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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इसराइल यात्रा के बाद दोनों देशों ने एक संयुक्त बयान जारी किया. इसमें कुल 42 बिंदु थे, जिनमें रक्षा, तकनीक, स्वास्थ्य और कई अन्य मुद्दों को शामिल किया गया.
इसमें दोनों देशों की सरकारों के अलग‑अलग मंत्रालयों और विभागों के बीच 17 समझौते किए गए और 10 घोषणाएँ भी की गईं. पीएम मोदी की इस यात्रा में यह भी स्पष्ट दिखाई दिया कि भारत ने इसराइल का खुलकर साथ दिया.
इसराइल की संसद कनेसेट में भाषण देते हुए मोदी ने कहा, ‘भारत इसराइल के साथ है. मज़बूती से, पूरे विश्वास के साथ, इस समय भी और आगे भी.”
यह बात उन्होंने 7 अक्तूबर, 2023 को हुए हमास के ”निर्दयी आतंकी हमले” के संदर्भ में कही, जिसमें करीब 1,200 लोगों की मौत हुई और 250 से ज़्यादा लोगों को बंधक बनाया गया.
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पीएम मोदी के भाषण में ग़ज़ा की तकलीफ़ों का ज़िक्र नहीं
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कनेसेट में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला भाषण था. इसमें उन्होंने यह भी कहा कि ‘किसी भी कारण से निर्दोष लोगों की हत्या को सही नहीं ठहराया जा सकता.’
हालाँकि ग़ज़ा में, हमले के जवाब में, इसराइल की सैन्य कार्रवाई की आलोचना भी हुई है, क्योंकि इसमें आम लोगों को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है.
हमास के नियंत्रण वाले स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से इसमें 72,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.
अगर भारत और इसराइल के रिश्तों को लेकर तस्वीर साफ़ थी, तो ग़ज़ा के भविष्य को लेकर प्रधानमंत्री मोदी की क्या भूमिका होगी, यह स्पष्ट नहीं था.
यात्रा के अंत में, भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी से जब यह सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा, ”हाँ, हम इसमें एक भूमिका देखते हैं, लेकिन वह भूमिका क्या होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ग़ज़ा में ज़मीन पर हालात कैसे बदलते हैं.”
उन्होंने याद दिलाया कि भारत पहले से ही फ़लस्तीनी समुदायों के हित में 17 करोड़ अमेरिकी डॉलर की परियोजनाएँ चला रहा है और 4 करोड़ डॉलर की परियोजनाएँ पाइपलाइन में हैं.
प्रधानमंत्री के पूरे दौरे में ग़ज़ा की तकलीफ़ों या कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में हिंसा का कोई ज़िक्र नहीं था. उन्होंने ‘ग़ज़ा शांति पहल’ का ज़रूर उल्लेख किया और कहा कि यह एक ‘न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति’ की संभावना देती है, जिसमें फ़लस्तीन के मुद्दे को भी शामिल किया गया है.
हालाँकि, प्रधानमंत्री ने सामान्य तौर पर अपनी चिंता जताई जब उन्होंने कहा कि ‘शांति का रास्ता हमेशा आसान नहीं होता’ और आगे की राह ‘और भी चुनौतीपूर्ण है, फिर भी उस उम्मीद को बनाए रखना ज़रूरी है.’
क्षेत्रीय तनाव पर भारत की राय
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कनेसेट में उनके भाषण को वहाँ मौजूद लगभग सभी ने खड़े होकर सराहा.
प्रधानमंत्री मोदी से पहले इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा, “7 अक्तूबर के भयानक हमले के तुरंत बाद, आपने बहुत साफ़ तौर पर इसराइल का साथ दिया. हम इसे कभी नहीं भूलेंगे. हमें पता है कि हम किस स्थिति का सामना कर रहे थे, लेकिन दुनिया में कई लोग इसे बहुत जल्दी भूल गए.”
“इसराइल चरमपंथी इस्लाम के ख़िलाफ़ सबसे आगे खड़ा है. भारत इसराइल का समर्थन करता है क्योंकि वह समझता है कि इसराइल बर्बरता के ख़िलाफ़ एक सुरक्षा दीवार है और सभ्य दुनिया की रक्षा करता है. इसराइल, भारत की तरह, एक उथल-पुथल वाले क्षेत्र में लोकतंत्र का मज़बूत क़िला है.”
दूसरे दिन, भारत और इसराइल ने घोषणा की कि उन्होंने अपने संबंधों को ‘विशेष सामरिक साझेदारी’ के स्तर तक बढ़ा दिया है.
इसराइली प्रधानमंत्री की मौजूदगी में पीएम मोदी ने कहा, “पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता से भारत के सीधे सुरक्षा हित जुड़े हैं. इसलिए हमने शुरुआत से ही संवाद और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया है… इंसानियत को कभी भी संघर्ष का शिकार नहीं बनना चाहिए.”
यह भी साफ़ किया गया कि दोनों देशों ने क्षेत्रीय तनावों पर भी चर्चा की और भारत का रुख़ यह था कि मसलों का हल बातचीत और कूटनीति के ज़रिए निकाला जाए.
इलाक़े में भारत के अन्य देशों से संबंध काफ़ी अहम
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यह एक राजकीय दौरा था, जो प्रतीकात्मक महत्व और दोनों नेताओं के व्यक्तिगत तालमेल की गर्मजोशी से भरा हुआ था.
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कनेसेट भाषण का अंत इन शब्दों के साथ किया— ‘ अमी इसराइल छाई’, जिसका मतलब है ‘ इसराइल ज़िंदा रहे’.
अब सवाल यह है कि क्या भारत और इसराइल की बढ़ती नज़दीकियाँ, इलाके में सिर्फ़ इसराइल ही नहीं बल्कि सभी के लिए शांति को आगे बढ़ाने में कारगर साबित हो सकती हैं?
यह इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि इसराइल उसी क्षेत्र में स्थित है जहाँ भारत के दूसरे अहम पार्टनर देश भी हैं, जैसे कि सऊदी अरब और क़तर जैसे देश जिनके साथ भारत के गहरे संबंध हैं.
ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और वहां काम करने वाले लाखों भारतीय नागरिक इन रिश्तों को भारत के लिए महत्वपूर्ण बनाते हैं.
आख़िर में यह भी समझना ज़रूरी है कि पश्चिम एशिया में कई संघर्ष जारी हैं. इसराइल और लेबनान के बीच तनाव, इसराइल और ग़ज़ा की स्थिति, और यमन का गृहयुद्ध इसके कुछ उदाहरण हैं.
मौजूदा समय में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु मुद्दे पर बातचीत को लेकर भी स्थिति साफ़ नहीं है. अगर बातचीत विफल होती है तो क्षेत्र में तनाव बढ़ सकता है. यहां अमेरिका की बड़ी सैन्य मौजूदगी है.
ये हालात पूरे क्षेत्र को भारत के लिए बेहद अहम और संवेदनशील बनाते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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