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ईरान में ख़ामेनेई की मौत पर भारत की ख़ामोशी के पीछे की रणनीति क्या है?

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Source :- BBC INDIA

शोख पुस्तिका में संदेश लिखते विक्रम मिसरी

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  • 3 घंटे पहले

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भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने गुरुवार को दिल्ली स्थित ईरान के दूतावास में ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई को श्रद्धांजलि दी.

उन्होंने ईरानी दूतावास में शोक पुस्तिका में भारत की तरफ़ से संकेत भी लिखा.

ईरान के सुप्रीम लीडर अली ख़ामेनेई की शनिवार को अमेरिका-इसराइल के ईरान पर हमले के दौरान मौत हो गई थी.

ख़ामेनेई की मौत के पांच दिन बाद गुरुवार को पहली बार भारत ने संवेदना व्यक्ति की है.

हालांकि, भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने युद्ध के पहले दिन ईरानी विदेश मंत्री सय्यद अब्बास अराग़ची से फ़ोन पर बात ज़रूर की थी लेकिन इस बातचीत के बाद जारी किए गए प्रेस नोट में भारत की तरफ़ से शोक संवेदना प्रकट करने या अमेरिका-इसराइल के हमले की आलोचना करने का कोई ज़िक़्र नहीं था.

भारत ख़ामेनेई की मौत के पांच दिनों तक ख़ामोश रहा. भारत में विपक्षी दलों ने सरकार की ईरान के मुद्दे पर ख़ामोशी को लेकर सवाल उठाए हैं.

साल 2024 में जब एक हेलीकॉप्टर क्रैश में ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत हुई थी तब भारत ने एक दिन का राजकीय शोक घोषित किया था.

रईसी की मौत के बाद भारत सरकार के प्रवक्ता ने कहा था, “स्वर्गीय गरिमामय व्यक्तियों को श्रद्धा के प्रतीक के रूप में भारत सरकार ने फैसला किया है कि 21 मई (मंगलवार) को पूरे भारत में एक दिन का राजकीय शोक मनाया जाएगा.”

वहीं, साल 2020 में जब अमेरिका ने एक हवाई हमले में ईरान के शीर्ष जनरल क़ासिम सुलेमानी को मारा था तब भारत ने इस पर बयान जारी करते हुए तनाव को चिंताजनक बताया था.

तब भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा था, “हमने नोट किया है कि एक वरिष्ठ ईरानी नेता को अमेरिका ने मार गिराया है.”

इस बयान में कहा गया था, “बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया को चिंतित कर दिया है. इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा भारत के लिए सर्वोपरि महत्व रखती है. यह अत्यंत आवश्यक है कि स्थिति और बिगड़े नहीं.”

वहीं, पिछले साल जून में अमेरिका-इसराइल ने ईरान के परमाणु और मिसाइल ठिकानों पर हमले किए थे, उसके तुरंत बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान से फ़ोन पर बात की थी और बढ़ते तनाव को लेकर ग़हरी चिंता ज़ाहिर की थी.

यही नहीं, शुरुआती हिचक के बाद भारत ने एससीओ (शंघाई सहयोग संगठन) और ब्रिक्स के अमेरिका-इसराइल के हवाई हमले की आलोचना करने वाले बयानों पर भी हस्ताक्षर किए थे.

जून 2025 में चले 12 दिनों के संघर्ष के दौरान ईरान ने भारत को विशेष छूट देते हुए भारतीय छात्रों को वापस ला रहे भारतीय विमानों के लिए अपने हवाई क्षेत्र को खोल दिया था.

क्या है वजह?

भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ईरान के दूतावास में

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अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद भारत ने किसी राजकीय शोक की घोषणा नहीं की है और ना ही हवाई हमले में उनकी मौत की खुल कर आलोचना की.

ये सवाल भी उठ रहा है कि भारत के ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या पर शोक संवेदना प्रकट ना करने या मौजूदा संघर्ष के दौरान ईरान के स्कूल और अस्पतालों पर हुए हमलों की आलोचना ना करने का क्या कारण है.

विश्लेषक इसे वैश्विक राजनीति और बदलते परिदृश्य से जोड़कर देख रहे हैं.

भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने एक लेख में भारत की ख़ामोशी की वजहों की तरफ़ संकेत करते हुए लिखा, “भारत ने हमलों की आलोचना नहीं की है, जिसे समझा जा सकता है क्योंकि हमने यूक्रेन में रूस के सैन्य दख़ल की आलोचना भी नहीं की थी.”

सिब्बल ने तर्क दिया, “यह मुद्दा आगे चलकर संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की कूटनीति की परीक्षा लेगा, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह चुप्पी भारत की उस व्यापक नीति के अनुरूप है जिसमें महाशक्तियों के संघर्षों में उलझने से परहेज किया जाता है, जब इसके मूल हित (जैसे अमेरिका, इज़राइल और खाड़ी देशों के साथ संबंध) दांव पर होते हैं.”

वहीं ‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक टिप्पणी में भारत के पूर्व राजदूत राकेश सूद ने भारत की चुप्पी के तीन अहम कारण बताए हैं.

पूर्व राजदूत राकेश सूद का कहना है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की हत्या पर भारत की चुप्पी को मौजूदा जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझना होगा. उनके मुताबिक इसके पीछे कई कारण हैं.

वे कहते हैं कि पहला कारण यह है कि आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा जटिल हो चुकी है और भारत को कई प्रतिद्वंद्वी हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है.

दूसरा, पिछले कुछ दशकों में ईरान के साथ भारत के रिश्ते सीमित होते गए हैं, भले ही चाबहार बंदरगाह जैसे प्रोजेक्ट मौजूद हों. तीसरा, ख़ामेनेई ने बीते वर्षों में कश्मीर और भारत में अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर सार्वजनिक टिप्पणियां की थीं, जिन्हें नई दिल्ली ने सकारात्मक रूप से नहीं लिया. सूद के मुताबिक इन सभी कारकों ने मिलकर भारत के लिए इस मामले में सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देना और भी जटिल बना दिया.

वहीं जेेएनयू के प्रोफ़ेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैपीमोन जैकब ने भारत की कूटनीतिक रणनीति को “संतुलित संदेश की कला” कहा है.

उनके मुताबिक विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इसराइल और ईरान — दोनों देशों के अपने-अपने समकक्षों से अलग-अलग बातचीत में तनाव कम करने की अपील की. साथ ही विदेश मंत्रालय के बयान में “देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान” की बात कही गई, जिसे बिना अमेरिका या इसराइल का नाम लिए उनके हमलों की एक तरह की आलोचना के रूप में देखा गया.

जैकब के अनुसार यह रुख़ भारत के लिए एक व्यावहारिक संतुलन साधने की कोशिश है, क्योंकि इस क्षेत्र में उसकी ऊर्जा ज़रूरतें, बड़ी भारतीय प्रवासी आबादी और व्यापार व कनेक्टिविटी से जुड़े महत्वपूर्ण हित दांव पर लगे हैं.

भारत की ख़ामोशी एक सोची-समझी रणनीति

अली ख़ामेनई की तस्वीर ले जाता एक ईरानी अधिकारी

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वहीं द वीक में प्रकाशित एक लेख में जेएनयू के प्रोफ़ेसर और मध्य पूर्व मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर पीआर कुमारास्वामी ने तर्क दिया है कि भारत की ख़ामोशी एक सोची-समझी रणनीति है.

प्रोफ़ेसर पीआर कुमारस्वामी का तर्क है कि प्रधानमंत्री की यह चुप्पी दरअसल एक सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति है, जो खाड़ी के अरब देशों में भारत के अहम हितों से जुड़ी है.

उनके मुताबिक़ ईरान की जवाबी कार्रवाई में जिन खाड़ी देशों को सीधे निशाना बनाया गया, वही देश भारत के लिए ऊर्जा, व्यापार और कूटनीतिक साझेदारी के लिहाज़ से बेहद महत्वपूर्ण हैं. इन देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय काम करते हैं और उनकी सुरक्षा तथा उनसे आने वाली रेमिटेंस भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अहम है.

कुमारस्वामी 1990 के कुवैत संकट का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि उस समय क्षेत्रीय राजनीति में लिए गए कुछ पक्षपाती रुख़ के लंबे समय तक नतीजे देखने को मिले थे.

उनके अनुसार, अगर भारत खुलकर ख़ामेनेई के प्रति सहानुभूति जताता तो इससे प्रमुख अरब साझेदार नाराज़ हो सकते थे. वह यह भी याद दिलाते हैं कि ख़ामेनेई पहले सार्वजनिक रूप से कश्मीर और भारतीय मुसलमानों के मुद्दे पर भारत की आलोचना करते रहे हैं.

कुमारास्वामी तर्क देते हैं कि इस मामले में भारत की विदेश नीति प्रतीकात्मक शोक से ज़्यादा खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता और अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देती है.

हालांकि विश्लेषक गुरुवार को भारतीय विदेश सचिव के ईरानी दूतावास में शोक पुस्तिका में संदेश लिखने को देर से उठाए गए सही क़दम के रूप में भी देख रहे हैं.

कंवल सिब्बल ने एक्स पर लिखा है, “यह सही क़दम है. हमारे ईरान के साथ राज्य-स्तरीय संबंध हैं. यह अच्छा हुआ कि विदेश सचिव ने शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए.”

विपक्ष के सरकार से सवाल

अमेरिकी नौसेना का मिसाइल हमला

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वहीं विपक्ष ने इसे मजबूरी में उठाया क़दम बताया है.

कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है.

विक्रम मिसरी के ईरानी दूतावास में शोक पुस्तिका में संदेश लिखने पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस पार्टी ने कहा है कि “जो संवेदना राजनीतिक दबाव या सार्वजनिक आलोचना के बाद जताई जाए, वह असल संवेदना नहीं बल्कि सिर्फ़ छवि बचाने की कवायद होती है.”

कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने एक्स पर किए एक पोस्ट में कहा, “28 फ़रवरी से लेकर बुधवार दोपहर तक सरकार ने, न तो अमेरिका और इसराइल की कार्रवाई की निंदा की और न ही ईरान के लोगों के प्रति शोक जताया.”

पवन खेड़ा ने कहा, “कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर इस चुप्पी को “नैतिक कायरता” बताते हुए सवाल उठाए, जिसके बाद सरकार को सफ़ाई देनी पड़ी.

कांग्रेस का दावा है कि इसके तुरंत बाद सरकार ने नुकसान नियंत्रित करने की कोशिश में नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास में जाकर संवेदना पुस्तिका पर हस्ताक्षर करवाए.

पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकार की प्रतिक्रिया बिखरी हुई और दबाव में उठाया गया क़दम लगती है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS