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बिहार की राजनीति में पिछले क़रीब दो महीने में तीन बड़ी घटनाएं हुईं.
बिहार के नितिन नबीन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. तेजस्वी यादव ने राष्ट्रीय जनता दल की कमान अपने हाथ में ले ली और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री का पद छोड़ राज्यसभा की सदस्यता लेने जा रहे हैं.
इन तीनों घटनाओं का बिहार की राजनीति पर असर लंबे समय तक रहेगा.
नीतीश कुमार की बिहार की राजनीति से विदाई को मंडल पॉलिटिक्स के अंत के रूप में भी देखा जा रहा है.
2020 के विधानसभा चुनाव में बिहार के पूर्णिया ज़िले में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए नीतीश कुमार ने कहा था कि यह उनका आख़िरी चुनाव है और अंत भला तो सब भला.
नीतीश कुमार ने कहा था, ”और ये जान लीजिए कि यह मेरा आख़िरी चुनाव है. अंत भला तो सब भला.”
नीतीश कुमार की इस अपील के बावजूद उनकी पार्टी को 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद सबसे कम 43 सीटें मिलीं. इसके बावजूद नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने.
लेकिन इस चुनाव के बाद नीतीश कुमार अपनी पुरानी पहचान को धीरे-धीरे छोड़ना शुरू कर चुके थे.
छवि को लेकर हमेशा सतर्क
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नीतीश कुमार अपनी छवि को लेकर राजनीति में हमेशा से सतर्क रहे. लालू यादव इस मामले में नीतीश के बिल्कुल उलट थे.
नीतीश को क़रीब से जानने वाले बताते हैं कि वह निजी बातचीत में भी ख़ुद को बहुत औपचारिक रखते थे जबकि लालू यादव निजी बातचीत हो या सार्वजनिक रैलियां बहुत अनौपचारिक हो जाते थे.
इसी का नतीजा था कि नीतीश कुमार बिहार में कभी एक जाति के नेता के रूप में नहीं जाने गए. नीतीश कुमार की स्वीकार्यता बिहार में लगभग हर जाति और धर्म में रही.

बिहार के जाने-माने समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने लालू और नीतीश दोनों को बहुत क़रीब से देखा है.
तिवारी एक वाक़या का ज़िक्र करते हुए बताते हैं, ”1994 में कुर्मी चेतना रैली थी. नीतीश कुमार को इस रैली में आमंत्रित किया गया था. हम सबका मन था कि नीतीश कुमार जाएं. लेकिन ऐन मौक़े पर नीतीश मना करने लगे. उन्हें लग रहा था कि दूसरी जातियों में इसका अच्छा संदेश नहीं जाएगा. लेकिन बाद में मैंने उन्हें बहुत समझाया और अपनी ही गाड़ी में बिठाकर ले गया. नीतीश कुमार अपनी सार्वजनिक जीवन में अपनी छवि को लेकर बहुत ही सचेत रहे हैं.”
सरयू राय झारखंड में जेडीयू के इकलौते विधायक हैं. राय नीतीश कुमार के संघर्ष के दिनों से दोस्त हैं.
वह बताते हैं कि दो महीने पहले ही उनकी मुलाक़ात नीतीश कुमार से हुई थी लेकिन उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगी थी कि वह मुख्यमंत्री का पद छोड़ राज्यसभा जाने वाले हैं.
सरयू राय कहते हैं, ”नीतीश कुमार की एक ख़ासियत रही है कि वह अपने ख़ास दोस्तों के सामने भी एक दायरे से ज़्यादा नहीं खुलते हैं. उन्होंने कई बार अपमान का घूँट चुपचाप पिया है. बात 1992 की है. लालू यादव तब जनता दल से बिहार के मुख्यमंत्री थे. दिल्ली स्थित बिहार निवास में मैं, ललन सिंह और नीतीश कुमार लालू यादव से मिलने गए. लालू यादव ने बहुत ही अपमानजनक तरीक़े से ललन सिंह को वहाँ से भगा दिया. मुझे भी लालू ने अपमानित किया.”
नीतीश कुमार की चुप्पी
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राय कहते हैं, ”नीतीश कुमार बिल्कुल चुप रहे. लेकिन उनके चेहरे पर नाराज़गी साफ़ झलक रही थी. शिवानंद तिवारी लालू पर भड़क गए. उन्होंने कहा कि यह कोई बात करने की तरीक़ा नहीं है. उन्होंने कहा कि बुनियादी सम्मान तो सबको मिलना चाहिए. इसके बाद लालू थोड़े शांत हुए. नीतीश कुमार ने घर जाने के बाद मुझे फोन किया. मैं गया तो उन्होंने कहा कि लालू जी को एक पत्र लिखिए. मैंने पत्र लिखा. यह बात शरद यादव को पता चली और उन्होंने पत्र ले लिया. लेकिन नीतीश कुमार ने हिन्दुस्तान के तत्कालीन पत्रकार हेमंत जी को बता दिया कि पत्र में क्या-क्या लिखा है. अगले दिन हिन्दुस्तान में वह पत्र प्रकाशित हो गया.”
इस वाक़ये की पुष्टि करते हुए शिवानंद तिवारी भी कहते हैं, ”लालू ने हिन्दुस्तान के मालिक को फोन कर दिया कि जो पत्र सार्वजनिक ही नहीं हुआ है, वो छप कैसे गया. यह फ़र्ज़ी पत्र छपा है. हेमंत की नौकरी पर बात आ गई थी. बाद में नीतीश ने बताया कि पत्र लिखा गया था.”
हेमंत इस पूरे वाक़ये पर कहते हैं कि उनके लिए ऐसी स्थिति हो गई थी कुछ भी कह पाना मुश्किल था. हेमंत कहते हैं, ”नीतीश दोस्त रहे थे तो इतना भरोसा कर ही सकता था.”
सरयू राय कहते हैं कि नीतीश कुमार चाहते तो बिहार निवास में ही लालू से उलझ सकते थे लेकिन उन्होंने इसे बिल्कुल औपचारिक रूप दिया.
राय कहते हैं, ”नीतीश कुमार की जब तक सेहत ठीक रही है, पूरे तेवर में रहे और मर्यादा के साथ. पहले उनसे जब मैं मिलता था तो अकेले में बात होती थी लेकिन अब हमेशा उनके आसपास विजय चौधरी, संजय झा और कुछ ब्यूरोक्रेट्स रहते हैं. मुझे नहीं लगता है कि राज्यसभा जाने का फ़ैसला उनका है. अगर राज्यसभा जाना था तो वह नवंबर में मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं लेते. यह फ़ैसला बीजेपी का है.”
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक श्रीकांत ने नीतीश कुमार के उस पत्र को अपनी किताब ‘बिहार: चिट्ठियों की राजनीति’ में छापा है.
इस पत्र में नीतीश कुमार ने लालू यादव की बढ़ती कथित मनमानी को लेकर कई सारी शिकायतें की हैं.
बिहार की राजनीति में लालू और नीतीश के उभार को क़रीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार संजय सिंह कहते हैं, ”नीतीश कुमार का व्यक्तित्व नसीरुद्दीन शाह की तरह लगता है. नसीर ने अपनी पहचान श्याम बेनेगल के साथ काम कर समानांतर सिनेमा से बनाई लेकिन आख़िर में विवेक अग्निहोत्री जैसे निर्देशक के साथ भी काम कर लिया.”
नीतीश की स्वीकार्यता
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संजय सिंह कहते हैं, ”2005 में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बने मुश्किल से 15 दिन हुए थे. हम कई पत्रकार उनसे मिलने गए थे. नीतीश कुमार ने कहा कि अभी व्यवस्था में जो नौकरशाह हैं, उनसे काम कराना मुश्किल है. हमने नीतीश को सलाह दी कि लालू जिस भाषा में ब्यूरोक्रेट्स से बात करते थे, उस भाषा की उन्हें आदत लग गई है और आप उनसे शालीनता से बात करेंगे. इस पर नीतीश ने कहा कि मैं अपनी भाषा तो ख़राब नहीं करूंगा. देखता हूँ कि अच्छी भाषा में काम कैसे नहीं होता है.”
नीतीश कुमार अपनी छवि को लेकर इस हद तक सतर्क रहते थे कि नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा करने से भी परहेज करते थे. लेकिन नीतीश कुमार की यह सतर्कता उनके साथ हमेशा नहीं रही.
संजय सिंह कहते हैं कि नीतीश कुमार का उभार जिस पहचान के साथ हुआ, अंत उससे बिल्कुल अलग है.
संजय सिंह कहते हैं, ”जेडीयू व्यक्ति केंद्रित पार्टी है. अगर वह व्यक्ति ही नहीं रहेगा तो पार्टी भी नहीं रहेगी. मुझे लगता है कि अब जेडीयू और बीजेपी में कोई फ़र्क़ नहीं रहेगा. बहुत संभव है कि बीजेपी जेडीयू को प्रॉक्सी को रूप में ज़िंदा रखे.”
पूरे घटनाक्रम पर जेडीयू नेता नीरज कुमार कहते हैं, ”हमारे लिए बहुत मुश्किल समय है. हमें तो कुछ पता भी नहीं था कि ऐसा होने वाला है. कार्यकर्ता बहुत नाराज़ हैं. मुझे नहीं पता है कि इसके बाद की राह क्या होगी.”
लालू यादव बिहार की सत्ता में भागलपुर में 1989 के दंगे के बाद आए थे.
लालू यादव ने अपने शासन में बिहार में धार्मिक ध्रुवीकरण नहीं होने दिया लेकिन जातीय सद्भावना के लिहाज से हालात बेकाबू रहे. लालू परिवार के शासन में बिहार में कई जातीय जनसंहार हुए.
2005 में नीतीश कुमार जब मुख्यमंत्री बने तो धार्मिक के साथ जातीय सद्भावना को भी कायम रखने में कामयाब रहे.
शिवानंद तिवारी नीतीश कुमार को कैसे याद करेंगे?
तिवारी कहते हैं, ”एक दुखांत नाटक की तरह. कहाँ हम नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में देखते थे लेकिन उनकी राजनीति से विदाई उनके अनुचर के रूप में हुई.”
लालू को मुख्यमंत्री बनाने में नीतीश की भूमिका
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लालू यादव को मुख्यमंत्री बनाने में नीतीश कुमार की अहम भूमिका रही थी. लालू यादव मार्च 1990 में जनता दल से बिहार के मुख्यमंत्री बने तब विश्वनाथ प्रताप सिंह जनता दल के अध्यक्ष थे.
वीपी सिंह चाहते थे कि बिहार के मुख्यमंत्री राम सुंदर दास बनें. दूसरी तरफ़ जनता दल के दूसरे दिग्गज नेता और उप-प्रधानमंत्री देवीलाल लालू यादव के पक्ष में थे.
नीतीश कुमार भी लालू यादव के पक्ष में ही थे. लेकिन जनता दल के शीर्ष नेतृत्व के ख़िलाफ़ विधायक कैसे जा सकते थे?
संजय सिंह कहते हैं, ”चंद्रशेखर और विश्वनाथ प्रताप सिंह की बनती नहीं थी. ऐसे में नीतीश कुमार ने चाल चली. नीतीश कुमार ने कहा कि वीपी सिंह को रोकिए नहीं तो यहाँ अपने मन का सीएम बना देंगे. चंद्रशेखर को भी अपना दबदबा दिखाने का मौक़ा मिल गया. चंद्रशेखर ने रघुनाथ झा को आगे कर दिया.”
ऐसे में मुख्यमंत्री के तीन दावेदार हो गए. लालू यादव, राम सुंदर दास और तीसरे रघुनाथ झा.
विधायकों ने वोटिंग के ज़रिए नेता चुना और सात विधायकों ने रघुनाथ झा के पक्ष में वोट कर दिया. ऐसे में लालू यादव तीन वोट से जीत गए और वीपी सिंह का दांव नाकाम रहा.
राजनीतिक विश्लेषक जेडीयू के पूर्व नेता प्रेम कुमार मणि कहते हैं, ”तब नीतीश कुमार तब लालू यादव की तरक़्क़ी में ही अपनी तरक़्क़ी देखते थे. पुराने समाजवादी नेता लालू और नीतीश को जगह देने के लिए तैयार नहीं थे. दूसरी बात यह भी कि नीतीश कुमार जिस कुर्मी जाति से हैं, उसकी तादाद बिहार में बहुत कम है जबकि यादव 18 फ़ीसदी हैं. ऐसे में नीतीश अपनी सीमा समझते थे. नीतीश कुमार को लगता था कि उन्होंने लालू को सीएम बनाने में जिस तरह की मदद की, उसके बाद लालू उनकी हर बात सुनेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और दोनों की राह अलग हो गई.”
1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू यादव और नीतीश अलग हो चुके थे. कथित ऊँची जातियों के ख़िलाफ़ पिछड़ी जातियों की जो गोलबंदी 1990 के विधानसभा चुनाव में दिखी थी, वो नीतीश और लालू के अलग होने से टूटती दिखी.
बिहार में पिछड़ी जातियों में यादव और कोइरी-कुर्मी सबसे प्रभावशाली जातियाँ हैं. लेकिन 1995 के विधानसभा चुनाव में दोनों का नेतृत्व अलग हो गया. कोइरी-कुर्मी और यादवों में एकजुटता ऊँची जातियों के ख़िलाफ़ बनी थी, लेकिन आगे चलकर दोनों की महत्वाकांक्षा आपस में ही टकराने लगी.
हालाँकि 1995 चुनाव में नीतीश कुमार कुछ ख़ास नहीं कर पाए. समता पार्टी सात सीटों तक ही सीमित रह गई, लेकिन 2000 का विधानसभा चुनाव आते-आते यादवों के वर्चस्व को लेकर पिछड़ी जातियों के भीतर से ही आवाज़ उठने लगी.
नीतीश की विदाई अलग पहचान के साथ
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नीतीश कुमार ने ग़ैर-यादव ओबीसी जातियों को एकजुट किया और इस राजनीति में उन्हें बिहार की तथाकथित ऊँची जातियों का भी साथ मिला.
2000 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और बीजेपी को 121 सीटों पर कामयाबी मिली. नीतीश कुमार बिना बहुमत के मुख्यमंत्री बने. हालाँकि एक हफ़्ते के भीतर ही नीतीश को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
इसके बाद कांग्रेस के समर्थन से फिर राबड़ी देवी मु्ख्यमंत्री बनीं. हालाँकि कांग्रेस 2000 के विधानसभा चुनाव में अकेले मैदान में गई थी और चुनाव बाद लालू के साथ आ गई. कांग्रेस को 23 सीटें मिली थीं और राबड़ी देवी की सरकार के साथ वह सत्ता में साझीदार बनी.
आख़िरकार नीतीश कुमार 2005 में बिहार के मुख्यमंत्री बन गए. अक्तूबर 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 55 और जेडीयू को 88 सीटों पर जीत मिली और पूर्ण बहुमत के साथ गठबंधन सरकार बनी.
2010 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को और प्रचंड जीत मिली. लालू-रामविलास का गठबंधन 25 सीटों पर ही सिमटकर रह गया, जबकि एनडीए को 243 सीटों वाली विधानसभा में 206 सीटों पर जीत मिली. जेडीयू 115 सीट जीतने में कामयाब रही और बीजेपी 91.
लालू यादव के लिए यह शर्मनाक हार थी, लेकिन यह नीतीश की जीत के साथ हिंदुत्व की राजनीति की भी बड़ी जीत थी.
1990 के बाद से बीजेपी का वोट शेयर लगातार बढ़ता गया. 2010 की जीत के बाद भी नीतीश कुमार अपनी सेक्युलर छवि को लेकर उसी तेवर में रहे.
2013 में बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए पीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. नीतीश कुमार ने मोदी के आते ही ख़ुद को बीजेपी से अलग कर लिया.
नीतीश कुमार को 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी से अलग होने का ख़ामियाजा भुगतना पड़ा.
नीतीश की जदयू महज दो सीटें ही जीत पाई जबकि बीजेपी ने 30 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 22 पर जीत दर्ज की.
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