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‘पहले घर तोड़ा अब वोटर लिस्ट से नाम काटा जा रहा है… हमारी नागरिकता का क्या होगा?’ असम में एसआर को लेकर क्या है डर?

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Source :- BBC INDIA

फ़ाज़िला ख़ातून कहती हैं कि चिंता से न नींद आती है और न ही कुछ खाया पिया जा रहा है

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“अगर वोटर लिस्ट से नाम कट गया तो हमारी नागरिकता ख़त्म हो जाएगी. चिंता से न नींद आती है और न ही कुछ खाया पिया जा रहा है. हमारे मकान तोड़ दिए गए अब अगर नागरिकता नहीं रही तो कहां जाएंगे?”

इतना कहते ही 50 साल की फ़ाज़िला ख़ातून रोने लगती है. फ़ाज़िला इस समय नौगांव ज़िले के कचुआ थाना क्षेत्र में चानखुला के एक खुले मैदान में प्लास्टिक की बनी झुग्गी में रह रही हैं.

एसआर यानी स्पेशल रिवीज़न से जुड़े एक नोटिस को दिखाते हुए फ़ाज़िला कहती हैं, “मैं नोटिस मिलने के बाद बेटों के साथ हर उस दफ़्तर गई जहां हमें बुलाया गया. अधिकारी को सारे कागज़ दिखाए. तीन-चार बार सुनवाई के लिए गए. नहीं जाते तो वोटर लिस्ट से नाम काट दिया जाता.”

“अब भी मन में डर बैठा है. टेंशन हो रही है. हमारी नागरिकता नहीं बची तो क्या होगा? कुछ लोग बोल रहे है कि हमारा नाम काट दिया है. किसके पास जाऊं? क्या करूं, कुछ सोच नहीं पा रही हूं.”

नौगांव ज़िले के चानखुला के एक बड़े से खेत में रंग-बिरंगी प्लास्टिक से बनी छोटी-छोटी सैकड़ों झुग्गियां दूर सड़क से ही दिख जाती हैं.

करीब डेढ़ महीने पहले यहां आकर बसे लगभग 331 परिवार नौगांव ज़िले के लुटुमारी रिज़र्व फ़ॉरेस्ट के अंतर्गत अलग-अलग गांवों के रहने वाले थे.

पिछले साल 29 नवंबर से लगातार दो दिन चले एक बड़े अतिक्रमण हटाओ अभियान में लुटुमारी रिज़र्व फ़ॉरेस्ट में करीब 6 हज़ार बीघा (लगभग 798 हेक्टेयर) कब्ज़े वाली ज़मीन खाली कराई गई थी.

सरकारी ज़मीन से हटाए जाने के बाद इन लोगों के सामने स्थाई पता बदलने की समस्या उत्पन्न हो गई. अब जगह बदलने के कारण इन लोगों को वोटर लिस्ट के स्पेशल रिवीज़न के लिए होजाई ज़िले में संपर्क करना पड़ रहा है.

क्या है एसआर या स्पेशल रिवीज़न, जिसका डर है?

असम प्रदेश बीजेपी स्पेशल रिवीज़न को भारत के चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट को अपडेट करने की एक संवैधानिक प्रक्रिया बताती है

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चुनाव आयोग के अनुसार इस एसआर प्रक्रिया के तहत बूथ लेवल ऑफ़िसर (बीएलओ) घर-घर जाकर मतदाताओं का वैरिफ़िकेशन करेंगे. जबकि चुनाव आयोग उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल समेत देश के 9 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) का काम कर रहा है.

असम में शुरू हुई एसआर प्रक्रिया में नागरिकता की स्थिति पर ध्यान दिए बिना मौजूदा मतदाता सूची का फिज़िकल वैरिफ़िकेशन और इसे अपडेट करना शामिल होगा. एसआर के तहत बीएलओ मौजूदा वोटरों की डिटेल्स वाले पहले से भरे हुए फ़ॉर्म का इस्तेमाल करके वैरिफ़िकेशन के लिए घर-घर जाएंगे. असम में लगभग 29,656 बीएलओ को एसआर के काम में लगाया गया है.

वहीं ठीक इसके उलट एसआईआर में सभी रजिस्टर्ड वोटरों को मतदाता सूची में बने रहने के लिए गिनती के फ़ॉर्म जमा करने होंगे. इस प्रक्रिया में हर मतदाता से नागरिकता का सबूत मांगा जाएगा. एसआईआर में जिन वोटरों का नाम वैरिफ़ाई नहीं होगा उनका नाम लिस्ट से हटाया जा सकता है.

एसआईआर को लेकर चीफ़ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार ने 27 अक्तूबर को एक आदेश जारी किया था. उस समय असम को इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया. चुनाव आयोग ने इसकी वजह बताते हुए कहा था कि भारत के नागरिकता कानूनों में असम के लिए एक अलग प्रावधान है.

दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नागरिकता पहचान प्रक्रिया का काम अंतिम चरण में है. लिहाज़ा असम में फिलहाल एसआईआर का काम नहीं किया जा सकता.

लेकिन इस आदेश के महज कुछ दिन बाद असम में ‘स्पेशल रिवीज़न’ की घोषणा की गई जिसे लेकर राज्य का राजनीतिक माहौल गरमा गया.

बेदखली अभियान से पता बदला, अब नाम कटने का डर

नौगांव ज़िले के चानखुला में प्लास्टिक से बनी झुग्गियों में रहने वाले 331 परिवार लुटुमारी रिज़र्व फ़ॉरेस्ट के अंतर्गत अलग-अलग गांव के रहने वाले थे

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असम में चुनावी लिस्ट को लेकर स्पेशल रिवीज़न के दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है. असल में जिन लोगों के घर राज्य में बड़े पैमाने पर बेदखली अभियान के तहत गिरा दिए गए थे, उन्हें एसआर की सुनवाई के लिए कतार में लगना पड़ा.

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि जिन लोगों के घर तोड़े गए थे उनका अब पता बदल गया है. कई मामलों में तो विधानसभा क्षेत्र तक बदल गया है. पता बदलने की वजह से उनमें से अधिकतर लोगों को नोटिस भेजे गए.

10 फरवरी को मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन किया जाएगा. इस तारीख को लेकर राज्य में, ख़ासकर बंगाली मूल के मुसलमानों में, डर का माहौल है.

51 साल की मिनारा बेगम भी उन लोगों में शामिल है जिनको नोटिस मिला है. चानखुला में ही प्लास्टिक की एक छोटी सी झुग्गी में बीते डेढ़ महीने से रह रही मिनारा नोटिस मिलने के बाद से बहुत परेशान हैं.

वह कहती हैं, “40 साल से जिस ज़मीन पर रह रहे थे उसे सरकारी बताते हुए हमारा मकान तोड़ दिया गया. रहने की कोई जगह नहीं बची थी, इसलिए यहां किसी और के खेत में तंबू बनाकर रह रहे हैं. अब वोटर लिस्ट से नाम काटने की बात हो रही है. नोटिस मिलने के बाद अब तक कई तारीख़ों पर सुनवाई में जा चुकी हूं. सारे कागज़ भी जमा किए हैं परंतु हमें परेशान किया जा रहा है. पता नहीं 10 फरवरी को क्या होगा?”

असम के सीएम ने अब तक क्या-क्या कहा?

हिमंत बिस्वा सरमा का कोट

असम में इसी महीने के मध्य में विधानसभा चुनावों की तारीखें घोषित होने की संभावना है. मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा राज्य के अलग-अलग हिस्सों में आयोजित सभाओं में स्पेशल रिवीज़न समेत कई मुद्दों पर बात कर रहे हैं. लेकिन मुख्यमंत्री ख़ासकर मियां मुसलमानों के मसले पर काफ़ी आक्रामक होते दिख रहे हैं.

मुख्यमंत्री ने 2025 के आखिर और 2026 की शुरुआत में मियां मुसलमानों को लेकर ऐसे कई बयान दिए हैं जिनकी वजह से वह लगातार सुर्खियों में है.

राज्य में एसआर प्रक्रिया की घोषणा के बाद बीते साल 20 नवंबर को सीएम सरमा ने मीडिया के समक्ष कहा था, “मैं जब तक मुख्यमंत्री हूं, असम में कोई भी ‘मियां’ चैन से नहीं रह सकता. यह पक्की बात है. जो मियां संदिग्ध नागरिक है उनको कष्ट देना ही मेरा काम है. मियां समुदाय को शांति तभी मिल सकती है जब मुझे सीएम की कुर्सी से हटा दिया जाएगा.”

मुख्यमंत्री का यह बयान असल में आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए उनकी चुनावी रणनीति का भी एक साफ़ संकेत था. इसके बाद उन्होंने एक तरह से मियां मुसलमानों के ख़िलाफ़ मोर्चा ही खोल दिया.

दरअसल असम में बंगाली मूल के मुसलमानों को बोलचाल की भाषा में मियां कहकर संबोधित किया जाता है. असम में मियां मुसलमान का मतलब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए हुए मुसलमानों से है.

इन्हीं मियां मुसलमानों पर मुख्यमंत्री ने इस साल जनवरी में कहा, “जो जैसे हो सके मियां को परेशान करें. आप लोग भी उन्हें कष्ट दो. रिक्शा में चढ़ने पर अगर पांच रुपए मांगे तो आप 4 रुपये दो. परेशान होने पर ही वह लोग असम से जाएंगे.”

मुख्यमंत्री ने अपने इसी बयान में आगे कहा, “मियां का विषय कोई मुद्दा नहीं है. हिमंत बिस्वा सरमा और बीजेपी सीधे मियां के ख़िलाफ़ है. अब मैं सबको प्रोत्साहित करता हूं कि मियां को परेशान करते रहो.”

सीएम सरमा के इन बयानों को सुन चुकी मिनारा बेगम कहती है, “हमें क्यों सताया जा रहा है? असम सरकार क्या करना चाहती है? न्यूज़ में देखा कि सीएम कह रहे है कि मियां मुसलमानों को परेशान करता रहूंगा. लेकिन हम लोग तो यहां के नागरिक हैं. मुसलमान होकर क्या हमने कोई अपराध कर दिया है? अगर ऐसा ही है तो सरकार हमें सीधे मार क्यों नहीं देती. इतना परेशान करने से अच्छा है हमें सीधे गोली मार दे.”

मोहम्मद तोता मियां का कोट

साल 2021 में हिमंत बिस्वा सरमा के असम के मुख्यमंत्री बनने के बाद से आरक्षित वनांचल की ज़मीन समेत मठ और दूसरी सरकारी ज़मीनों पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाने के अभियान चलाए गए हैं. सरकार के इस बेदखली अभियान में अब तक 50 हज़ार से ज़्यादा परिवार प्रभावित हुए हैं, जिनमें ज़्यादातर बंगाली मूल के मुसलमान हैं.

इन परिवारों को अपने घर को तोड़े जाने के कारण रहने के लिए दूसरी जगह इंतज़ाम करना पड़ा. जिसकी वजह से वे जहां वोटर के तौर पर रजिस्टर्ड थे वहां नाम कटने की तलवार लटक गई. इस वजह से उनमें से कई लोगों को उनके इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर से नोटिस मिले थे, जिसमें उन्हें ‘पता बदलने’ के कारण सुनवाई के लिए बुलाया गया था.

होजाई ज़िले में जिन लोगों को बेदखल किया गया था, उन्हें 7 जनवरी को नोटिस मिले थे और उन्हें 12 जनवरी को होजाई ज़िला कमिश्नर के ऑफिस में पेश होने के लिए कहा गया था.

40 साल के मोहम्मद तोता मियां 10 फरवरी को लेकर काफ़ी डरे हुए हैं.

होजाई ज़िला कमिश्नर से मुलाकात कर आए तोता मियां ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “माजगांव में हमारा परिवार करीब 40 सालों से रह रहा था लेकिन बीते नवंबर में हमारे मकान पर बुलडोज़र चला दिया गया. बाद में पता बदलने के कारण एसआर के नाम पर नोटिस भेजकर परिवार के सभी लोगों को दो अलग-अलग तारीखों पर बुलाया था. हमने सभी आवश्यक कागज़ जमा करवा दिए हैं. पता नहीं 10 फरवरी को जब मतदाता सूची का फ़ाइनल प्रकाशन होगा तब उसमें हम सबका नाम रहेगा या नहीं. इस चिंता में काम धंधा बंद हो गया है. जेब में एक पैसा नहीं है. हम भारतीय हैं, फिर हम पर इतना ज़ुल्म क्यों हो रहा है?”

ज़िला प्रशासन का क्या कहना है?

मिनारा बेगम का कोट

एसआर की मौजूदा प्रक्रिया को लेकर अधिकारियों ने चिंताएं दूर करने की कोशिश करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया नाम हटाने की कोशिश नहीं है.

होजाई के ज़िला उपायुक्त विद्युत विकास भागवती ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “स्पेशल रिवीज़न एक क़ानूनी प्रक्रिया है. जिनका यहां घर नहीं है और न कोई स्थाई पता है, वैसे लोगों के नाम काटे जाएंगे. लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है कि किसी भी नागरिक का नाम जान-बूझकर काटा जा रहा है. स्पेशल रिवीज़न यह पक्का करने के लिए है कि हर योग्य नागरिक को शामिल किया जाए.”

होजाई ज़िले में बेदखली अभियान के कारण जिन लोगों का पता बदला है उनके बारे में ज़िला उपायुक्त कहते है, “जमुना-मौडांगा रिज़र्व फ़ॉरेस्ट की ज़मीन पर कब्जा कर बैठे 1700 से ज्यादा परिवारों को वहां से हटाया गया है. लेकिन बेदखली से प्रभावित ऐसे लोगों में से एक अच्छे-खासे प्रतिशत ने पहले ही अपना पता बदलने के लिए फॉर्म 8 भर कर जमा करवाया है. इसके अलावा वो लोग जिस भी थाना क्षेत्र के अंतर्गत रह रहे हैं, वहां के ठिकाने के साथ अपना नाम मतदाता सूची में वापस शामिल कर सकते हैं.”

फ़ॉर्म 8 का इस्तेमाल पते में बदलाव या सुधार के लिए किया जाता है. इसके अलावा मुख्य निर्वाचन अधिकारी अनुराग गोयल का भी यह कहना है कि अगर किसी नागरिक का 10 फरवरी को प्रकाशित अंतिम सूची में नाम नहीं आता है तो उन्हें भी अपना नाम शामिल करने का मौका मिलेगा.

उन्होंने मीडिया से कहा, “10 फरवरी को वोटर लिस्ट की फ़ाइनल सूची बाहर आएगी. ऐसा हो सकता है कि जिनका नाम दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अवधि यानी 27 दिसंबर 2025 को लिस्ट में था, लेकिन वह फ़ाइनल लिस्ट में कट गया हो. ऐसे मामले में भी लोग चुनाव से पहले अपना नाम वापस जुड़वा सकेंगे. “

एसआर पर बीजेपी का रुख़

ऑल असम माइनॉरिटीज़ स्टूडेंट्स यूनियन ने 3 फरवरी को एक मानव श्रृंखला बनाकर एसआर प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप लगाया है

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असम प्रदेश बीजेपी स्पेशल रिवीज़न को भारत के चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट को अपडेट करने की एक संवैधानिक प्रक्रिया बताती है.

पहले बेदखली अभियान के तहत घर तोड़े जाने और वोटर लिस्ट से नाम काटने के आरोपों का जवाब देते हुए असम बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय कुमार गुप्ता कहते हैं, “हमारी पार्टी किसी भी नागरिक का घर नहीं तोड़ रही है और न ही किसी का नाम वोटर लिस्ट से काटा जा रहा है.”

“जिन लोगों ने सरकारी ज़मीन या फिर वनांचलों पर अवैध कब्जा कर रखा है उनको कोर्ट के आदेश के मुताबिक वहां से हटाया गया है. बात जहां तक वोटर लिस्ट से नाम काटने की है तो यह काम हमारी पार्टी का नहीं है. भारत का चुनाव आयोग एक कानूनी प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची को अपडेट कर रहा है. जिनके पास नागरिकता के कागजात नहीं है उनके नाम बिल्कुल काटे जाने चाहिए.”

इस बीच मियां मुसलमानों पर सीएम की टिप्पणी और एसआर के तहत भेजे जा रहे नोटिस के संदर्भ में पत्रकारों से बात करते हुए मुख्यमंत्री सरमा ने कहा, “एसआर एक संवैधानिक प्रक्रिया है. किसी को नोटिस अगर भेजा जाता है तो आप अधिकारी को जाकर बताइए कि आप भारतीय हैं. बस इतनी सी बात है. उसमें परेशान होने की क्या बात है. अगर कोई मेरी शिकायत भी करता है तो मैं भी सुनवाई में जाऊंगा.”

असम में इलेक्टोरल रोल को लेकर चल रहे स्पेशल रिवीज़न में मुख्य काम बूथ लेवल अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर मौजूदा लिस्ट में वोटरों का फिजिकल वेरिफ़िकेशन करना है. घर-घर जाकर किए गए सर्वे के आधार पर, कुल 4,78,992 मृत वोटर्स को लिस्ट से हटाने के लिए पहचाना गया है, जबकि 5,23,680 ‘शिफ्टेड’ वोटर्स और 53,619 डुप्लीकेट एंट्रीज़ को सुधारने के लिए पहचाना गया है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS