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ट्रंप के टैरिफ़ पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का एशियाई देशों पर क्या असर पड़ेगा?

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Source :- BBC INDIA

मोदी ट्रंप

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राष्ट्रपति ट्रंप ने साल 2025 में जो टैरिफ़ लगाए थे, उन्हें अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ग़ैरकानूनी घोषित कर दिया है. कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद एशिया में अमेरिका के ख़ास कारोबारी सहयोगियों में अनिश्चितता की एक नई लहर आ गई है.

बीते शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद, ट्रंप ने कहा कि वह अमेरिका में आने वाले सामान पर 15% की नई ग्लोबल लेवी (टैक्स) लगाएंगे.

अमेरिकी कस्टम विभाग ने सोमवार को कहा कि वह उस ख़ास व्यापार नीति से जुड़े टैरिफ़ का कलेक्शन रोक देगा, जिसका इस्तेमाल ट्रंप ने ग्लोबल ट्रेड वॉर शुरू करने के लिए किया था.

यह भारत से लेकर इंडोनेशिया तक की सरकारों के लिए एक बड़ा झटका है, जिन्होंने अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर बातचीत करने में कई महीनों का समय लगाया था. इन में से कई देशों ने अमेरिका में अरबों डॉलर निवेश करने का वादा किया था.

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विश्लेषकों ने बीबीसी को बताया कि नया टैरिफ़ रेट कई एशियाई देशों के लिए फायदेमंद लग रहा है लेकिन अब भी इसे लेकर काफ़ी अनिश्चितताएं बनी हुई हैं.

ऑक्सफ़र्ड इकोनॉमिक्स के एडम सैमडिन ने कहा, “भले ही देश बातचीत करने का फैसला करें, भले ही कोई फ़ैसला रद्द कर दिया गया हो, लेकिन मौजूदा अमेरिकी प्रशासन अभी भी ज़्यादा टैरिफ लगाने की कोशिश कर रहा है.”

उन्होंने आगे कहा कि हाल के महीनों में अमेरिका के साथ साइन किए गए ट्रेड डील में पारंपरिक समझौतों की तरह स्पष्ट और कानूनी तौर पर मानने वाले समझौते नहीं हैं.

सैमडिन ने कहा, “एशिया की ज़्यादातर छोटी अर्थव्यवस्था वाले देश भी ट्रंप की नाराज़गी को लेकर सावधानी बरतेंगे क्योंकि उनकी स्थिति काफ़ी हद तक ट्रंप प्रशासन के साथ उनके रिश्तों पर निर्भर करेगी.”

‘चीन एकतरफा टैरिफ़ के ख़िलाफ़’

ट्रंप और शी जिनपिंग

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पूरे इलाक़े यानी एशिया के अलग-अलग देशों की सरकारें अब ट्रंप के नए एलान को देख रही हैं.

चीन अप्रैल की शुरुआत में ट्रंप की मेज़बानी करने की तैयारी कर रहा है. चीन ने कहा कि वह इस फैसले के तथ्यों और असर का पूरी तरह से आकलन कर रहा है.

चीन के वाणिज्य मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा, “चीन ने हमेशा एकतरफ़ा टैरिफ़ बढ़ोतरी का विरोध किया है और बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया है कि ट्रेड वॉर में कोई नहीं जीतता, और संरक्षणवाद (घरेलू उद्योगों का) से कुछ हासिल नहीं होता.”

रविवार को अमेरिकी ट्रेड रिप्रेज़ेंटेटिव जैमीसन ग्रीर ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि इन बदलावों का चीन और उसके नेता शी जिनपिंग के साथ अमेरिका की बातचीत पर कोई असर पड़ेगा.”

ग्रीर ने एबीसी न्यूज़ को बताया, “राष्ट्रपति शी के साथ इस मीटिंग का मक़सद ट्रेड को लेकर झगड़ना नहीं है. इसका मक़सद स्थायित्व बनाए रखना है. यह पक्का करना है कि चीन हमारी डील में अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहा है और अमेरिकी कृषि उत्पाद, बोइंग विमान और दूसरी चीज़ें ख़रीद रहा है.”

एशियाई देशों में असमंजस के हालात

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और जापानी प्रधानमंत्री सनेई तकाइची

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एशिया में अमेरिका के साथी देश भी इस बात को लेकर निश्चित नहीं हैं कि ट्रंप की ट्रेड पॉलिसी के साथ आगे क्या होगा.

पिछले सप्ताह के अंत में जापानी सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा कि उनका देश इस फैसले के कंटेंट और इस पर ट्रंप प्रशासन के जवाब को ध्यान से देखने के बाद ही उचित प्रतिक्रिया देगा.

लेकिन प्रधानमंत्री सनेई तकाइची की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के एक एग्जीक्यूटिव और पूर्व रक्षा मंत्री, सीनोरी ओनोडेरा ने नए टैरिफ़ रेट को लेकर चिंता जताई.

ओनोडेरा मौजूदा सरकार का हिस्सा नहीं हैं.

उन्होंने रविवार को एक टीवी शो में कहा, “एक साथी के तौर पर, मुझे चिंता है कि इससे अन्य देश अमेरिका से दूरी बनाने लगेंगे.”

दक्षिण कोरिया के उद्योग मंत्री किम जंग-क्वान ने सोमवार को कहा कि पहले से चुकाए गए टैरिफ़ के संभावित रिफंड को लेकर अभी भी कुछ निश्चित नहीं है.

किम ने यह भी कहा कि कंप्यूटर चिप्स उन टैरिफ़ के दायरे में नहीं आएंगे जिन्हें ट्रंप ने फ़ैसले के बाद घोषित किया था.

चिप्स के प्रमुख उत्पादक ताइवान ने शनिवार को कहा कि ‘हम पर इसका असर कम लग रहा है लेकिन सरकार हालात पर क़रीब से नज़र रखेगी और अमेरिका के साथ क़रीबी संपर्क बनाए रखेगी.’

सिंगापुर का टैरिफ़ रेट ट्रंप की नई घोषणा के बाद 10% से बढ़ाकर 15% कर दिया गया था. अब सिंगापुर ने कहा है कि वह स्थिति पर नज़र रख रहा है और जल्द ही अमेरिकी अधिकारियों से मिलकर यह स्पष्ट करेगा कि नए टैरिफ़ कैसे लागू किए जाएँगे.

सिंगापुर के वाणिज्य मंत्रालय ने बीबीसी को बताया कि फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और एनर्जी जैसे क्षेत्रों पर नए कदमों का असर नहीं पड़ेगा.

एशिया के कई देशों ने अमेरिका को अपना निर्यात बढ़ाकर अपनी अर्थव्यवस्था बेहतर की थी, ऐसे देशों को अप्रैल में ट्रंप के बड़े “लिबरेशन डे” टैरिफ़ से ख़ास तौर पर बहुत ज़्यादा नुक़सान हुआ.

पिछले हफ़्ते, इंडोनेशिया और अमेरिका ने साउथ-ईस्ट एशियाई देश पर अमेरिकी टैरिफ़ को 32% से घटाकर 19% करने के लिए एक समझौते को अंतिम रूप दिया. बदले में अमेरिका को उसके बाज़ार तक ख़ास पहुंच दी गई.

नए टैरिफ़ को लंबे समय तक लागू रखने के लिए मंज़ूरी ज़रूरी

ट्रंप

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इसी तरह ताइवान ने भी अरबों डॉलर के निवेश के बदले अमेरिका से 15% कम टैरिफ़ हासिल किए. जापान ने साल 2025 के आख़िर में अमेरिका के साथ रेयर अर्थ मिनरल्स के प्रोडक्शन में तेज़ी लाने के लिए एक समझौता किया.

जापान चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए ज़रूरी मिनरल्स की सप्लाई को डायवर्सिफाई करने की कोशिश में लगा है.

अमेरिकी ट्रेड रिप्रेज़ेंटेटिव जैमीसन ग्रीर ने सीबीएस को बताया कि अमेरिका उन देशों के साथ बातचीत कर रहा है जिन्होंने ट्रंप प्रशासन के साथ व्यापार समझौते किए थे और टैरिफ़ पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से किसी ने भी पीछे हटने का प्लान नहीं बताया है.

ग्रीर ने कहा, “हम उनके साथ खड़े रहेंगे. हम उम्मीद करते हैं कि हमारे पार्टनर उनके साथ खड़े रहेंगे.”

यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिडनी की सैंड्रा एल्डे ने कहा कि एक फ़्लैट 15% टैरिफ़ रेट से उन एशियाई देशों की इकॉनमी पर सबसे ज़्यादा असर पड़ सकता है जो अमेरिका को ‘तैयार उत्पाद’ एक्सपोर्ट करते हैं.

उन्होंने आगे कहा कि जो देश अमेरिका में तैयार होने वाले सामान के लिए माल सप्लाई करते हैं, उनपर इसका असर ज़्यादा जटिल होगा और इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है.

लेकिन एल्डे ने कहा कि ‘जब टैरिफ़ पूरी दुनिया में लागू होंगे, तो एक बात पक्की है कि अमेरिका में विदेशी प्रोडक्ट्स आम तौर पर ज़्यादा महंगे होंगे.’

ट्रंप का नया 15% टैक्स रेट ट्रेड एक्ट की सेक्शन 122 के तहत एक अस्थायी समाधान है और यह क़रीब पांच महीने तक लागू रह सकता है. इस टैरिफ़ को आगे लागू रखने के लिए ट्रंप प्रशासन को अमेरिकी कांग्रेस से मंज़ूरी लेनी होगी.

यह नया टैक्स ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए भी सवाल खड़े करता है, जो पहले अमेरिका के साथ 10% टैरिफ़ पर सहमत हुए थे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS