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7 घंटे पहले
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पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ़ की अमेरिका के साथ उनके देश के संबंधों पर की गई टिप्पणी पर चर्चा तेज़ हो गई है.
ख्वाजा आसिफ़ बीते सोमवार नेशनल असेंबली में अफ़ग़ानिस्तान के युद्धों में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर बोल रहे थे.
इस दौरान उन्होंने अमेरिका पर अपने रणनीतिक हितों के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल करने और फिर उसे ‘टॉयलेट पेपर’ की तरह छोड़ देने का आरोप भी लगाया.
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन पर लड़ी गई दो जंगों में कोई इस्लाम या मज़हब की मोहब्बत के लिए हिस्सा नहीं लिया था. ख्वाजा आसिफ़ ने कहा कि ये कोई जिहाद नहीं था. वो एक सुपरपावर की जंग थी.
ख्वाजा आसिफ़ ने क्या-क्या कहा?
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ख्वाजा आसिफ़ ने इस आम धारणा से असहमति जताई कि अफ़ग़ानिस्तान की जंगों में पाकिस्तान की भागीदारी धार्मिक या इस्लामी कारणों से प्रेरित थी. उन्होंने देश के दो सैन्य तानाशाह (ज़िया-उल हक और परवेज़ मुशर्रफ़) पर अमेरिका के साथ दिखने के लिए अफ़ग़ानिस्तान की जंगों में शामिल होने का आरोप भी लगाया.
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री 1979 में शुरू हुई सोवियत अफ़ग़ान जंग का ज़िक्र करते हुए बोले, “सोवियत यूनियन काबुल में जो हुकूमत थी उसके इनविटेशन पर अफ़ग़ानिस्तान आया था, ये कोई आक्रमण नहीं था. ये अमेरिकी थ्योरी है.
“वो कोई जिहाद नहीं था. वो एक सुपरपावर की जंग थी और हमने इसके लिए अपना करिकुलम चेंज कर दिया, जिसे हम अब तक वापस पुराने जैसा नहीं बना सके, जैसा हमने 1960 या 70 के दशक में पढ़ा था.”
उन्होंने कहा, “हमारे राजनीतिक और धार्मिक मूल्यों, परंपराओं तक में बदलाव किए गए. क्योंकि हमें एक मेड इन अमेरिका जिहाद लड़ना था. लेकिन उस जिहाद से हमने कोई सबक नहीं सीखा. उसके बाद उन्होंने हमें बेसहारा कर दिया, लेकिन हमें अक्ल फिर भी नहीं आई.”
अमेरिका से रिश्तों की कीमत पर बोले आसिफ़
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आसिफ़ मूल रूप से इस बारे में बोल रहे थे कि 1999 के बाद, खासकर 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद, अमेरिका के साथ दोबारा तालमेल बैठाने की कीमत पाकिस्तान के लिए कितनी विनाशकारी साबित हुई.
आसिफ़ ने बताया कि 2001 के बाद के दौर में अमेरिका के नेतृत्व वाले अफ़गान युद्ध में पाकिस्तान ने फिर से अमेरिका का साथ दिया और इस प्रक्रिया में तालिबान के ख़िलाफ़ हो गया. उनके मुताबिक, अमेरिका इस क्षेत्र से हट गया. वहीं पाकिस्तान लंबे समय तक हिंसा, कट्टरपंथ और आर्थिक दबाव से जूझता रह गया.
उन्होंने कहा, “1999 के तख्तापलट के बाद जो सरकार आई वो भी अमेरिका की ओर से बढ़ावा दिए जाने के लिए बड़ी बेसब्र थी.”
“यूनाइटेड नेशंस में हिलेरी क्लिंटन के भाषण में सबकुछ बयान किया हुआ है कि किस तरह पाकिस्तान को उन्होंने इस्तेमाल किया. लैंडमार्क तकरीर (भाषण) है उनकी. और वो किस तरह एक टिश्यू पेपर…टिश्यू पेपर तो फिर भी ठीक है, टॉयलेट पेपर की तरह हमें छोड़ गए यहां. फिर भी हमने उससे न सीखा. और दो घंटे के लिए यहां बिल क्लिंटन आए तो उस समय के सियासतदानों ने माला पहनानी शुरू कर दीं कि बिल क्लिंटन आ गए.”
साल 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन कुछ घंटों के लिए पाकिस्तान के दौरे पर गए थे.
ख्वाजा आसिफ़ ने कहा, “अगर टोटल लगाया जाए तो उन्होंने (अमेरिका) 20-25 सालों में करीब 10 करोड़ मुसलमानों को मारा है. उन्होंने गद्दाफ़ी के बेटे को भी नहीं छोड़ा.”
उन्होंने कहा, “9/11 के बारे में आज तक नहीं पता चला कि किसने करवाया, अफ़ग़ानिस्तान ने तो नहीं कराया था. कोई पश्तून नहीं था हमला करने वालों में. मगर हम उसमें भी ढाई दशक तक किराए पर अवेलेबल (अमेरिका के लिए) हो गए. मकसद ये था कि जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को अमेरिकन बैसाखियां चाहिए थी.”
ख्वाजा आसिफ़ ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में 22-23 सालों में जो पाकिस्तान की भूमिका रही, उसकी वजह से ही पाकिस्तान में आज दहशतगर्दी बढ़ी है. उन्होंने कहा, “ये उसी का ब्लोबैक है.”
