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नीतीश बने राज्यसभा सांसद, महागठबंधन के विधायकों ने कैसे बिगाड़ा तेजस्वी का गणित

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Source :- BBC INDIA

नीतीश कुमार

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बीस साल तक बिहार में मुख्यमंत्री रहने के बाद नीतीश कुमार अब फिर से ‘सांसद’ बन गए.

बिहार में राज्यसभा चुनावों में नीतीश कुमार सहित एनडीए के सभी पांचों उम्मीदवारों ने जीत हासिल की.

नीतीश कुमार लोकसभा में 6 बार सांसद चुने जा चुके हैं लेकिन स्वास्थ्य, उम्र के साथ बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में नीतीश इस बार राज्यसभा सांसद बने हैं.

सोमवार को बिहार विधानसभा में जब राज्यसभा उम्मीदवारों के लिए वोटिंग हो रही थी उस वक्त भी नीतीश बेफ़िक्र पटना डीएम ऑफ़िस के कैंपस का निरीक्षण कर रहे थे.

दिलचस्प है कि बिहार से खाली हुई 5 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव हुए. जिनमें से तीन पर तीन पार्टियों के राष्ट्रीय अध्यक्ष राज्यसभा पहुंचे हैं. बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा.

नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने पर बिहार के लोगों में बेचैनी है. नीतीश के पैतृक गांव कल्याणबिगहा के दीपक कुमार बीबीसी से कहते हैं, “ये तो डीजीपी से सिपाही बन जाने जैसा है.”

इन तीनों के अलावा एनडीए के दो अन्य उम्मीदवार जो राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए हैं वो बीजेपी के शिवेश राम और जेडीयू के रामनाथ ठाकुर.

एनडीए का पांचवां उम्मीदवार भी जीता

नितिन नवीन

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मिली जानकारी के मुताबिक़, सोमवार को हुए राज्यसभा चुनाव में नीतीश कुमार और नितिन नबीन को 44-44 वोट, उपेन्द्र कुशवाहा और रामनाथ ठाकुर को 42-42 वोट मिले हैं.

एनडीए के पांचवें उम्मीदवार शिवेश राम जिनका मुक़ाबला राजद उम्मीदवार अमरेन्द्र धारी सिंह से था. शिवेश राम को प्रथम वरीयता में 30 वोट मिले.

अमरेन्द्र धारी सिंह को 37 वोट मिले हैं लेकिन शिवेश राम की जीत द्वितीय वरीयता में हुई है. इस चुनाव में जीत के लिए हर उम्मीदवार को 41 वोट हासिल करना था.

एनडीए के जिन उम्मीदवारों ने जीत हासिल की, उनमें एक सवर्ण, दो पिछड़ा, एक दलित और एक अति पिछड़ा है.

साल 2024 में शिवेश राम सासाराम लोकसभा सीट से चुनाव हार गए थे. उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार मनोज राम ने शिकस्त दी थी.

शिवेश राम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं. वहीं केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर, कर्पूरी ठाकुर के बेटे हैं. जेडीयू उन्हें तीसरी बार राज्यसभा भेज रही है.

रामनाथ ठाकुर से पहले जेडीयू ने किसी भी नेता को तीसरी बार राज्यसभा नहीं भेजा है. पार्टी अली अनवर, किंग महेन्द्र सहित कई नेताओं को दो बार राज्यसभा का टर्म दे चुकी है.

राज्यसभा के लिए 5 सीटों पर पांचवें उम्मीदवार के तौर पर शिवेश राम का नामांकन हुआ था. चूंकि एनडीए के 202 विधायक थे, इसलिए 4 प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित थी, लेकिन पांचवीं सीट पर लड़ाई थी.

राजद ने अपने निवर्तमान सांसद अमरेन्द्र धारी सिंह को उम्मीदवार बनाया था.

अमरेन्द्र धारी सिंह पटना के पालीगंज के एनखां गांव के रहने वाले हैं. कारोबारी अमरेन्द्र धारी सिंह ‘एडी’ नाम से प्रचलित हैं और साल 2020 में भूमिहार जाति से ताल्लुक रखने वाले अमरेन्द्र धारी को राज्यसभा उम्मीदवार बनाकर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने सबको चौंकाया था.

प्रभावशाली और संपन्न भूमिहार परिवार से आने वाले अमरेन्द्र धारी के लिए लॉबिंग करने की ज़िम्मेदारी कांग्रेस के एक बड़े नेता को मिली थी.

एआईएमआईएम का साथ मिला, लेकिन अपने ही बने बेगाने

फ़ैसल रहमान

लेकिन कांग्रेस के तीन विधायक वोटिंग से ही ग़ायब रहे. वाल्मीकिनगर से विधायक सुरेन्द्र प्रसाद, मनिहारी से मनोहर प्रसाद सिंह और फारबिसगंज से मनोज बिस्वास.

