Source :- LIVE HINDUSTAN
ईरान से जुड़े तनाव और सप्लाई बाधित होने के कारण कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर $144 प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। इससे वैश्विक महंगाई बढ़ने और पेट्रोल-डीजल के दाम महंगे होने की आशंका बढ़ गई है, जिसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है।
दुनियाभर में तेल की कीमतों ने एक नया रिकॉर्ड बना लिया है, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब दोनों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। हाल ही में कच्चे तेल का प्रमुख बेंचमार्क डेटेड ब्रेंट (Dated Brent) 144.42 डॉलर प्रति बैरल के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया। यह तेजी किसी सामान्य बाजार उतार-चढ़ाव का परिणाम नहीं, बल्कि बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर है, खासतौर पर ईरान (Iran) से जुड़े संघर्ष के कारण दुनियाभर में तेल की कीमतों ने एक नया रिकॉर्ड बना लिया है।
दरअसल, दुनिया के लगभग 20% तेल की सप्लाई स्टेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) के जरिए होती है। यह एक बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जहां से कच्चा तेल विभिन्न देशों तक पहुंचता है। लेकिन, ईरान से जुड़े युद्ध जैसे हालातों ने इस रास्ते को प्रभावित कर दिया है, जिससे सप्लाई में भारी कमी आ गई है। जब सप्लाई घटती है और मांग बनी रहती है या बढ़ती है, तो कीमतों में उछाल आना तय है और अभी यही हो रहा है।
तेल की इस कमी के चलते दुनिया भर की रिफाइनरी कंपनियां तेजी से कच्चा तेल खरीदने की कोशिश कर रही हैं। इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है और कीमतें और ऊपर जा रही हैं। इतना ही नहीं, कच्चे तेल से बनने वाले पेट्रोल-डीजल जैसे ईंधन की सप्लाई पर भी असर पड़ रहा है, जिससे इनके दाम बढ़ने की संभावना और मजबूत हो गई है।
इस स्थिति का असर केवल तेल कंपनियों तक सीमित नहीं है। भारत जैसे देशों के लिए यह एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। भारत बड़ी मात्रा में खाड़ी देशों से तेल आयात करता है। महंगा तेल सीधे तौर पर महंगाई बढ़ाता है। इससे ट्रांसपोर्ट का खर्च भी बढ़ जाता है, जिससे खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के सामान तक सब कुछ महंगा हो सकता है।
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्टेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई, तो तेल की कीमतें और भी ऊंचाई छू सकती हैं। ऐसे में सरकारों को ईंधन पर टैक्स में कटौती या अन्य राहत उपायों पर विचार करना पड़ सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों में यह रिकॉर्ड तेजी सिर्फ एक आर्थिक खबर नहीं, बल्कि वैश्विक अस्थिरता का संकेत है, जिसका असर हर आम आदमी की जिंदगी पर पड़ सकता है।
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