आसिफ़ के बयान पर कैसी प्रतिक्रिया?
ख्वाजा आसिफ़ के अमेरिका के ख़िलाफ़ दिए बयान पर पाकिस्तानी मीडिया में ख़ास ज़ोर नहीं दिखा. बल्कि डॉन न्यूज़, द नेशन ने अपनी रिपोर्ट में उनके भाषण को विपक्षी नेता महमूद ख़ान के उस बयान का जवाब बताया है, जिसमें पाकिस्तानी सेना की भूमिका को ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बताया गया था.
डॉन न्यूज़ ने लिखा है, “रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ़ ने दो अफ़ग़ान युद्धों में पाकिस्तान की भूमिका को गलती करार दिया और कहा कि आज देश में जो आतंकवाद है वह अतीत के तानाशाह नेताओं की ग़लतियों का नतीजा है.”
डॉन न्यूज़ ने ख्वाजा आसिफ़ के बयान के उस हिस्से को भी जगह दी है जिसमें उन्होंने कहा कि राजनीतिक हितों को साधने के लिए नेता अब सैनिकों के जनाज़े में भी नहीं जाते.
डॉन न्यूज़ के मुताबिक,ख्वाजा आसिफ़ ने पाकिस्तान में चरमपंथ को बढ़ावा देने के लिए भारत को ज़िम्मेदार बताया और कहा, “भारत अफ़ग़ान आतंकवादियों का इस्तेमाल हमारे ख़िलाफ़ कर रहा है. भारत पाकिस्तान में प्रॉक्सी वॉर लड़ रहा है.”
भारत ने पाकिस्तान के इन आरोपों का खंडन किया है.
हालांकि, आसिफ़ के बयान की आलोचना भी हो रही है.
अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के राजदूत रह चुके ज़ालमी ख़लीलज़ाद ने एक्स पर लिखा, “ख्वाजा आसिफ़ ने पाकिस्तान की संसद में कहा कि उनके देश ने 9/11 के बाद आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग में खुद को अमेरिका के लिए किराए पर दे दिया. ये छिपा नहीं है कि पाकिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी अभियानों में मदद के बदले सैन्य और वित्तीय सहायता मिली थी.”
उन्होंने लिखा, “ये भी जगज़ाहिर है कि पाकिस्तान की हुकूमत उसी समय एक साथ उन्हें भी संरक्षण दे रही थी जो अमेरिकी बलों के ख़िलाफ़ अफ़ग़ानिस्तान में लड़ रहे थे. तो क्या हुकूमत दोहरा खेल इसलिए खेल रही थी ताकि दूसरी ताकत से अमेरिका को कमज़ोर करने के लिए भी किराया ले सके? क्या मंत्री आसिफ़ ये बता पाएंगे कि अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी बलों के ख़िलाफ़ लड़ने वालों के संरक्षण देने के बदले हुकूमत को क्या और किससे मिला? या हुकूमत ने ये किसी और वजहों से किया? इनके जवाब वाकई दिलचस्प होंगे.”
उतार-चढ़ाव भरे रहे अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते
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पिछले चार दशकों में अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के हर सैन्य दख़ल के दौरान पाकिस्तान ने एक अहम भूमिका निभाई है.
पाकिस्तान 1980 के दशक के सोवियत विरोधी संघर्ष से लेकर 9/11 के बाद अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैन्य अभियान से लेकर 2021 में सेना की वापसी तक अमेरिका के साथ दिखा है. पाकिस्तान 2001 के हमले के बाद चरमपंथ के ख़िलाफ़ अमेरिका की जंग में उसका सबसे बड़ा सहयोगी देश बन गया था और बदले में उसे अमेरिका की ओर से सैन्य और आर्थिक मदद मिलती रही.
हालांकि, पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में उतार-चढ़ाव भी आते रहे हैं.
अमेरिका का मानना था कि पाकिस्तान ने मदद के बदले उस तरह काम नहीं किया जैसा अमेरिका चाहता था. अल-क़ायदा चीफ़ ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने पाकिस्तान के ऐबटाबाद में ही एक विशेष अभियान में मार दिया था. इसे पाकिस्तान में उसकी एकता और अखंडता पर हमला भी माना गया था.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी अपने पहले कार्यकाल में पाकिस्तान के प्रति कड़े कदम उठाते दिखे थे. उन्होंने पाकिस्तान को अमेरिका की ओर से मिलने वाली करोड़ो रुपये की फंडिंग भी रोक दी थी. उनके बाद जो बाइडन के कार्यकाल में भी अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में कोई सुधार नहीं दिखा.
अप्रैल 2022 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद से हटाए जाने से पहले इमरान ख़ान खुलकर अमेरिका के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करने लगे. उन्होंने अपनी पीएम पद की कुर्सी जाने का आरोप भी उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन पर लगाया था.
हालांकि, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्ते फिर से पटरी पर आते दिख रहे हैं.
ट्रंप ने, पिछले साल मई में जब भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष हुआ तो इसे रोकने में अहम भूमिका निभाने का दावा किया. उसके अगले ही महीने डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में पाकिस्तान के फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर को लंच पर बुलाया.
पाकिस्तान ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया और अब वह ग़ज़ा में सीज़फ़ायर के लिए अमेरिका के पीस बोर्ड का भी सदस्य है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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