Source :- BBC INDIA

मंगलवार की रात जैसे ही तेहरान में नौ बजे, आसमान में अचानक ईरानी क्रांति के 47वें साल के जश्न की आवाज़ें गूंजने लगीं.
अपने होटल की बालकनी से हम सुन रहे थे कि कैसे छतों से और खिड़कियों से ‘अल्लाहू अकबर’ (अल्लाह सबसे बड़ा है) के नारे गूंज रहे थे. आसमान में रंग-बिरंगी आतिशबाज़ी फूट रही थी.
लेकिन इस साल, रोशनी और आवाज़ों के इस सालाना धूम-धड़ाके में एक बेसुरा एहसास भी था.
हमने ‘तानाशाह मुर्दाबाद’ की आवाज़ भी सुनी जो शायद शहर के अंधेरे में छिपी किसी जगह से, किसी घर के भीतर के सुरक्षित कोने से आई थी.
यह पिछले महीने उठी उस असाधारण विरोध की लहर की गूंज थी- जो तेहरान की कुछ सड़कों और चौराहों से लेकर देश भर के कई कस्बों और शहरों तक फैल गई थी.
इन प्रदर्शनों का सामना ऐसी जानलेवा ताक़त से हुआ, जिसे इससे पहले किसी भी बग़ावत के दौरान नहीं देखा गया था.
‘दस दिन की सुबह’ पर बेचैनी की छाया
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उन प्रदर्शनों के बाद यह हमारा ईरान का पहला दौरा है. सरकार ने लगभग पूरी तरह लागू इंटरनेट ब्लैकआउट को धीरे-धीरे कम करना शुरू किया है. इसे इतिहास के सबसे लंबे डिजिटल शटडाउन में से एक बताया गया है. अब थोड़े-बहुत अंतरराष्ट्रीय मीडिया को वापस आने दिया जा रहा है.
राजधानी का माहौल हमारी पिछले साल जून की यात्रा से बिलकुल अलग है. तब इसराइल के साथ 12 दिन की लड़ाई ख़त्म हुई थी, जिसमें ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले कर अमेरिका भी शामिल हो गया था.
उस हिंसक टकराव ने कई लोगों- ख़ासतौर पर वे लोग जो तेहरान छोड़कर सुरक्षित शहरों में चले गए थे- को झकझोर दिया था और अपने देश के प्रति उनके लगाव को और मज़बूत कर दिया था.
अब, बर्फ़ से ढके खूबसूरत दमावंद पर्वत के सामने विस्तार पा रहा यह महानगर, ‘दस दिन की सुबह’ नामक उत्सव के लिए झंडों और सजावट से पूरी तरह सजा हुआ है.
1979 में, इसी अवधि में वह ऐतिहासिक क्रांति शुरू हुई थी जिसने शाह को सत्ता से हटाया और ईरान को पूरी तरह बदल दिया. इसके बाद ईरान ने क्षेत्र में अपने सहयोगियों के साथ एक कट्टरपंथी धड़ा (प्रतिरोध की धुरी) बनाया, जिसकी उसके दुश्मन लंबे समय से निंदा और मुख़ालफ़त करते रहे हैं.
इस साल, इन दिनों पर एक ऐसी बेचैनी और नाराज़गी की छाया है, जो रोज़मर्रा की चीज़ों की बढ़ती क़ीमतों, जो लोगों की जेब पर भारी पड़ रही हैं, से लेकर पिछले महीने सड़कों पर उठी उस पुकार तक फैलती है, जिसमें धार्मिक शासन खत्म करने की मांग की गई थी.
इन अंदरूनी दबावों के साथ, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यह चेतावनी भी जुड़ गई है कि अगर बातचीत नाकाम रही तो और सैन्य हमले हो सकते हैं. ये सब मिलकर ईरान की बूढ़ी हो चुकी धार्मिक व्यवस्था के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती बन गए हैं.
बुधवार को, इन सालगिरह वाले आयोजनों के आख़िरी दिन, राजधानी और दूसरे बड़े शहरों की सड़कों पर सरकार के सबसे वफ़ादार समर्थक उमड़ पड़े. इसे प्रदर्शनों के जवाब में दिए गए एक राजनीतिक संदेश के रूप में देखा गया.
इस सार्वजनिक छुट्टी पर माहौल कुछ त्योहार जैसा था. परिवार धूप से भरी सर्दियों की इस गर्म सुबह में चलते और घूमते नज़र आ रहे थे.
बच्चे और बड़े ईरान के झंडे और सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की तस्वीरें लहरा रहे थे, और अपने जाने पहचाने नारे, ‘अमेरिका मुर्दाबाद’ और ‘इसराइल मुर्दाबाद’, लगाते जा रहे थे.
‘पत्रकार से बात करना बहुत ख़तरनाक’
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इस रैली में शामिल कई महिलाओं की तरह लंबे काले हिजाब में लिपटी हुई एक मुस्कुराती युवा महिला ने जोश में कहा, “मेरे लिए और सभी ईरानियों के लिए, यह क्रांति जीवन का नया जन्म है. इसने हमारे समाज और देश में नई जान फूंकी थी, और मेरा तो मानना है कि इस्लामी दुनिया में, बल्कि पूरी दुनिया में भी.”
जब मैंने उससे प्रदर्शनों के बारे में पूछा, तो उसने जवाब दिया, “कुछ लोग आर्थिक हालात से नाख़ुश थे और उनका विरोध जायज़ था.” लेकिन उसने आगे कहा, “यह साफ़ है कि जिन्होंने दंगे किए और अफ़रा-तफ़री फैलाई, उनके इरादों की जड़ें हमारी सरहदों के बाहर थीं.”
तेहरान के मशहूर आज़ादी स्क्वायर में एक ऊंचे मंच पर खड़े होकर, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने भी इसी तरह की बातें कहीं, जहां उनके सामने भावनाओं से भरी विशाल भीड़ जमा थी.
उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान के दुश्मनों- जो आमतौर पर अमेरिका और इसराइल के लिए इस्तेमाल होने वाला कोड है- की ‘दुष्प्रचार मुहिम’ ने इस अशांति को भड़काया, जिसे उन्होंने दंगे क़रार दिया.
लेकिन सुधारवादी माने जाने वाले इस वरिष्ठ अधिकारी, जिन्होंने प्रदर्शनों की शुरुआत से ही नरम रुख़ अपनाने की कोशिश की है, उन्होंने सरकारी कमियों के लिए माफ़ी भी मांगी. उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “हम लोगों की आवाज़ सुनने के लिए तैयार हैं.”
उन्होंने कहा कि वे समस्याओं को ठीक करने के लिए ‘हर संभव कोशिश’ कर रहे हैं. उनके लिए इन समस्याओं का सीधा मतलब है गिरती हुई मुद्रा और महंगाई का वह संकट, जिसने 28 दिसंबर को दुकानदारों की हड़ताल को जन्म दिया था, जो बाद में कहीं बड़े आंदोलन में बदल गई थी.
ईरान की धार्मिक व्यवस्था में असली सत्ता इससे ऊपर, 86 साल के सर्वोच्च नेता के पास होती है. उन्होंने और न्यायपालिका प्रमुख ने साफ़ कहा है कि जिन्हें आतंकवादी और उपद्रवी घोषित किया गया है, उनके साथ कोई नरमी नहीं बरती जाएगी.
तेहरान में अपने पहले दिन, हम हल्की फुहारों और धुंधले आसमान वाले मौसम में एंग़लाब (इंकलाब) स्क्वायर पर रुके, ताकि शहर के माहौल का थोड़ा जायज़ा ले सकें.
इस व्यस्त चौराहे के आसपास की इमारतों पर मुस्कुराती भीड़ के चटख़ रंगों से बने बड़े भित्ति चित्र छाए हुए हैं.
लेकिन इस जगह पर एक गहरी उदासी सी तैरती हुई महसूस हो रही थी.
दिन की शुरुआत के समय जल्दी-जल्दी जा रहे कुछ ईरानी बात करने से हिचकिचाए. एक महिला ने हमें बताया कि इस समय किसी पत्रकार से बात करना ‘बहुत ख़तरनाक’ है.
‘मैं इतनी टूटी हुई और उदास क्यों हूं’
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लेकिन एक बिल्कुल खुला सवाल- ‘इस समय आपकी सबसे बड़ी चिंता क्या है?’ पूछने पर कई और लोग पल भर के लिए रुके और फिर उनका ग़ुस्सा और तकलीफ़ उबलकर निकलने लगी.
यहां जो कुछ हुआ है, उसके बाद भावनाएं अभी भी ताज़ा थीं, महसूस की जा सकती थीं.
राहा के आंसू ही फूट पड़े. वह फफकते हुए बोलीं, “मुझे ठीक से खाए सोए एक महीना हो गया है. मुझे देखिए, मैं जवान हूं, सिर्फ़ 32 साल की. मैं इतनी टूटी हुई और उदास क्यों हूं?”
उन्होंने कहा, “मैं कसम खाती हूं, वे कहते रहते हैं कि ये सब दंगाई थे. लेकिन लोग तो हथियारबंद नहीं थे. उनका गुनाह क्या था?”
20 साल की डोरी अब कई और महिलाओं की तरह अनिवार्य हिजाब नहीं पहनतीं. चश्मा पहने हुए यह युवती कहती हैं, “पिछला महीना बहुत भयानक था. जब इंटरनेट कनेक्शन बहाल हुआ तो हमने बहुत डरावने वीडियो और तस्वीरें देखीं जिनमें लोगों पर हमला हो रहा था, उन्हें देख हमें रोना आ गया.”
गुलाबी रंग का हिजाब पहने 62 साल की अख्तर बेहद दृढ़ता से बात कर रही थीं. उनकी दो चिंताएं थीं. उन्होंने पहले दुख जताया, “इतने सारे नौजवान मारे गए.”
फिर उन्होंने वही तकलीफ़ बयां की, जो आजकल हम कई ईरानियों से उनकी रोज़मर्रा की बढ़ती मुश्किलों को लेकर सुनते हैं, “खाने का तेल चार गुना महंगा हो गया है; मांस और चिकन का भी यही हाल है. और बेरोज़गारी इतनी ज़्यादा है.”
हम जिन भी लोगों से मिले, उनसे पूछा कि वे अब नेताओं को क्या कहना चाहते हैं- इसके जवाब में ज़्यादातर की बात वही थी जो 20 साल के आमिर ने कही- “मेरा मानना है कि उन्हें हमारी आवाज़ सुननी चाहिए.”
उसके बगल में खड़ा उसका 19 साल का हमनाम दोस्त आमिर साफ़ तौर पर परेशान दिखाई दे रहा था. उसने कहा, “मुझे तो बस अपनी बुनियादी ज़रूरतें और आज़ादी चाहिए.”
लेकिन आर्थिक मुश्किलों को कम करना भी आसान नहीं है- क्योंकि पानी और बिजली की किल्लत से बढ़ी हुई ये परेशानियां दशकों पुराने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर अविश्वास, और लगातार जारी भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन में उलझी हुई हैं.
ईरान का इस्लामी गणराज्य अब एक दोराहे पर खड़ा है- और लगभग आधी सदी पहले हुए अपने उभार के बाद से अब तक की सबसे बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है.
बीबीसी की मुख्य अंतरराष्ट्रीय संवाददाता लीस डूसेट तेहरान से इस शर्त पर रिपोर्ट कर रही हैं कि उनकी कोई भी सामग्री बीबीसी की फ़ारसी सेवा पर इस्तेमाल नहीं की जाएगी. ये पाबंदियां ईरान में काम कर रहे सभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों पर लागू होती हैं.
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