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घर और दफ़्तर के बीच नींद की समस्या से जूझती महिलाएं

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Source :- BBC INDIA

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“जब मैं प्रेग्नेंट थी, उस दौरान मुझे घर का काम, पति का काम और नौकरी सब कुछ एक साथ देखनी पड़ रही थी. तब से लेकर अब तक मेरी नींद पूरी ही नहीं पाई है. आज भी मैं नींद पूरी ना होने की समस्या से जूझ रही हूं.”

ये कहना है दिल्ली की रहने वाली बेनज़ीर हिना का जो अब एक सिंगल मदर हैं और एक निजी कंपनी में काम करती हैं. बेनज़ीर अकेली ऐसी मां और महिला नहीं हैं जिन्हें नींद की समस्या से जूझना पड़ रहा है.

हाल ही में ग्लोबल हेल्थ टेक्नोलॉजी कंपनी ‘रेसमेड’ का नींद पर एक सर्वे आया है. इस सर्वे के मुताबिक, दुनियाभर में करोड़ों लोग ठीक से नींद न आने की समस्या से जूझ रहे हैं.

इसी सर्वे में यह भी सामने आया है कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं नींद के संकट से अधिक जूझ रही हैं. इस सर्वे के मुताबिक अगर पुरुष औसत एक हफ्ते में 4.13 दिन ठीक से नींद ले पाते हैं. वहीं महिलाएं हफ्ते में 3.83 दिन ही ठीक से नींद ले पाती हैं.

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हालांकि अधिकांश लोग अमेरिकन एकेडमी ऑफ़ स्लीप मेडिसिन्स के सुझाए समय के मुताबिक़ सात घंटे की नींद लेते हैं. लेकिन ऐसे लोगों की तादाद भी कम नहीं है जिनकी हफ़्ते में क़रीब तीन रातें ऐसी होती हैं जब उन्हें ठीक से नींद नहीं आती है.

ग्लोबल हेल्थ टेक्नोलॉजी कंपनी ‘रेसमेड’ के एक ताज़ा सर्वे के मुताबिक, कम नींद से जूझ रहे 22 फ़ीसदी लोग हैं जो डॉक्टर के पास नहीं जाते हैं और इसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं. यह संख्या अमेरिका, जापान और सिंगापुर में 33 फ़ीसदी और ऑस्ट्रेलिया में 41फ़ीसदी तक है.

दुनियाभर में कराए गए इस सर्वे के मुताबिक, 29 फ़ीसदी लोग हफ़्ते में तीन या उससे ज्यादा बार ठीक से सो नहीं पाते हैं. जबकि 34 फ़ीसदी लोग नींद न आने की समस्या से जूझते हैं.

इस सर्वे में लोगों के नींद की समस्या से जूझने की वजह तनाव (57%), बैचेनी (46%) और आर्थिक दबाव (31%) हैं.

तनाव की वजह से नींद की समस्या से जूझने वाले देशों में सबसे आगे भारत है. इस रिपोर्ट के मुताबिक 69 फ़ीसदी भारतीय ठीक से नींद नहीं ले पा रहे हैं.

जबकि सिंगापुर में 65 फ़ीसदी, थाईलैंड में 65 फ़ीसदी और दक्षिण कोरिया में 67 फ़ीसदी लोग इस परेशानी से जूझ रहे हैं.

वहीं वैश्विक स्तर पर 53 फ़ीसदी जेन ज़ी को बैचेनी की वजह से नींद की समस्या है.

पुरुषों के मुकाबले महिलाएं क्यों लेती हैं कम नींद?

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रेसमेड के ग्लोबल स्लीप सर्वे में यह भी सामने आया है कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं नींद के संकट से अधिक जूझ रही हैं.

लॉफबोरो यूनिवर्सिटी स्लीप रिसर्च सेंटर की स्टडी के मुताबिक, महिलाएं दिनभर में कई तरह के काम करती हैं जिसकी वजह से उन्हें पुरुषों की तुलना में ज्यादा और अच्छी नींद चाहिए होती है.

बेनज़ीर एक निज़ी कंपनी में काम करती है उन्होंने अपनी नींद की समस्या पर बीबीसी से बात की.

उन्होंने कहा, “कामकाजी महिला के पास आर्थिक आज़ादी तो हैं, लेकिन कहीं ना कहीं घर और ऑफिस दोनों की ज़िम्मेदारी महिलाओं के हिस्से ही आती हैं. जिससे कामकाजी महिलाएं को कामकाजी पुरुषों की तुलना में नींद के संकट से ज़्यादा जूझना पड़ रहा है.”

स्लीप मेडिसिन में महिलाओं के स्वास्थ्य और नींद पर एक स्टडी छपी थी. इस स्टडी में पाया गया है कि पीरियड्स के दौरान महिलाओं को नींद ना आने की समस्या का ज्यादा सामना करना पड़ता है.

प्रेगेंसी के दौरान हार्मोंन्स में परिवर्तन की वजह से महिलाओं में नींद की अनियमतता बनी रहती है.

वैश्विक स्तर पर, शोध से पता चला है कि मेनोपॉस के दौरान नींद संबंधी समस्याएं काफी आम रहती हैं, जो 51फीसदी महिलाओं को प्रभावित करती है.

हार्मोनल बदलाव किस तरह से महिलाओं की नींद को प्रभावित करती है. इस पर बीबीसी ने गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. सरिता श्यामसुंदर से बात की.

उन्होंने बताया कि पीरियड्स के दौरान एस्ट्रोजन (स्त्री हार्मोन) और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्तर कम हो जाता है. हर महीने पीरियड्स के दौरान इसी तरह से हार्मोनल बदलाव होते है.

उन्होंने कहा, “कई बार पीरियड्स भी समय से पहले और समय के बाद आते है तो वहीं कई बार पीरियड्स में ज्यादा ब्लड निकलता है जिससे एनीमिया भी हो जाता है. जिससे औरतों को थकान लगती है. और इससे उनकी नींद प्रभावित होती है.”

डॉ. सरिता श्यामसुंदर ने ये भी बताया कि पीरियड्स के दौरान पेट में दर्द होने से भी महिलाओं की नींद में काफी असर पड़ता है.

भारत में बढ़ते स्लीप डाइवोर्स के मामले

स्लीप डाइवोर्स

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अपने रिश्ते को बचाने के लिए कई लोग अपने पार्टनर से अलग कमरे में सोना बेहतर समझते है. भारत में कई जोड़े इस पैटर्न को अपना रहे हैं. इस पैटर्न को स्लीप डाइवोर्स कहा जाता है.

इस सर्वे में 30,026 लोगों को शामिल किया गया था.

ग्लोबल हेल्थ टेक्नोलॉजी कंपनी ‘रेसमेड’ ने स्लीप डाइवोर्स पर एक रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 18 फीसदी जोड़े हर रात अलग सोते हैं.

वहीं इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत वह देश हैं जहां सबसे ज्यादा स्लीप डाइवोर्स के मामले सामने आए है. लगभग 78 फीसदी लोग भारत में कभी-कभी अपने पाटर्नर से अलग सोते हैं.

अमेरिका और ब्रिटेन में भी लोग स्लीप डाइवोर्स के पैटर्न को अपना रहे हैं. दोनों देशों में जहां 50 फीसदी लोग हमेशा साथ सोते हैं और वहीं 50 फीसदी कभी-कभी अलग सोते हैं.

नींद की समस्या

स्लीप डाइवोर्स पर बीबीसी हिंदी ने मनोवैज्ञानिक डॉ पूजाशिवम जेटली से बात की.

उन्होंने बताया कि लोगों के सोने के समय और तरीक़े कई बार अपने पार्टनर से अलग होते हैं. इन वजहों से कई बार लोग शादी के कुछ समय बाद इन तरीकों को अपनाते हैं.

उन्होंने कहा, “इन सब में कहीं न कहीं लोग अपनी निजी जरूरतों को प्राथमिकता दे रहे हैं. लोगों को लगता है कि ये सब करके उनके मन में अपने पाटर्नर की तरफ कोई नकरात्मक भावना नहीं आएंगी.”

डॉ पूजाशिवम जेटली ने महिलाओं की नींद पूरी ना होने के पीछे स्लीप डाइवोर्स एक अहम वजह बताई.

उन्होंने कहा, “महिलाएं में नींद ना पूरा होने के पीछे कहीं ना कहीं नौकरी और घर दोनों को संभालने का दबाव है.”

वहीं उन्होंने ये भी बताया कि स्लीप डाइवोर्स के मायने हर रिश्ते के लिए अलग हो सकते हैं.

उन्होंने आगे कहा, “अगर शादीशुदा जोड़े मुद्दों से बचने के लिए ये तरीका अपना रहे है तो ये तरीका काफ़ी अनहेल्थी है. शादीशुदा जोड़ों के लिए एक-दूसरे के साथ समय बिताना भी बहुत जरूरी है.”

वर्कप्लेस की परेशानियां कैसे भारी पड़ रही है नींद पर

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अच्छी नींद हमारे काम में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए बहुत जरूरी है. अगर नींद अच्छे से पूरी नहीं होती है, तो इससे हमारे काम पर पर असर पड़ता है.

अमेरिकी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन कमेटी ऑन स्लीप मेडिसिन एंड रिसर्च के मुताबिक, अगर हम रोज छह घंटे या उससे कम सोते हैं, तो हमारा दिमाग वैसे ही काम करने लगता है जैसे बिल्कुल नींद न लेने पर होता है.

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिन लोगों की नींद पूरी नहीं होती, उन्हें खुद इस बात का एहसास भी नहीं होता कि उनके काम पर इसका कितना बुरा असर पड़ रहा है.

मनोवैज्ञानिक डॉ पूजाशिवम जेटली ने बीबीसी को बताया कि आज भी औरत को अपने वर्किंग स्पेस में पुरुषों के मुकाबले ज्यादा काम करना पड़ता है जिसका सीधा असर उनकी नींद पर पड़ता है.

स्लीप सर्वे में पाया गया कि 70% कर्मचारियों ने अपने करियर में कम से कम एक बार खराब नींद की वजह से छुट्टी ली है.

इसका असर काम करने की क्षमता पर पड़ता है.

71% कर्मचारियों ने माना है कि खराब नींद की वजह से उन्होंने बीमारी के नाम पर छुट्टी ली है.

भारत में 80 प्रतिशत कर्मचारियों को लगता है कि उनके बॉस उनकी नींद और सेहत की परवाह करते हैं.

वहीं, फ्रांस, जर्मनी, हांगकांग और यूके में 60 फ़ीसदी से ज़्यादा कर्मचारियों को लगता है कि उनके नियोक्ता को उनकी नींद की परवाह नहीं है.

एक और निजी कंपनी में काम करने वाली महिला ने अपना नाम ना बताने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि उन्हें कई बार तबियत ख़राब होने पर छुट्टी मिलना मुश्किल होता है. यहां तक की कई बार बीमार पड़ने पर छुट्टी मांगने पर उन्हें नौकरी छोड़ने तक के लिए बोल दिया जाता है.

उन्होंने कहा, “अगर हम सोचते हैं कि दूसरी नौकरी देख लें, तो काम करने वाली वो महिलाएं जो मां है उनको दूसरी नौकरी ढूंढने में कई मुश्किलें आती है. उन्हें कोई नौकरी नहीं देना चाहता.”

उन्होंने ये भी बताया कि नींद ना पूरी होने की वजह से उन्हें माइग्रेशन की समस्या होने लगी है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS