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पाकिस्तान ने औपचारिक तौर पर ईरान और अमेरिका को युद्ध खत्म करने के लिए बातचीत की मेज़बानी की पेशकश कर दी है और कहा जा रहा है कि दोनों देशों के बीच यह बातचीत इस्लामाबाद में हो सकती है.
उन्होंने यह भी कहा कि ईरान के पावर प्लांट्स पर हमलों के फ़ैसले को ‘टाल दिया गया है.’
ईरान ने इन बातचीतों का खंडन किया. लेकिन इसके तुरंत बाद ही यह खबरें सामने आने लगीं कि यह बातचीत पाकिस्तान की मध्यस्थता में हो रही है.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने मंगलवार शाम एक्स पर पोस्ट किया कि, “पाकिस्तान मध्य पूर्व में जारी युद्ध को खत्म करने के लिए बातचीत के जरिए जारी कोशिशों का पूरा समर्थन करता है, ताकि क्षेत्र में शांति और स्थिरता स्थापित हो सके.”
उन्होंने लिखा कि, “अगर अमेरिका और ईरान राज़ी हों तो पाकिस्तान सार्थक और अंतिम बातचीत कराने के लिए तैयार है, जिसके ज़रिए इस विवाद का समाधान निकाला जा सके.”
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने शहबाज़ शरीफ़ का यह बयान ट्रुथ सोशल पर भी शेयर किया, जिससे यह अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि शायद अमेरिका भी पाकिस्तान की मध्यस्थता में बातचीत के लिए तैयार है.
दूसरी ओर, ईरान और अमेरिका के बीच संभावित बातचीत के बारे में एक ईरानी राजनयिक ने बीबीसी न्यूज़ उर्दू को बताया कि इस बातचीत की थोड़ी-बहुत संभावना तो है.
उन्होंने कहा, “अगर (इन बातचीतों के बारे में) अंतिम फ़ैसला हो जाता है, तो अन्य जगहों के अलावा इस्लामाबाद भी मेज़बानी का स्थान हो सकता है.”
पाकिस्तान की इस औपचारिक पेशकश के बाद कई सवाल उठ रहे हैं. क्या ईरान और अमेरिका पाकिस्तान को मध्यस्थ के रूप में स्वीकार करेंगे? अगर इस कोशिश के नतीजे में कोई समझौता हो जाता है, तो क्या पाकिस्तान उसकी गारंटी देगा?
सबसे अहम सवाल यह है कि पाकिस्तान को इन कोशिशों से क्या फ़ायदा होगा?
पाकिस्तान की कोशिशें

पिछले 48 घंटों में पाकिस्तानी नेताओं ने ईरान और अमेरिका के राष्ट्रपतियों से फ़ोन पर बातचीत की है.
व्हाइट हाउस ने बीबीसी न्यूज़ उर्दू को पुष्टि की है कि राष्ट्रपति ट्रंप और पाकिस्तान के फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के बीच बातचीत हुई है. हालांकि, इसके बारे में और डिटेल साझा नहीं की गई.
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से भी फ़ोन पर बात की और तनाव को “बातचीत और कूटनीति के ज़रिये” कम करने पर ज़ोर दिया.
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान की अमेरिका और ईरान दोनों से ही नज़दीकियां हैं और यही बात पाकिस्तान को एक ‘मज़बूत मध्यस्थ’ बनाती है.
पाकिस्तान की क़ायदे-आज़म यूनिवर्सिटी से जुड़े असिस्टेंट प्रोफेसर मोहम्मद शोएब ने बीबीसी उर्दू को बताया, “पाकिस्तान के नेतृत्व के स्तर पर अमेरिका और ईरान, दोनों से व्यक्तिगत संबंध हैं. उसकी निष्पक्षता, शांति के लिए प्रयास और दोनों देशों का उस पर भरोसा उसे मध्यस्थ की भूमिका निभाने का मौका देते हैं.”
ईरान में पाकिस्तान के राजदूत रह चुके आसिफ़ दुर्रानी भी इस बात से सहमत नज़र आते हैं. उनका कहना है कि ईरान और अमेरिका दोनों ही पाकिस्तान पर भरोसा करते हैं.
वो कहते हैं, “क्षेत्र में ऐसा कौन सा दूसरा देश है, जिसके ईरान से बेहतर संबंध हों? ईरान के खाड़ी देशों के साथ रिश्तों में तनाव है, तुर्की के साथ भी संबंधों में खिंचाव है. ऐसे में पाकिस्तान ही एक बेहतर मध्यस्थ बन सकता है.”
पूर्व राजदूत आसिफ़ दुर्रानी आगे कहते हैं कि अमेरिका भी इन वार्ताओं के लिए पाकिस्तान पर ही भरोसा करेगा. उनका कहना है कि ‘भारत इन वार्ताओं में निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं बन सकता, क्योंकि मोदी ईरान पर हमले से दो दिन पहले इसराइल में थे.’
क्या पाकिस्तान बन सकता है गारंटर?
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ईरान के बयानों से साफ़ ज़ाहिर है कि उसे अमेरिका पर यक़ीन नहीं है. इसकी वजह यह है कि पिछले साल जून और फिर दिसंबर में क़तर और ओमान की मध्यस्थता में ईरान के साथ बातचीत हुई थी, लेकिन दोनों बार ईरान पर हमलों के कारण यह बातचीत प्रक्रिया रुक गई थी.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान इस बातचीत को किसी अंतिम नतीजे तक पहुंचा सकता है?
