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जीन्स और BMI का खेल : 1 से 18 साल के बीच तय हो जाता है डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल का जोखिम

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Source :- LIVE HINDUSTAN

निकोल वारिंगटन और उनकी टीम ने अपने अध्ययन में यह साबित कर दिया है कि 1 से 18 साल के बीच बच्चे की विकास दर (Growth Rate) महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उसके शरीर का वह बायोलॉजिकल ब्लूप्रिंट है जो बुढ़ापे तक की बीमारियों का संकेत दे देता है।

क्या बचपन का मोटापा सिर्फ खान-पान की देन है या हमारे डीएनए में ही इसकी कहानी लिखी जा चुकी है? ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड विश्वविद्यालय का यह ताजा अध्ययन इसी गुत्थी को सुलझाता है। रिसर्च का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि 10 साल की उम्र हमारे भविष्य की सेहत का वह ‘टर्निंग पॉइंट’ है, जहां जीन तय कर देते हैं कि आगे चलकर हमें डायबिटीज, उच्च कोलेस्ट्रॉल या दिल की बीमारियां घेरेंगी या नहीं। निकोल वारिंगटन और उनकी टीम ने अपने अध्ययन में यह साबित कर दिया है कि 1 से 18 साल के बीच बच्चे की विकास दर (Growth Rate) महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उसके शरीर का वह बायोलॉजिकल ब्लूप्रिंट है जो बुढ़ापे तक की बीमारियों का संकेत दे देता है।

वारिंगटन कहते हैं कि, ‘हमने पाया कि एक से अठारह वर्ष की आयु तक बच्चों के शारीरिक वजन में होने वाले बदलावों में से लगभग एक चौथाई अंतर आनुवंशिकी के कारण होता है।’ शोध के यह परिणाम बताते हैं कि जनसंख्या औसत के आधार पर विकास का आकलन करते समय हम महत्वपूर्ण जानकारी को अनदेखा कर रहे हैं।

पेरेंट्स की चिंता को नया आधार देती है रिसर्च

वांग कहते हैं कि,जब बात बच्चों की सेहत की आती है, तो माता-पिता अक्सर एक-दूसरे के बच्चों से तुलना कर परेशान हो जाते हैं लेकिन क्वींसलैंड विश्वविद्यालय की यह रिसर्च इस चिंता को एक बिल्कुल नया वैज्ञानिक आधार देती है। लगभग 6,300 बच्चों के 66,000 बीएमआई (BMI) मापों का यह गहन विश्लेषण यह साबित करता है कि बच्चे का वजन बढ़ना या विकास की गति केवल खान-पान नहीं, बल्कि उसके डीएनए (DNA) की वृद्धि दर पर भी निर्भर करती है।

क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के पोस्टडॉक्टोरल रिसर्च फेलो और इस अध्ययन के लेखक गेंग वांग ने बताया कि बच्चों की वृद्धि का विश्लेषण किसी एक उम्र की जगह समय के साथ करने से शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिली कि बच्चे की आनुवंशिकी उसकी वृद्धि दर को कैसे प्रभावित करती है।

वांग कहते हैं कि शिशु के शरीर के आकार में योगदान देने वाले आनुवंशिक कारक किशोर के शरीर के आकार में योगदान देने वाले कारकों से भिन्न हो सकते हैं।

बचपन की सेहत

क्वींसलैंड विश्वविद्यालय का यह शोध माता-पिता की उस पुरानी चिंता को खत्म करता है कि बचपन में शरीर की बनावट ही भविष्य का इकलौता सच है। शोधकर्ताओं का यह संदेश साफ है कि बचपन का ‘बेबी फैट’ या दुबलापन हमेशा उम्र भर का मोटापा या कमजोरी नहीं बनता। हमारे जीन विकास के अलग-अलग चरणों में खुद को अभिव्यक्त करते हैं, जिससे शरीर का आकार समय के साथ बदलता रहता है।

सटीक हस्तक्षेप

निकोल वारिंगटन के अनुसार, अब अगला कदम उस ‘गोल्डन एज’ को पहचानना है, जहां सही खान-पान और आदतों के जरिए मोटापे को सबसे प्रभावी ढंग से रोका जा सके।

विश्वसनीय डेटा का आधार

यह पूरा विश्लेषण ब्रिटेन के मशहूर ‘चिल्ड्रन ऑफ द 90s’ (ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी) के डेटा पर आधारित है, जो आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारकों को समझने का दुनिया का सबसे भरोसेमंद स्रोत माना जाता है।

पैनिक नहीं, समझदारी की जरूरत

यह रिसर्च हमें सिखाती है कि बच्चों के विकास की तुलना दूसरों से करने के बजाय उनके लॉन्ग-टर्म हेल्थ पैटर्न को समझना चाहिए। बचपन के शारीरिक बदलाव अक्सर विकास की एक प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं, न कि किसी स्थायी बीमारी का संकेत।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN