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दूध और चीज खाने से जर्मनी में कैसे बढ़ रहा कार्बन उत्सर्जन

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Source :- LIVE HINDUSTAN

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जलवायु परिवर्तन पर जर्मनी के खान-पान का गहरा प्रभाव है, जहां ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का लगभग एक चौथाई हिस्सा खान-पान से जुड़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि मांस और डेयरी उत्पादों का सेवन कम करने और…

दूध और चीज खाने से जर्मनी में कैसे बढ़ रहा कार्बन उत्सर्जन

हमारा रहन-सहन ही नहीं बल्कि हमारा खान-पान भी जलवायु परिवर्तन पर गहरा प्रभाव डालता है.जर्मनी के विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ आदतों में बदलाव करके कार्बन उत्सर्जन को संतुलित किया जा सकता है.एक नई रिपोर्ट में सामने आया है कि जर्मनी में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का लगभग एक चौथाई हिस्सा खान-पान से जुड़ा है.जर्मनी के आगोरा अगरार नामक थिंक टैंक की रिपोर्ट के अनुसार, जर्मनी में केवल खान पान से हर साल लगभग 23.5 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन पैदा होता है.यह आंकड़ा वैल्यू चेन यानी कच्चे माल को अंतिम उत्पाद में बदलने से लेकर उसके घर तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया के दौरान हुआ उत्सर्जन है.रिपोर्ट में कहा गया, “इस उत्सर्जन का लगभग 70 फीसदी हिस्सा पशु-आधारित खाद्य पदार्थों के उपभोग के कारण होता है”अलग अलग ग्रीनहाउस गैसें जलवायु पर अलग अलग तरह से असर डालती हैं.इस तुलना को आसान बनाने के लिए उन्हें CO2 में बदल दिया जाता है ताकि सबको एक ही पैमाने पर मापा जा सके.उपभोग से जुड़े कार्बन उत्सर्जन में वह सभी उत्सर्जन शामिल होते हैं, जो किसी देश में इस्तेमाल होने वाले सामान या सेवाओं के कारण पैदा होते हैं, चाहे यह उत्सर्जन दुनिया के किसी भी हिस्से में हुआ हो.इस रिपोर्ट के अनुसार, जर्मनी में एक औसत व्यक्ति हर साल लगभग 642 किलोग्राम खाद्य पदार्थ खरीदता है, यानी प्रति व्यक्ति रोज करीब 1.76 किलोग्राम खाद्य पदार्थ खरीदे जाते हैं.हालांकि, खरीदा गया सारा खाना खाया नहीं जाता बल्कि इसका काफी हिस्सा फेंका भी जाता है.इसमें से लगभग 120 किलोग्राम यानी 18 फीसदी से भी अधिक हिस्सा सिर्फ डेयरी उत्पादों जैसे दूध, दही और चीज का होता है.कृषि कार्बन-उत्सर्जन की बड़ी वजह अपनी खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जरूरी कृषि भूमि का लगभग 55 फीसदी हिस्सा जर्मनी के पास है और 45 फीसदी हिस्सा दूसरे देशों में है.इसका मतलब हुआ कि ज्यादातर जरूरी खाद्य पदार्थ जैसे दूध, मांस और अनाज जर्मनी में ही पैदा हो जाते हैं, लेकिन कुछ अन्य आवश्यक चीजें जैसे जैतून, नींबू और मेवे विदेशों से आयात करने पड़ते हैं.कृषि से होने वाला उत्सर्जन धीरे धीरे घट रहे हैं.रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ सालों में ऊर्जा और उद्योग क्षेत्र में कृषि की तुलना में बहुत तेजी से उत्सर्जन घटा है.अगर यह रुझान जारी रहा, तो 2045 तक कृषि से होने वाला उत्सर्जन, कुल ऊर्जा और उद्योग उत्सर्जन से ज्यादा हो सकता है.इस संस्था के अनुसार, जलवायु पर प्रभाव कम करने का सबसे कारगर तरीका नवीनीकृत ऊर्जा जैसे सौर और पवन ऊर्जा का इस्तेमाल करना, मांस और डेयरी की जगह अधिक वनस्पति आधारित आहार जैसे फल, सब्जियां और दाल आदि खाना हो सकता है.साथ ही, कृषि में इस्तेमाल होने वाले दलदली इलाकों (मूर) को फिर से गीला करना भी कार्बन उत्सर्जन को कम करने में एक अहम भूमिका निभा सकता है.मूर का संरक्षण जरूरीदलदली भूमि (मूर) के सूखने से वहां जमा कार्बन, CO2 के रूप में वातावरण में निकलता है.रिपोर्ट के अनुसार, “कृषि में इस्तेमाल होने वाली दलदली भूमि पर हर साल केवल खाद्य उत्पादन के कारण लगभग 2.7 करोड़ टन CO2 उत्सर्जन होता है” इस जमीन का अधिकतर हिस्सा जर्मनी में है और पशु उत्पादों जैसे गाय पालन आदि के लिए इस्तेमाल किया जाता है.आगोरा अगरार के अनुसार, कुल उत्सर्जन में पशु उत्पादों जैसे मांस, दूध आदि का इतना बड़ा हिस्सा होने के तीन मुख्य कारण हैं.पहला, ऊर्जा नुकसान क्योंकि पशुओं को अपने शरीर के कामकाज के लिए भी ऊर्जा चाहिए.दूसरा, चारा उत्पादन क्योंकि जानवरों के लिए भोजन उगाना भी उत्सर्जन पैदा करता है और तीसरा, पेट में गैस बनना क्योंकि गाय जैसे पशुओं के पाचन से मीथेन गैस बनती है, जो कि CO2 की तुलना में लगभग 30 गुना ज्यादा तेजी से जलवायु पर असर डालती है.हार्डचीज का जलवायु परिवर्तन पर गंभीर असर डेयरी उत्पादों से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन सबसे ज्यादा होता है.इस उत्सर्जन का लगभग आधा हिस्सा सिर्फ चीज से आता है.रिपोर्ट के अनुसार, “चीज बनाने के लिए जितना ज्यादा दूध इस्तेमाल होता है, उतना ही ज्यादा उत्सर्जन बढ़ता है” एक किलो फ्रेश चीज बनाने में लगभग चार लीटर दूध लगता है, लेकिन अगर एक किलो हार्डचीज बनानी हो तो दूध की मात्र सीधे तीन गुना (13 लीटर) हो जाती है यानी ज्यादा उत्सर्जन.रिपोर्ट में पानी, सोडा, बीयर, चाय और कॉफी के उत्सर्जन को भी देखा गया.उनका कुल उत्सर्जन लगभग 1.35 करोड़ टन CO2 के बराबर है.खाद्य-पदार्थों के मुकाबले यह काफी कम है क्योंकि ज्यादातर पे-पदार्थ पानी से बने होते हैं और पानी के उत्पादन में ज्यादा ग्रीनहाउस गैस नहीं निकलती है.खाद्य पदार्थ उत्पादन के साथ जलवायु संतुलन संभव आगोरा अगरार के विशेषज्ञों ने “खाद्य-पदार्थों की जलवायु प्रभावशीलता” नाम का एक संकेतक भी सुझाया है.यह संकेतक प्रति व्यक्ति और प्रति वर्ष खाद्य पदार्थों से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को दिखाता है.अगर इसे लंबे समय तक मापा जाए, तो यह बता सकता है कि हमारा खाना जलवायु लक्ष्यों में कितना योगदान देता है.यह नीतियों के प्रभाव जैसे पर्यावरण के लिए बनाए गए नियमों का भी आकलन करने में मदद कर सकता है.वर्तमान में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष यह मानक लगभग 2.8 टन CO2 के बराबर है लेकिन अगर सख्त और प्रभावी नीतियां लागू की जाती हैं तो इस सदी के मध्य तक इसे घटाकर लगभग 0.7 टन प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष भी किया जा सकता है.आगोरा अगरार के विशेषज्ञों के अनुसार इसके लिए जरूरी है कि जर्मनी में ऊर्जा उत्पादन के लिए मुख्य रूप से नवीनीकृत ऊर्जा का इस्तेमाल हो, मांस और डेयरी का सेवन आधा हो, खाद्य उत्पादन में उत्सर्जन कम करने वाली तकनीकें इस्तेमाल हों और कृषि में इस्तेमाल होने वाले दलदली क्षेत्रों (मूर) को फिर से स्वस्थ बनाया जाए.

SOURCE : LIVE HINDUSTAN