़े के मुताबिक़ इनमें से सौ से एक सौ बीस बंदूक़ें अब भी अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद हैं.
इसके अलावा लगभग 155 मिलीमीटर के हॉवित्ज़र मोर्टार और कई रूसी हथियार जैसे कि ज़ीटी-23-2 भी तालिबान के पास हैं.
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तालिबान सरकार ने 2024 में एक मिलिट्री परेड के दौरान बगराम एयर बेस पर भारी हथियारों का प्रदर्शन किया था. इनमें स्कड मिसाइल आर-17 और एल्ब्रोस आर-300 शामिल थीं, जिनकी रेंज लगभग 300 किलोमीटर है.
लूना मिसाइल, जिसे फ़्रॉग-7 के नाम से भी जाना जाता है, ग्रेड रॉकेट लॉन्चर, मिलान एंटी-टैंक मिसाइल और ऑर्गन मिसाइलों के साथ लगभग छह मील तक मार करने वाले हथियार और लॉन्चिंग सिस्टम हैं. यह लगभग 35 किलोमीटर तक फ़ायर कर सकता है.
ऐसे हथियार कम से कम तीन दशकों से अफ़ग़ानिस्तान में इस्तेमाल नहीं हुए हैं. कुछ रक्षा मंत्रालय के स्टोरेज में और कुछ पहाड़ी इलाक़ों जैसे कि पंजशीर में रखे हुए हैं.
तालिबान सरकार के रक्षा मंत्रालय ने इनमें से कुछ हथियारों को दोबारा सक्रिय करने का दावा किया है. लेकिन उनकी तकनीकी स्थिति कैसी है और वह किस हद तक लड़ाई में इस्तेमाल के लिए तैयार हैं, यह अभी तक साफ़ नहीं है.
अफ़ग़ानिस्तान में अंतरिम सरकार पर पाकिस्तान की बढ़त का एक पहलू उसकी वायुसेना और आधुनिक लड़ाकू विमान हैं, जबकि तालिबान सरकार के पास इसका मुक़ाबला करने के लिए वायुसेना नहीं है.
तालिबान सरकार ने पूर्व रक्षा मंत्रालय के कई हेलीकॉप्टरों की मरम्मत करके उन्हें चालू किया है और कई पायलटों को ट्रेनिंग भी दी है.
बिस्मिल्लाह ताबान के मुताबिक़ अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में अपनी मौजूदगी के आख़िरी वर्षों में अफ़ग़ान वायुसेना को पूरी तरह से लैस नहीं किया था और उसके कई हवाई हथियारों के भंडार को भी नष्ट कर दिया था. “यही वजह है कि तालिबान के पास हवा में मार करने वाले हथियार नहीं हैं.”
अमेरिकी रक्षा विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार तालिबान ने जिन जहाज़ों को क़ब्ज़े में लिया उनमें सी-208 जहाज़, एमडी-530 हेलीकॉप्टर, ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर, ए-29 जहाज़, एमआई-17 ट्रांसपोर्ट हेलीकॉप्टर, एमआई-24 लड़ाकू हेलीकॉप्टर और एमडी-500 लाइट अटैक हेलीकॉप्टर शामिल हैं.
तालिबान सरकार के रक्षा मंत्रालय का दावा है कि उसके पास लगभग 60 जहाज़ और हेलीकॉप्टर हैं.
‘गुरिल्ला युद्ध का लंबा अनुभव’
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अमेरिकी, नेटो और पूर्व अफ़ग़ान सरकारी बलों के ख़िलाफ़ लगभग दो दशकों तक लड़ने की वजह से तालिबान के पास गुरिल्ला युद्ध का लंबा अनुभव है और विशेषज्ञों के अनुसार यही अनुभव आज भी उनकी सैन्य रणनीति की रीढ़ की हड्डी है.
अक्तूबर 2025 में पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच सीमा की झड़पों के बाद अफ़ग़ानिस्तान के सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ बिस्मिल्लाह ताबान ने बीबीसी को बताया था कि हालिया झड़पों के वीडियो और दूसरे सबूतों से पता चलता है कि तालिबान अब भी एक नियमित सेना के रूप में नहीं बल्कि हल्के हथियारों से लैस गुरिल्ला समूह के रूप में लड़ रहे हैं.
इस रणनीति में घात लगाकर ‘सरप्राइज़’ हमले किए जाते हैं.
पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लड़ाई में हिस्सा ले चुके एक तालिबान कमांडर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया था कि तालिबान की सेनाओं ने “ज़्यादातर गुरिल्ला रणनीति पर ध्यान लगाया जिसमें हमारे पास काफ़ी अनुभव है. हालांकि ज़रूरत पड़ने पर नियमित सैन्य इकाइयों को भी कभी-कभार इस्तेमाल किया जाता था.”
उन्होंने बताया था कि असल मक़सद अपने इलाक़ों और चौकियों पर क़ब्ज़ा जमाए रखना था. “केंद्र से आदेश जारी किए जाते हैं लेकिन स्थानीय बॉर्डर कमांडरों को ज़मीनी हालात को देखते हुए फ़ैसले लेने और अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार दिया गया था.”
इस बारे में सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ आमिर राना ने बीबीसी को बताया था कि तालिबान अभी तक गुरिल्ला समूह को रेगुलर आर्मी में बदल नहीं पाए हैं और इसलिए वह आज भी पुराने गुरिल्ला युद्ध कौशल का इस्तेमाल करते रहते हैं.
उनका कहना था कि पाकिस्तान के पास एक रेगुलर सेना है जो भारत जैसी बड़ी ताक़त से लड़ने के लिए बनाई गई है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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