Source :- LIVE HINDUSTAN
वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को कम करने के लिए अमेरिका द्वारा रूस के तेल पर लगे प्रतिबंध को अस्थाई रूप से हटा लिया गया था। अब यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने इस पर नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि यह एक गलत फैसला है।
पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग ट्रंप प्रशासन के लिए मुश्किल साबित होती जा रही है। होर्मुज के बंद होने के बाद बढ़ती तेल कीमतों को कम करने के लिए अमेरिका ने रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों को अस्थाई रूप से हटा दिया था। अब इस फैसले पर यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने नाराजगी जताते हुए कहा है कि ट्रंप प्रशासन की तरफ से लिया गया यह फैसला सही नहीं है। इसकी वजह से चार साल से चले आ रहे युद्ध को रोकने में मदद नहीं मिलेगी।
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पेरिस में मौजूद जेलेंस्की ने फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों के साथ मीडिया से बात करते हुए कहा कि इस फैसले की वजह से रूस की स्थिति और भी ज्यादा मजबूत होगी और पिछले चार वर्षों में प्रतिबंध लगाकर जो दबाव बनाया गया था, वह एक ही झटके में कम हो जाएगा। जेलेंस्की ने कहा, “केवल इस एक ढील से ही रूस को युद्ध के लिए लगभग 10 अरब डॉलर मिल सकते हैं। यह निश्चित रूप से शांति में मदद नहीं करेंगे।” उन्होंने कहा, “रूस कच्चे तेल और गैस की बिक्री से मिलने वाले पैसे को हथियारों पर खर्च करता है और वही हथियार हमारे खिलाफ इस्तेमाल होते हैं। इसलिए केवल प्रतिबंध हटाने से बाद में यूक्रेन के खिलाफ और ज्यादा ड्रोन हमलों का खतरा बढ़ेगा, जो मेरे हिसाब से सही निर्णय नहीं है।”
अमेरिका के इस फैसले पर जी7 के 6 देश खिलाफ: जर्मन चांसलर
जर्मनी के चांसलर फ्रैड्रिक मर्त्ज ने अमेरिका के इस फैसले की आलोचना की। उन्होंने कहा कि इस फैसले पर जी7 के 6 देश खिलाफ थे। इन देशों का मानना था कि इससे वैश्विक स्तर पर गलत संदेश जाएगा। मर्त्ज ने कहा, “इस समय कीमत की समस्या है, लेकिन आपूर्ति की नहीं। इसलिए यह समझना मुश्किल है कि अमेरिका ने यह फैसला किन कारणों से लिया।” वहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने अमेरिकी फैसले पर सधा रुख अपनाते हुए कहा कि इससे रूस को ज्यादा लाभ नहीं होगा, क्योंकि यह छूट अस्थायी और सीमित है।
अमेरिका ने क्यों दी छूट?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने कार्यकाल के शुरूआत से ही रूसी तेल खरीद के लिए भारत और यूरोप जैसे साझेदारों से तनाव मोल ले चुके हैं। उन्होंने भारत के ऊपर रूसी तेल खरीद के लिए 25 फीसदी टैरिफ लगा दिया और यूरोप को भी टैरिफ की धमकी दी। बाद में भारत ने भी कम डिस्काउंट और नजदीकी विकल्पों पर तेल की मौजूदगी की वजह से धीरे-धीरे रूसी तेल खरीद को कम कर दिया।
ट्रंप के तमाम प्रयासों के बाद रूस की तेल खरीद थोड़ी मात्रा में कम हुई, लेकिन 28 फरवरी से वैश्विक राजनीति ने पूरी तरह से करवट ले ली। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले के बाद ईरान ने पलटवार करना शुरू कर दिया। खाड़ी देशों पर किए गए इन हमलों से तेल उत्पादन पर भी फर्क पड़ने लगा। रही सही कसर ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करके पूरी कर दी। हालात यह हैं कि वर्तमान में सैकडों की संख्या में जहाज इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं। इसकी वजह से वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर पहुंच गई हैं।
अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने बताई वजह
इन कीमतों को कम करने के लिए और वैश्विक बाजार में तेल की पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने के लिए ट्रंप प्रशासन ने सबसे पहले भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने के लिए ‘हरी झंड़ी’ दे दी। इसके बाद बाकी देशों के लिए भी अमेरिका ने हामी भर दी।
अमेरिकी वित्त मंत्रालय के अनुसार इस छूट का उद्देश्य समुद्र में फंसे रूसी तेल के कार्गो को निकालना और ईरान युद्ध के कारण पैदा हुई आपूर्ति की कमी को कम करना बताया गया है। हालांकि, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के मुताबिक इससे रूस को ज्यादा लाभ नहीं होगा क्योंकि यह छूट केवल उस तेल के लिए है, जो कि पहले से ही समुद्री रास्तों में मौजूद है। विश्लेषकों के अनुसार फारस की खाड़ी में उत्पादन रुकने से तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे रूस की अर्थव्यवस्था को भी फायदा हो रहा है। रूस अपनी युद्ध गतिविधियों के लिए बड़े पैमाने पर तेल से होने वाली आय पर निर्भर है।
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