प्रोफ़ेसर मोहम्मद शोएब कहते हैं, “पाकिस्तान इस प्रक्रिया या किसी समझौते की गारंटी नहीं देगा, बल्कि मध्यस्थ के रूप में पक्षों के बीच संपर्क बढ़ाएगा और यह सुनिश्चित करेगा कि दोनों देश अपने वादों का पालन करें. यानी किसी भी तरह के उल्लंघन की स्थिति में भी वह मध्यस्थ के रूप में अपनी भूमिका निभाता रहेगा.”
पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक आसिफ दुर्रानी का भी यही मानना है कि पाकिस्तान किसी चीज़ की गारंटी नहीं दे सकता, बल्कि वह अपनी ज़मीन पर बातचीत के ज़रिए ईरान और अमेरिका को विवाद के समाधान का मौका दे रहा है.
दुर्रानी कहते हैं, “फ़िलहाल ये मामले शुरुआती स्तर के लगते हैं. बातचीत की शुरुआत में यह तय किया जाता है कि मध्यस्थ देश का अधिकार-क्षेत्र (मैंडेट) क्या होगा.”

पाकिस्तान को क्या मिलेगा?
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सवाल यह भी उठता है कि पाकिस्तान, मध्यस्थ के रूप में क्या हासिल करना चाहता है.
विश्लेषकों का मानना है कि पड़ोसी देश होने के नाते पाकिस्तान भी ईरान में युद्ध से प्रभावित हो रहा है और तनाव में कमी आने से उसे आर्थिक और राजनीतिक राहत मिल सकती है.
प्रोफ़ेसर मोहम्मद शोएब कहते हैं, “तनाव में कमी से पाकिस्तान को आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक फ़ायदे होंगे. स्थिरता आने से व्यापार पर दबाव कम होगा, खासकर ईंधन और तेल के बाज़ार में राहत मिलेगी.”
पाकिस्तान के खाड़ी देशों के साथ भी अच्छे संबंध हैं और उसने सऊदी अरब के साथ एक रक्षा समझौता भी कर रखा है.
हालांकि, इस युद्ध की शुरुआत के बाद से ईरान ने कई खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य बेस को ड्रोन और मिसाइल हमलों का निशाना बनाया है.
प्रोफेसर मोहम्मद शोएब कहते हैं कि तनाव में कमी की स्थिति में “खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी दबाव कम होगा, जहां से पाकिस्तान को सबसे ज़्यादा विदेशी मुद्रा (रेमिटेंस) मिलती है.”
वह आगे कहते हैं कि क्षेत्र में स्थिरता आने के बाद पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान मोर्चे और अपने उत्तर-पश्चिमी इलाकों में हो रही अशांति पर फ़ोकस कर सकेगा.
दूसरी ओर, पूर्व राजदूत आसिफ दुर्रानी का कहना है कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ बनने की पेशकश किसी लाभ के लिए नहीं की.
“ईरान एक पड़ोसी देश है और वहां के युद्ध का असर पाकिस्तान पर भी पड़ रहा है. तेल की आपूर्ति बाधित है और आर्थिक समस्याएं पैदा हो रही हैं.”
ध्यान देने वाली बात है कि इस संघर्ष की शुरुआत के बाद ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद कर दिया था, जहां से दुनिया भर में तेल का बड़ा हिस्सा सप्लाई होता है.
क्या है जोखिम?
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पूर्व अमेरिकी राजनयिक और स्टिमसन सेंटर में दक्षिण एशिया मामलों की निदेशक एलिज़ाबेथ ट्रेल्कल्ड का मानना है कि पाकिस्तान उन कुछ देशों में शामिल है, जिनके अमेरिका, ईरान समेत मध्य पूर्व के अहम देशों के साथ संबंध हैं.
उनके मुताबिक, “ट्रंप प्रशासन के दौर में पाकिस्तान चुपचाप ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता करवाने में भूमिका निभाता रहा है, जिसकी वजह से उसे दोनों पक्षों का भरोसा हासिल हुआ.”
लेकिन क्या अमेरिका और ईरान के बीच किसी समझौते की स्थिति में पाकिस्तान गारंटर होगा? इस सवाल के जवाब में एलिज़ाबेथ कहती हैं, “फिलहाल किसी भी तरह के समझौते के बारे में कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी, जब तक संभावित वार्ताओं के नतीजों के बारे में ज्यादा जानकारी न मिल जाए.”
हालांकि, उनके मुताबिक़ पाकिस्तान की कोशिश होगी कि वह दोनों पक्षों के साथ अपनी केंद्रीय भूमिका बनाए रखे.
तो इन कोशिशों से पाकिस्तान को क्या हासिल होगा?
एलिज़ाबेथ कहती हैं, “अगर पाकिस्तान किसी समझौते को करवाने में सफल रहता है, तो यह एक बड़ी कूटनीतिक सफलता होगी. एक ओर वह अमेरिका के साथ अपने संबंध और मजबूत करेगा, तो दूसरी ओर सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते और पड़ोसी ईरान के साथ क़रीबी रिश्तों की वजह से मौजूदा स्थिति से बाहर निकलने में मदद मिलेगी. इसके अलावा होर्मुज़ स्ट्रेट में बिना रुकावट सामान और ऊर्जा की आपूर्ति से भी पाकिस्तान को फायदा होगा.”
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