इन तीन विधायकों के अलावा ढाका से राजद विधायक फ़ैसल रहमान भी वोट डालने नहीं आए.

फ़ैसल रहमान ने मीडिया से बातचीत में कहा, “मेरी मां की तबियत ख़राब है जिसके चलते मुझे अचानक दिल्ली जाना पड़ा. मुझे कोई ख़रीद नहीं सकता. मैं कल भी महागठबंधन के साथ था और आगे भी महागठबंधन के साथ रहूंगा. मेरे नेता (तेजस्वी) को मेरी परेशानी समझनी चाहिए.”

वहीं कांग्रेस प्रवक्ता राजेश राठौड़ ने बीबीसी से कहा, “हमारे विधायकों का अपहरण हो गया है. हम लोग उनसे संपर्क ही नहीं कर पा रहे हैं. सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करके वो जीत गया जिनके पास कम वोट थे.”

नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) के पांच विधायकों और बसपा के एक विधायक को अमरेन्द्र धारी के पक्ष में वोट डलवाने में कामयाब रहे, लेकिन कांग्रेस विधायकों और अपने ही एक विधायक को वो अपने पाले में नहीं रख सके.

दरअसल महागठबंधन, एआईएमआईएम और बसपा विधायकों को जोड़ दें तो यह जीत के लिए ज़रूरी 41 वोटों के आंकड़े तक पहुंच जाता है.

‘हमें नहीं कहा जाए बीजेपी की बी टीम’

असदुद्दीन ओवैसी

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लेकिन 13 मार्च के बाद कांग्रेस विधायकों के फ़ोन ‘नॉट रीचेबल’ होने से महागठबंधन की जीत पर आशंका के बादल छाने शुरू हो गए थे.

वैसे अगर प्रदेश कांग्रेस की गतिविधियां भी देखें तो बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरू पूरे सीन से ग़ायब रहे.

प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम पटना में तो थे लेकिन उन्होंने चुनाव से पहले अपने विधायकों के साथ एक दफे भी संयुक्त बैठक नहीं की. साथ ही 6 विधायकों वाली कांग्रेस पार्टी का अब तक विधानसभा में कोई नेता भी चुना नहीं गया है.

राजद के प्रवक्ता चितरंजन गगन बीबीसी से कहते हैं, “हम अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थे लेकिन बीजेपी सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करके हमारे विधायकों को बंधक बना कर चुनाव जीती है.”

साल 2025 के विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव ने एआईएमआईएम को “एक्सट्रिमिस्ट” कहा था जिसके जवाब में असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था, “सिर पर टोपी और चेहरे पर दाढ़ी देखकर एक्सट्रिमिस्ट कहा, ये पूरे सीमांचल के आवाम की तौहीन है.”

एआईएमआईएम के स्टैंड पर पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आदिल हसन बीबीसी से कहते हैं, “हमने बीजेपी को हराने के लिए वोट दिया है. हमारा महागठबंधन के साथ कोई अलायंस नहीं है. वैसे भी चुनाव दूर है. कांग्रेस ने इस चुनाव बीजेपी की बी टीम की तरह काम किया है इसलिए अब कांग्रेस को एआईएमआईएम को बीजेपी की बी-टीम कहने से पहले सोचना चाहिए.”

कांग्रेस लाए ‘जिताऊ’ की बजाए ‘टिकाऊ’ नेता

कांग्रेस का बिहार में हाल

वरिष्ठ पत्रकार अरुण श्रीवास्तव बीबीसी से कहते हैं, “मैं महागठबंधन के कैंडिडेट की हार को कांग्रेस के नज़रिए से देखता हूं. राहुल गांधी बहुत सारे सवाल उठा रहे हैं लेकिन पार्टी का कैडर उनके साथ कैसे बना रहे और कैसे मजबूत हो, इसको लेकर पार्टी की कोई रणनीति ही नहीं है.”

“ये तीनों विधायक जो वोटिंग से एबसेंट रहे, वो मूल कांग्रेसी नहीं है. पार्टी जिताऊ नेता पर निवेश कर रही है लेकिन उसे टिकाऊ नेता को लाना चाहिए.”

कांग्रेस के तीन विधायक जो वोट डालने नहीं आए, उनका अगर पॉलिटिकल प्रोफ़ाइल देखें तो वाल्मीकिनगर से विधायक सुरेन्द्र प्रसाद, साल 2015 में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (उपेन्द्र कुशवाहा की पुरानी पार्टी) से विधायक का चुनाव लड़ चुके हैं.”

“उन्होंने कांग्रेस जुलाई 2024 में ज्वाइन की थी. वहीं मनिहारी से विधायक मनोहर प्रसाद सिंह साल 2015 में जेडीयू से कांग्रेस पार्टी में आए थे.”

दरअसल उस वक्त कांग्रेस, जेडीयू और राजद साथ मिलकर चुनाव लड़ रहीं थीं. कांग्रेस के कोटे में ये मनिहारी सीट आई जिसके बाद मनोहर प्रसाद सिंह ने कांग्रेस ज्वाइन कर ली.

मनोहर प्रसाद सिंह इस सीट को साल 2010 से जीत रहे हैं और चार बार विधायक रहे हैं.

कांग्रेस के तीसरे विधायक जिन्होंने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया, वो फारबिसगंज के मनोज बिस्वास हैं. इस सीट पर 35 साल से बीजेपी के विद्दासागर केसरी का कब्ज़ा था.

मनोज बिस्वास पहले जेडीयू और राजद में रह चुके हैं. 6 अक्तूबर 2025 को उन्होंने नॉमिनेशन के कुछ दिन पहले ही कांग्रेस ज्वाइन की और जीत हासिल की.

मनोज बिस्वास ने बीबीसी से कहा, “हमने 13 मार्च को ही अपने प्रदेश अध्यक्ष को कह दिया था कि जिस गठबंधन में आपका सम्मान नहीं है, वहां हम क्यों वोट डालने जाएंगे. ऐसी आंधी में चुनाव जीतकर हम आए हैं तो मेरे बिकने की बातें बेकार है.”

नीतीश के सामने चुनौती

अरविंद शर्मा का कोट

75 साल के नीतीश की चुनावी जीत का सिलसिला साल 1985 में बिहार विधानसभा से शुरू हुआ. 1989 में वो पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए. साल 2004 में वो छठी बार सांसद चुने गए लेकिन नवंबर 2005 में उन्होंने बिहार की सत्ता संभाल ली.

रील के ज़माने में नीतीश कुमार के लोकसभा में दिए वक्तव्यों की छोटी-छोटी क्लिप्स वायरल होती रही हैं. समाजवाद, सांसदों को मिलने वाली सुविधाओं, नीतिगत निर्णयों आदि से जुड़े उनके वक्तव्यों में उनका राजनीतिक पैनापन दिखता है.

वरिष्ठ समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने नीतीश कुमार और लालू यादव दोनों को ही समाजवादी युवजन सभा से कभी जोड़ा था.

वह बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, “1970 के शुरुआती दिनों में लालू यादव ज़्यादा पॉपुलर थे, नीतीश की पॉप्यूलैरिटी वैसी नहीं थी. नीतीश का उभार जेपी के आंदोलन से होता है और उसके बाद नीतीश ख़ुद को परिपक्व करते हैं.”

ऐसे में जब नीतीश कुमार राज्यसभा सांसद बनकर केन्द्रीय राजनीति का फिर से हिस्सा बनने जा रहे हैं तो उनके सामने चुनौतियां भी होंगी.

नीतीश कुमार अपने बेटे निशांत के साथ

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पार्टी प्रवक्ता अंजुम आरा कहती हैं, “केन्द्र में भी एनडीए की सरकार है इसलिए उनके सामने कोई चुनौती नहीं है. राज्य की राजनीति से नीतीश कुमार के जाने का दुख सभी को है लेकिन ये आश्वासन भी है कि ये सरकार नीतीश कुमार के सात निश्चय – 3 के प्रोग्राम पर ही चलेगी.”

वहीं वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शर्मा कहते हैं कि नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी को बचाना है, “उनकी पार्टी का आधार अति पिछड़े हैं और सेकेंड लाइन के सारे नेता फ़ारवर्ड है. दूसरा है कि उन्होंने अपने बेटे निशांत को लॉन्च कर दिया है लेकिन उन्हें प्रथम श्रेणी का नेता भी बनाना होगा.”

“तीसरा, केन्द्रीय और राज्य दोनों ही राजनीति में उनकी छवि विकास पुरुष की रही है. अब जब वो एक साधारण राज्यसभा सांसद होंगे तो अपनी उस छवि को बनाए रखना ही बड़ी चुनौती होगी.”

दरअसल नीतीश का अपना रिकॉर्ड ही उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

हाल के सालों में पटना के पत्रकारों से उन्होंने एक दूरी बना ली है. उन्हें हमेशा एक तरह के ‘सुरक्षा घेरे’ में रखा जाता है जो उनके करीबी नेताओं ने उनके लिए तैयार किया है.

पटना से दिल्ली जा रहे नीतीश के लिए क्या वही सुरक्षा घेरा दोबारा बुना जाएगा और मीडिया से दूर रखने की जुगत बैठाई जाएगी? ‘पुराना नीतीश’ ही ‘नए नीतीश’ की असली चुनौती है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS