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कहा जाता है कि अगर कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में राजनीतिक ज़मीन तैयार न की होती, तो लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार बिहार की सियासत में उस जगह पर नहीं पहुँच पाते जहाँ वे पहुंचे.
कर्पूरी ठाकुर कम ही समय के लिए बिहार के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन इसके बावजूद उनकी सादगी, ईमानदारी और आम लोगों से जुड़ाव के कारण उनको आज तक याद किया जाता है.
जब उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा उनके पुश्तैनी गाँव पितौंझिया गए तो वो ये देखकर अपने आँसू नहीं रोक पाए कि बिहार के दो बार मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर का घर मिट्टी का बना हुआ था.
एक प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर कभी कर्पूरी ठाकुर के सचिव और आगे चलकर केंद्रीय मंत्री रहे यशवंत सिन्हा अपनी आत्मकथा ‘रेलेंटलेस’ में लिखते हैं, “एक दिन मैं उनके निजी सचिव लक्ष्मी प्रसाद साहू के साथ समस्तीपुर ज़िले में उनके गाँव गया. वहाँ मेरा परिचय उनकी पत्नी से कराया गया.”
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“वो मुझे देखकर बहुत खुश हुईं. लेकिन उनके घर में मेरे बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं थी. उन्होंने ज़ोर दिया कि हम चाय पीकर जाएं. उन्होंने लकड़ी का चूल्हा जलाकर हमारे लिए चाय बनाई. मैं ये देखकर दंग रह गया कि उस घर में आधुकनिकता या आराम की एक भी चीज़ मौजूद नहीं थी.”
उनकी बहू आशा रानी ने एक बार बताया था, “किसी ने मेरे ससुर कर्पूरी ठाकुर से पूछा था कि आपने अपने घर को पक्का क्यों नहीं बनवाया तो उनका जवाब था, ‘अगर मैं अपने घर को पक्का बनवा लेता हूँ तो आम लोग मुझसे जुड़ाव नहीं महसूस करेंगे’.”
अंग्रेज़ी की अनिवार्यता को किया समाप्त
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कर्पूरी ठाकुर को बिहार में शिक्षा नीति में बड़े बदलावों के लिए याद किया जाता है.
1967 में जब वो राज्य के उप-मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री थे तो उन्होंने मैट्रिक पास करने के लिए अंग्रेज़ी की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया था.
संतोष सिंह और आदित्य अनमोल उनकी जीवनी ‘द जननायक, कर्पूरी ठाकुर वॉयस ऑफ़ द वॉयसलेस’ में लिखते हैं, “एक बार जब टीएनबी कॉलेज भागलपुर में उनकी जनसभा में आए एक प्रोफ़ेसर सीपी सिंह ने ये कहकर उन पर कटाक्ष किया कि उन्होंने अंग्रेज़ी इसलिए हटाई क्योंकि खु़द उनकी अंग्रेज़ी कमज़ोर है. तो कर्पूरी ठाकुर ने हिंदी का पहले से तैयार भाषण छोड़कर अपना पूरा भाषण अंग्रेज़ी में दिया. वो ये बताना चाह रहे थे कि अंग्रेज़ी सिर्फ़ एक भाषा है, ज्ञानी होने का सर्टिफ़िकेट नहीं.”
उसी तरह जब उन्होंने पिछड़ी जातियों के लिए 26 फ़ीसदी आरक्षण लागू किया तो देश-विदेश के कई पत्रकार पटना में जमा हुए. तब भी उन्होंने विदेशी पत्रकारों के लिए अंग्रेज़ी में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया.
उनके कार्यकाल के दौरान केंद्र सरकार को भेजा गया हर पत्र हिंदी में होता था लेकिन साथ में अंग्रेज़ी अनुवाद भी भेजा जाता था.
मार्शल टीटो की नज़दीकी
कर्पूरी ठाकुर पहली बार सन 1952 में तेजपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर बिहार विधानसभा पहुंचे थे. उसी वर्ष वो अंतरराष्ट्रीय युवा सम्मेलन में भाग लेने वियना और यूगोस्लाविया गए. वहाँ उनकी मुलाक़ात यूगोस्लाविया के नेता मार्शल टीटो से हुई.
विष्णु देव रजक अपनी किताब ‘कर्पूरी ठाकुर का राजनीतिक दर्शन’ में लिखते हैं, “इस यात्रा के बाद कर्पूरी ठाकुर और मार्शल टीटो में नज़दीकी बढ़ गई. इसके बाद जब भी मार्शल टीटो भारत आए उन्होंने ख़ास तौर से कर्पूरी ठाकुर से मुलाक़ात की. सन 1959 में जब कर्पूरी एक बार फिर यूगोस्लाविया गए तो टीटो ने उन्हें काले रंग का एक ओवरकोट उपहार में दिया.”
सन 1967 में जब कर्पूरी ठाकुर बिहार के उप-मुख्यमंत्री बने तो मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा की तुलना में उनकी ही चर्चा अधिक रही.
नरेश कुमार विकल और हरिनंदन साह ‘सप्तक्रांति के संवाहक, जननायक कर्पूरी ठाकुर स्मृति ग्रंथ’ में लिखते हैं, “एक बार पुराने सचिवालय में एक अधिकारी कर्पूरी ठाकुर को एक लिफ़्ट के पास ले गया जिस पर एक पट्टिका पर लिखा हुआ था- ‘सिर्फ़ अधिकारियों के प्रयोग के लिए.’ ये देखकर कर्पूरी ठाकुर बहुत नाराज़ हुए. उन्होंने तुरंत वो पट्टिका हटवा दी ताकि उस लिफ़्ट का इस्तेमाल हर कोई कर सके. हालांकि सरकारी अधिकारियों ने इसका विरोध किया लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने उनकी एक न सुनी.”
वित्त मंत्री के तौर पर कर्पूरी ठाकुर ने उन किसानों से मालगुज़ारी लेने पर रोक लगा दी जिनके पास साढ़े तीन एकड़ से कम ज़मीन थी. ये फ़ैसला लोहिया के नारे ‘जिस खेती से लाभ नहीं, उस पर लगे लगान नहीं’ को देखते हुए किया गया था.
इमरजेंसी के दौरान गिरफ़्तारी से बचे कर्पूरी ठाकुर
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इमरजेंसी के दौरान कर्पूरी ठाकुर उन गिने-चुने नेताओं में से थे जो भूमिगत हो गए थे और जिन्हें गिरफ़्तार नहीं किया जा सका था. 27 जून, 1975 को वो सीमा पार कर नेपाल चले गए थे. वहाँ उन्होंने अपना समय सीमावर्ती इलाकों हनुमान नगर, विराटनगर और छतरा में बिताया था.
संतोष सिंह और आदित्य अनमोल लिखते हैं, “नेपाल सरकार पर भारत सराकर का बहुत दबाव था कि कर्पूरी ठाकुर को गिरफ़्तार कर लिया जाए. ठाकुर का तर्क था कि अगर वीपी कोइराला भारत में रह सकते हैं तो वो नेपाल में क्यों नहीं रह सकते. नेपाल की सरकार चाहती थी कि कर्पूरी ठाकुर के बदले भारत सरकार कोइराला को उनके हवाले करे लेकिन किन्हीं कारणों से इस बात पर सहमति नहीं बन पाई थी.”
“नेपाल सरकार ने उन्हें भारत के हवाले तो नहीं किया लेकिन उनकी हर गतिविधि पर नज़र रखी जाने लगी. इस बीच कर्पूरी नेपाल में ब्रिटिश, अमेरिकी, इसराइली और चीनी दूतवासों के लगातार संपर्क में रहे. 5 सितंबर, 1975 को कर्पूरी ठाकुर वेश बदल कर भारत लौट आए.”
“उनके बेटे रामनाथ ठाकुर ने हमें बताया कि बिहार में कुछ दिन भूमिगत रहने के बाद वो नेपाली पोशाक में मद्रास गए जहाँ भूमिगत नेताओं से उनकी मुलाक़ात हुई. वो मौलवी का वेश बनाकर बंबई भी गए जहाँ उन्होंने लोक संघर्ष समिति की बैठक में भाग लिया. सरकार ने उनकी गिरफ़्तारी के लिए 10 हज़ार रुपये का इनाम भी घोषित किया था.”
उनके प्रधान सचिव रहे यशवंत सिन्हा लिखते हैं, “वो एक जननेता थे जो हमेशा लोगों से घिरे रहते थे. यहाँ तक कि उन्हें सरकारी काम करने तक का समय नहीं मिलता था. मैंने उनके जीवन को व्यवस्थित करने के लिए उनका दैनिक कार्यक्रम बनाना शुरू किया. लेकिन पहले दिन से उन्होंने उन कार्यक्रमों की धज्जियाँ उड़ाना शुरू कर दिया.”
“जब ये साफ़ हो गया कि व्यवस्थित जीवन उनके बस का नहीं है तो हमने तय किया कि हम रोज़ उन्हें दो-तीन घंटे के लिए दफ़्तर के बाहर किसी जगह पर ले जाएंगे ताकि वो फ़ाइलों को निपटा सकें. हम शाम को अक्सर फुलवारी शरीफ़ में बिहार मिलिट्री पुलिस के गेस्ट हाउस में चले जाते. जब लोगों को उसके बारे में भी पता चल जाता तो हम जगह बदल देते.”
वंशवाद के ख़िलाफ़
लेखक प्रेम कुमार मणि एक क़िस्सा सुनाते हैं, “1977 में पुलिस हिरासत में ठकैता डोम नाम के एक व्यक्ति की मौत हो गई. उस समय के मुख्यमंत्री ठाकुर ने पुलिस की इस ग़लती की पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली. जब उन्हें पता चला कि मृत व्यक्ति का कोई पुत्र नहीं है तो उन्होंने अंतिम संस्कार अपने हाथों से किया.”
जब 1985 विधानसभा चुनाव में लोकदल के वरिष्ठ नेताओं ने कर्पूरी ठाकुर के सबसे बड़े बेटे रामनाथ ठाकुर को टिकट देने का फ़ैसला किया तो कर्पूरी ठाकुर नाराज़ हो गए.
बिहार के पूर्व मंत्री रामजीवन सिंह याद करते हैं, “जैसे ही कर्पूरी ठाकुर को इस बारे में पता चला उन्होंने कहा, इंदिरा गांधी का वंशवाद.. वंशवाद है और मेरा वंशवाद नहीं है? आप लोग ऐसा कीजिए कि रामनाथ को ही चुनाव लड़वा दीजिए, मैं नहीं लड़ूँगा फिर. अपने पिता की मृत्यु के बाद ही रामनाथ एमएलसी बन पाए. बाद में वो नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में मंत्री भी बने.”
कर्पूरी ठाकुर के खाने का अंदाज़ भी बिल्कुल अलग हुआ करता था. वो मांसाहारी खाने के शौकीन थे.
यशवंत सिन्हा लिखते हैं, “वो कभी भी एक खाने को दूसरे खाने में नहीं मिलाते थे, यहाँ तक कि चावल को दाल से भी नहीं. वो हर डिश को अलग-अलग खाते थे, चावल का एक भी दाना या रोटी का एक भी टुकड़ा नहीं छोड़ते थे.”
संतोष सिंह और आदित्य अनमोल को दिए इंटरव्यू में उनकी पुत्रवधू आशा रानी ने बताया था, “कर्पूरी ठाकुर को नेनुआ (तुरई) और बैंगन की सब्ज़ी पसंद थी. वो परवल का चोखा भी पसंद करते थे. वो सरसों में बनी मछली खाने के भी बहुत शौकीन थे. जब वो देर रात घर लौटते थे तो सिर्फ़ सत्तू खाकर सो जाते थे.”
कर्पूरी ठाकुर अख़बार पढ़ने के शौकीन थे लेकिन टीवी उन्हें विलासिता की चीज़ लगता था. लेकिन तब भी उनके छोटे बेटे बीरेंद्र ठाकुर ने अपने कमरे में एक ब्लैक एंड वाइट टीवी रखवा दिया था.
उनकी छोटी पुत्रवधू कनकलता ठाकुर ने बताया था, “एक बार अचानक जॉर्ज फ़र्नान्डिस कर्पूरी ठाकुर से मिलने उनके घर आए. चूँकि सारा घर अस्त-व्यस्त था, कर्पूरी जॉर्ज को बीरेंद्र के कमरे में ले आए. टीवी देखकर जॉर्ज के मुँह से निकला ‘कर्पूरी और टीवी?’ कर्पूरी ने थोड़ा शर्मिंदा और परेशान होते हुए जवाब दिया, ‘अरे, जॉर्ज मेरा नहीं, बच्चे लोगों का है’.”
आम लोगों से कर्पूरी का जुड़ाव
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आम लोगों के साथ कर्पूरी ठाकुर का ‘कनेक्ट’ ज़बरदस्त हुआ करता था. एक बार उन्होंने दो पत्रकारों अरुण रंजन और अरुण सिन्हा को देर रात अपने घर बुलाया.
अरुण रंजन ने नवभारत टाइम्स में छपे अपने लेख में लिखा, “हम दोनों तड़के उनके सरकारी निवास पर पहुंच गए. कर्पूरी जी दातून करते हुए बाहर निकले. हमें देखते ही बोले, ‘अच्छा तो दोनों भाई आ गए. लीजिए गाड़ी भी आ गई.’ हमने देखा कि वहाँ एक खटारा टैक्सी खड़ी थी. कर्पूरी ने हमें बताया कि रोहतास के एक गाँव में पुलिस ने तीन दलितों को घोड़े की टाप से कुचल कर मार डाला है. उन्होंने कहा ‘आप लोग इस गाड़ी में बैठकर वहाँ पहुंचिए. मैं पीछे से आता हूँ’.”
दोनों पत्रकार थोड़ा झिझके क्योंकि उनके पास उस समय बहुत पैसे नहीं थे. कर्पूरी उनकी परेशानी समझ गए. उन्होंने ड्राइवर से पूछा, ‘कितना तेल है गाड़ी में?’ ड्राइवर ने कहा, ‘पाँच लीटर.’
अरुण रंजन लिखते हैं, “कर्पूरी ठाकुर ने बरामदे में बैठे लोगों से कहा, ‘आज आप लोगों से थोड़ा थोड़ा कर्ज़ा लूँगा. घबराइए मत एक एक का नाम डायरी मे नोट करूँगा. बाद में लौटा दूँगा.’ उन्होंने अपनी डायरी में पैसा देने वाले हर आदमी का नाम और पता नोट किया. फिर सारे पैसे ड्राइवर को देते हुए बोले, ‘चलो तेल भराओ और साहब लोगों को करुआ गाँव ले जाओ.’ थोड़ी देर में कर्पूरी ठाकुर भी वहाँ पहुंच गए. ये घटना छोटी ज़रूर है लेकिन इससे एक आदमी के राजनीतिक बड़प्पन का पता चलता है.”
दिल का दौरा पड़ने से निधन
17 फ़रवरी, 1988 को कर्पूरी ठाकुर को दिल का दौरा पड़ा. जब तक उन्हें पटना मेडिकल कॉलेज ले जाया जाता, उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए थे. इससे पहले भी उन्हें 1985 में दिल का दौरा पड़ चुका था.
नरेंद्र पाठक अपनी किताब ‘कर्पूरी ठाकुर और समाजवाद’ में लिखते हैं, “कर्पूरी ठाकुर को जब पटना के बाँसघाट पर अंतिम संस्कार के लिए रखा जा रहा था तो पुलिस किसी को चिता के पास जाने नहीं दे रही थी. तभी एक फटेहाल बूढ़ी औरत पुलिस का घेरा तोड़ कर अंदर जाने लगी. पुलिस ने जब रोका तो वो बोल उठी, ‘हटो जी. कोई मंत्री, प्रधानमंत्री थोड़े ही हैं. ये तो हमारे अपने हैं. रोकते क्यों हो?'”
उन्होंने एक बार कहा भी था, “हम नेता हैं ही नहीं, न क्षेत्रीय, न राष्ट्रीय. हम एक कार्यकर्ता हैं और कार्यकर्ताओं की तरह काम करते हैं.”
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SOURCE : BBC NEWS



