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अमेरिका और इसराइल की ओर से ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू किए 23 दिन हो चुके हैं.
इस टकराव का असर अब दुनिया की अर्थव्यवस्था पर साफ़ दिखने लगा है.
पिछले 9 मार्च को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के मानक माने जाने वाले ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमतें पहली बार 2022 के बाद 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई थीं.
हालांकि उसी दिन ये गिरकर 95 डॉलर से नीचे आ गई थीं. लेकिन बीते कुछ दिनों में तेल टैंकरों पर किए गए नए हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमत एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रही है.
27 फरवरी को, यानी संघर्ष शुरू होने से एक दिन पहले, ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमतें करीब 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं.
ईंधन की कीमतों में आई इस तेज़ बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह है होर्मुज़ स्ट्रेट से समुद्री यातायात का लगभग ठप हो जाना.
ईरान सरकार ने उन जहाज़ों को चेतावनी दी है जो इस समुद्री रास्ते से गुजरने की कोशिश करेंगे. यह वही रास्ता है, जिससे दुनिया के करीब 20 फ़ीसदी तेल और गैस की सप्लाई होती है.
ईरान और होर्मुज़ स्ट्रेट का नज़दीकी नाता होने के वजह से तेल और गैस की कीमतों के बढ़ने का अनुमान लगा लिया गया था.
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसके असर सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं रहेंगे.
आने वाले समय में इसके झटके अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में भी महसूस किए जाएंगे और इसका असर पूरी दुनिया में होगा.
1. खाना-पीना हो जाएगा काफ़ी महंगा
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मौजूदा संघर्ष का असर उन देशों पर भी पड़ रहा है जो दुनिया के बड़े उर्वरक (खाद) निर्यातक हैं.
इकोनॉमिक कॉम्प्लेक्सिटी ऑब्ज़र्वेटरी के आंकड़ों के मुताबिक़, ओमान, क़तर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों के विश्व के चार सबसे बड़े निर्यातक हैं.
ये उर्वरक प्राकृतिक गैस से बनते हैं और उन फ़सलों में इस्तेमाल होते हैं जिनसे दुनिया के करीब आधे खाद्य उत्पाद पैदा होते हैं.
हालांकि युद्ध के बावजूद इस क्षेत्र की ज़्यादातर उर्वरक कंपनियां अब तक काम करती रही हैं, लेकिन क़तर एनर्जी को अपना उत्पादन रोकना पड़ा था. ये यूरिया बनाने वाली प्रमुख कंपनियों में से एक है.
दरअसल ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमलों के चलते गैस की सप्लाई बाधित हो गई थी.
दूसरी ओर, भले ही कुछ कंपनियां उत्पादन जारी रखी हुई हैं लेकिन उन्हें इसका पूरा फ़ायदा नहीं मिल पा रहा है.
होर्मुज़ स्ट्रेट लगभग बंद होने की वजह से ये फर्टिलाइजर निर्यात नहीं कर पा रही हैं.
कारण यह है कि होर्मुज़ स्ट्रेट बंद होने की वजह से वे फ़र्टिलाइजर निर्यात नहीं कर पा रही हैं.
ब्लूमबर्ग के मुताबिक़, दुनिया की कुल फ़र्टिलाइजर सप्लाई का लगभग एक‑तिहाई हिस्सा इसी रास्ते से होकर जाता है.
इस स्थिति को यह तथ्य और गंभीर बनाता है कि ईरान खुद भी फ़र्टिलाइज़र का निर्यातक है.
चीन ने 2025 के अंत में यह फ़ैसला किया था कि वह फ़ॉस्फेट उर्वरकों का निर्यात पूरी तरह रोक देगा और अगस्त 2026 तक यूरिया के निर्यात पर कड़ी पाबंदियां लगाएगा ताकि अपने देश के किसानों के लिए पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके.
इकोनॉमिक कॉम्प्लेक्सिटी ऑब्ज़र्वेटरी के अनुसार, चीन इस समय दुनिया का सबसे बड़ा नाइट्रोजन उर्वरक का निर्यातक है.
इन तमाम वजहों का नतीज़ा यह है कि उर्वरकों की कीमतें अब तेज़ी से बढ़ने लगी हैं.
अमेरिका में उर्वरकों के सबसे बड़े प्रवेश द्वार माने जाने वाले न्यू ऑरलियन्स बंदरगाह पर, युद्ध के पहले ही हफ़्ते में उर्वरकों की कीमत 516 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 683 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई.
यह स्थिति ऐसे समय सामने आई है जब उत्तरी गोलार्द्ध वाले देशों में किसान बुआई की तैयारी कर रहे होते हैं. लिहाजा हालात और भी ज़्यादा मुश्किल हो गए हैं.
अमेरिकन फ़ार्म ब्यूरो फ़ेडरेशन के आंकड़ों के मुताबिक़, अमेरिका में हर साल मार्च और अप्रैल के महीनों में ही उर्वरकों का लगभग 25 फ़ीसदी हिस्सा आयात किया जाता है.
साउथ कैरोलिना में कपास, मक्का और सोयाबीन की खेती करने वाले किसान हैरी ओट ने बीबीसी से कहा, “यह इससे बदतर समय पर नहीं हो सकता था.”
विश्लेषकों का कहना है कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो एक से तीन महीने के भीतर उपभोक्ताओं को खाने-पीने की चीज़ों पर इसका असर महसूस होने लगेगा.
न सिर्फ़ खाद्य पदार्थ महंगे होंगे, बल्कि उनकी कमी भी हो सकती है, क्योंकि ज़रूरी मात्रा में उर्वरक न मिलने से फ़सलें कम होंगी.
इसका सबसे गंभीर असर गरीब देशों और समाज के सबसे कमज़ोर तबकों पर पड़ सकता है, जहां यह स्थिति भुखमरी में बदल सकती है.
संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम ने एक बयान में चेतावनी दी है, “मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष के चलते खाद्य और ईंधन की कीमतों में आई अचानक तेज़ी एक ऐसा डोमिनो प्रभाव पैदा कर सकती है, जो इस क्षेत्र और दुनिया के अन्य हिस्सों में रहने वाली कमज़ोर आबादी के लिए भूख की समस्या को और गंभीर बना देगी.”
2. दवाओं की सप्लाई पर पड़ेगा असर
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मध्य पूर्व में चल रहा युद्ध अब दवाओं और फ़ार्मास्यूटिकल उत्पादों की वैश्विक सप्लाई चेन को भी प्रभावित करने लगा है.
इसकी सबसे बड़ी वजह दुबई पर हुए हमले हैं. दुबई दुनिया के फ़ार्मा सेक्टर का एक अहम लॉजिस्टिक केंद्र माना जाता है.
संयुक्त अरब अमीरात का सबसे अधिक आबादी वाला इस शहर में दुनिया का सबसे व्यस्त अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जहां 2025 में करीब 9.5 करोड़ यात्रियों की आवाजाही दर्ज की गई थी.
यही हवाई अड्डा दवाओं और दूसरे फ़ार्मास्यूटिकल उत्पादों के कार्गो डिस्ट्रीब्यूशन का भी एक बड़ा केंद्र है, ख़ासकर उन दवाओं के लिए जिन्हें ठंडे तापमान यानी ‘कोल्ड चेन’ में रखना ज़रूरी होता है.
यह हवाई अड्डा भारत की फ़ार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री के लिए ख़ास तौर पर बहुत अहम है.
भारत दुनिया में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा सप्लायर और देश के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़, दुनिया में इस्तेमाल होने वाले लगभग 60 फ़ीसदी टीके भारत में ही बनते हैं.
दरअसल, एमिरेट्स एयरलाइन की एक विशेष कार्गो सुविधा है- एमिरैट्स स्काईफ़ार्मा. इसे ख़ास तौर पर तापमान के प्रति संवेदनशील दवाओं की शिपमेंट संभालने के लिए बनाया गया है.
दुबई में जेबेल अली पोर्ट भी मौजूद है, जिसे दुनिया का नौवां सबसे व्यस्त कार्गो पोर्ट और मध्य पूर्व का सबसे बड़ा बंदरगाह माना जाता है.
जेबेल अली फ्री ज़ोन अथॉरिटी (जाफ़्ज़ा) के अनुसार, इस पोर्ट में 60 देशों की करीब 400 कंपनियां काम कर रही हैं, जो फ़ार्मास्यूटिकल और हेल्थ सेक्टर से जुड़ी हुई हैं.
अधिकारियों का कहना है कि साल 2020 में दुबई के कुल दवा और मेडिकल उत्पादों का लगभग 50 फ़ीसदी हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुज़रा था, जिसकी कुल क़ीमत करीब 21.8 अरब अमेरिकी डॉलर थी.
भारत से होने वाले दवाओं के निर्यात का एक बड़ा हिस्सा इसी दुबई पोर्ट से होकर गुजरता है.
यहीं से इन दवाओं को फ़ारस की खाड़ी के दूसरे देशों, अफ़्रीका, यूरोप और अन्य क्षेत्रों में भेजा जाता है.
लेकिन ईरान की ओर से किए गए सैन्य हमलों की वजह से दुबई के बंदरगाह और हवाई अड्डे, दोनों को नुक़सान पहुंचा है. संघर्ष के चलते इनकी सामान्य गतिविधियां बाधित हो गई हैं.
हवाई मार्ग से कार्गो ट्रांसपोर्ट दवा उद्योग के लिए बेहद अहम होता है.
ख़ासकर उन शिपमेंट्स के लिए जिनकी क़ीमत ज़्यादा होती है और जिन्हें तुरंत भेजना ज़रूरी होता है या फिर जिन्हें नियंत्रित तापमान यानी कोल्ड चेन में रखना पड़ता है.
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हालांकि दुबई के कुछ वैकल्पिक रास्ते मौजूद हैं, लेकिन उनमें से ज़्यादातर की क्षमता कम है.
इन रास्तों से माल पहुंचाने में ज़्यादा समय लगता है और लागत भी ज़्यादा आती है.
नतीजा यह हो सकता है कि आगे चलकर दवाओं की कीमतें बढ़ें और उनकी उपलब्धता भी प्रभावित हो.
भारत के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, भारत की फ़ार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री दुनिया के करीब 200 देशों को दवाओं का निर्यात करती है.
इसके प्रमुख बाज़ारों में अमेरिका, ब्रिटेन, ब्राज़ील, फ्रांस और दक्षिण अफ़्रीका शामिल हैं.
दुबई का हवाई अड्डा और बंदरगाह सिर्फ़ ट्रांज़िट पॉइंट नहीं हैं, बल्कि ये दवाओं के भंडारण और दोबारा निर्यात (री एक्सपोर्ट) के भी बड़े केंद्र हैं.
इसी वजह से वर्ल्ड फ़ार्मास्यूटिकल्स कारोबार में दुबई की भूमिका अहम और केंद्रीय मानी जाती है.
3. मेटल, केमिकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सप्लाई पर असर
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युद्ध का असर अब उन रसायनों और कच्चे माल की आपूर्ति पर भी पड़ने लगा है, जो औद्योगिक उत्पादन के लिए बेहद ज़रूरी होते हैं.
इनमें सल्फ़र जैसे रासायनिक तत्व और एल्युमिनियम जैसे कच्चे पदार्थ शामिल हैं.
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, कुवैत और ईरान उन प्रमुख देशों में शामिल हैं जो सल्फ़र का निर्यात करते हैं.
सल्फ़र तेल और गैस की रिफ़ाइनिंग के दौरान निकलने वाला एक बाई-प्रोडक्ट होता है.
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वे (यूएस जियोलॉजिकल सर्विस) के अनुसार, दुनिया में बनने वाले कुल सल्फ़र का लगभग 24 फ़ीसदी हिस्सा मध्यपूर्व से आता है.
इसका एक बड़ा भाग उर्वरकों के उत्पादन में इस्तेमाल होता है, लेकिन सल्फ़र की भूमिका यहीं तक सीमित नहीं है.
इसका इस्तेमाल तांबा और निकल जैसी धातुओं को निकालने में भी होता है, जो आगे चलकर उपकरणों, गाड़ियों, बिजली की ग्रिड, सेमीकंडक्टर, बैटरियों और स्टेनलेस स्टील जैसे कई अहम उत्पादों के निर्माण में काम आती हैं.
इस सेक्टर में युद्ध के असर अब साफ़ दिखाई देने लगे हैं. संघर्ष के पहले ही हफ़्ते में इंडोनेशिया की निकल उत्पादक कंपनियों ने उत्पादन में कटौती की घोषणा कर दी.
इंडोनेशिया दुनिया के कुल निकल के 50 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्से का उत्पादन करता है.
इन कंपनियों ने बताया कि खाड़ी देशों से आने वाली आपूर्ति बाधित होने के कारण उन्हें यह फैसला लेना पड़ा.
गौरतलब है ये कंपनियां जिस सल्फ़र का इस्तेमाल करती हैं, उसका लगभग 75 फ़ीसदी हिस्सा इन्हीं खाड़ी देशों से आता है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स एजेंसी ने चेतावनी दी है कि अफ़्रीका में तांबे के कुछ उत्पादक भी इसी तरह की मुश्किलों से जूझ रहे हो सकते हैं.
रॉयटर्स के मुताबिक़, “आपूर्ति को लेकर होने वाली खींचतान में इंडोनेशिया की निकल रिफाइनरियां एक तरफ होंगी, अफ़्रीका की तांबा खदानें दूसरी तरफ. और दोनों के सामने दुनिया भर के उर्वरक निर्माता होंगे, जो मध्य पूर्व से आने वाले सल्फ़र के विकल्प तलाश रहे हैं.”
सल्फ़र से बनने वाला सल्फ़्यूरिक एसिड सेमीकंडक्टर और चिप्स के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सबसे अहम रसायनों में से एक है.
ऐसे में अगर इस रसायन की सप्लाई बाधित होती है, तो इसका असर उन अनगिनत उत्पादों के निर्माण पर पड़ सकता है जो आज की आधुनिक ज़िंदगी के लिए ज़रूरी माने जाते हैं.
इनमें स्मार्टफ़ोन, कंप्यूटर, मेमोरी कार्ड, वाहन और घरों, दफ़्तरों और फै़क्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाले तमाम इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शामिल हैं.
यह पहली बार नहीं है जब दुनिया ऐसी स्थिति का सामना कर रही हो. कोविड 19 महामारी के दौरान भी चिप्स की भारी कमी देखने को मिली थी, जिसका असर न सिर्फ़ इनके उत्पादन पर पड़ा था, बल्कि उपभोक्ताओं को इनके लिए ज़्यादा कीमत भी चुकानी पड़ी थी.
इस बार स्थिति को और जटिल बनाने वाला एक अतिरिक्त कारण भी है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से जुड़े मॉडल विकसित करने और उन्हें लागू करने वाली कंपनियों की ओर से चिप्स की बहुत ज़्यादा मांग.
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