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अमेरिका-ईरान सीज़फ़ायर का क्रेडिट पाकिस्तान को मिलना क्या भारत के लिए झटका है?

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Source :- BBC INDIA

एस जयशंकर और नरेंद्र मोदी

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ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल जंग में दो हफ़्ते के युद्धविराम का भारत ने स्वागत किया है, लेकिन उसने पाकिस्तान का नाम लेने या उसके प्रयासों का उल्लेख करने से परहेज किया है.

भारतीय विदेश मंत्रालय के एक बयान में कहा गया, “हम युद्धविराम के फ़ैसले का स्वागत करते हैं. हमें उम्मीद है कि इससे पश्चिम एशिया में स्थायी शांति स्थापित करने में मदद मिलेगी. जैसा कि हम पहले भी कहते रहे हैं कि मौजूदा जंग को समाप्त करने के लिए युद्धविराम, संवाद और कूटनीति ज़रूरी है.”

विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि जंग ने पहले ही काफ़ी तबाही मचा दी है, “इसने वैश्विक तेल और ऊर्जा सप्लाई और व्यापार प्रणाली को बाधित कर दिया है. हम आशा करते हैं कि कमर्शियल और तेल के जहाज होर्मुज़ स्ट्रेट से गुजर सकेंगे.”

ब्रिटेन और यूरोपीय संघ समेत, जहां एक ओर दुनिया भर से कई नेता पाकिस्तान के मध्यस्थता प्रयासों की सराहना कर रहे हैं, वहीं भारत के विदेश मंत्रालय ने इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच संभावित वार्ता को लेकर भी चुप्पी साधे रखी.

यूरोपीय यूनियन कमिशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डर लेन ने मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान को धन्यवाद दिया है.

विपक्षी पार्टियों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में पाकिस्तान के ‘बढ़ते क़द’ को लेकर भारतीय विदेश नीति पर सवाल खड़े किए हैं.

विपक्षी कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने युद्धविराम पर अपनी पार्टी की प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “पाकिस्तान ने जो किया है, वही भारत को करना चाहिए था. लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी इसराइल को ‘फ़ादरलैंड’ कहते हैं, तो वे युद्धविराम की बात कैसे कर सकते हैं?”

पाकिस्तानः मध्यस्थ या संदेश वाहक?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर

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ईरान जंग में पाकिस्तान को क्या डिप्लोमेसी में भारत की तुलना में बढ़त मिली है? इसे लेकर विपक्षी दलों में तो आम राय है लेकिन विश्लेषकों और पत्रकारों की राय मिली-जुली है.

अंतराष्ट्रीय मामलों के जानकार हर्षपंत इसे ‘शार्ट टर्म कूटनीति’ कहते हैं.

बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से उन्होंने कहा, “इस संघर्ष में पाकिस्तान ने संदेशों के आदान प्रदान की भूमिका निभाई है. इसमें उसकी अपनी पहचान या कोई ऐसी भूमिका जो नतीज़ों को प्रभावित कर सके, जैसा एक मध्यस्थ करता है, वैसा नहीं दिखाई पड़ता. अभी तो इस मध्यस्थता का क्या अंतिम परिणाम निकलता है वो भी पता नहीं है. ये ज़रूर है कि पाकिस्तान ने दो देशों के बीच संदेशों के आदान प्रदान के माध्यम बनने के रूप में मध्यस्थता की कोशिश की, जिससे युद्धविराम संभव हुआ. लेकिन इससे ज़्यादा कुछ परिणाम दिखता नहीं.”

उनके अनुसार, “एक सवाल ये भी है कि पाकिस्तान ऐसा क्यों कर रहा है. दरअसल, ऑपरेशन सिंदूर के समय से ही पाकिस्तान ने अमेरिका के क़रीब आने की कोशिश की है. उसने ट्रंप को नोबल शांति पुरस्कार दिए जाने की पैरवी की. आसिम मुनीर जब अमेरिका गए तो उस दौरान पाकिस्तान ने रेयर अर्थ मिनरल्स बेचने की बात की. तो पाकिस्तान ये लगातार कोशिश कर रहा है कि एक समय में अमेरिकी विदेश नीति में जब वो हाशिए पर था, अब फिर से उसकी भूमिका बढ़े. मौजूदा मध्यस्थता उसी से जोड़कर देखा जाना चाहिए.”

उन्होंने कहा, “जहां तक भारत की बात है तो उसके वैश्विक हित बिल्कुल अलग तरीक़े के हैं. इसलिए पाकिस्तान क्या कर रहा है, उससे हमें भारत की तुलना नहीं करनी चाहिए. अगर भारत की ये क्षमता होती कि इस बातचीत के नतीजे को वह आकार दे सकते थे तो पहल लेने का अर्थ था. लेकिन भारत जैसी ताक़त के लिए चिट्ठी एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का काम शोभा नहीं देता और शायद वो करता भी नहीं. ये काम न तो भारत ने पहले किया है और न ही आगे करेगा.”

हर्षपंत का कहना है कि पाकिस्तान ऐसा पहले भी कर चुका है. शीत युद्ध के दौरान 1970 में उसने रूस और अमेरिका के बीच ऐसी मध्यस्थता की थी. अमेरिकी विदेश नीति में अहमियत पाने के लिए वो ऐसा करता रहा है और उसे इसमें सफलता मिली भी है.

वो कहते हैं, “लोग भूल जाते हैं कि एक समय जब काबुल में तालिबान की सरकार बनने वाली थी तो भारत में कितनी चिंता ज़ाहिर की जाती थी कि भारत की विदेश नीति फेल हो गई, लेकिन नतीजा क्या हुआ? तालिबान आज भारत से बात कर रहा है और पाकिस्तान से लड़ रहा है. असल में विदेश नीति को लॉन्ग टर्म में देखना चाहिए.”

विदेश नीति पर सवाल

भारत ने उम्मीद जताई है कि पश्चिम एशिया में लंबे समय तक शांति बनी रहेगी (फ़ाइल फ़ोटो)

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प्रमुख विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने पीएम मोदी के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए हैं.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा, “पाकिस्तान ने जो भूमिका निभाई और सीज़फायर करवाया, उससे मोदी जी की पर्सनल स्टाइल वाली डिप्लोमेसी को बड़ा झटका लगा है.”

“28 फ़रवरी ईरान के शासन के शीर्ष नेतृत्व की टारगेटेड किलिंग के साथ शुरू हुआ था. ये घटनाएँ प्रधानमंत्री मोदी की बहुचर्चित इसराइल यात्रा पूरी होने के ठीक दो दिन बाद शुरू हुई थीं. इस यात्रा ने भारत की वैश्विक साख और प्रतिष्ठा को कम किया.”

उन्होंने लिखा, “विदेश मंत्री ने पाकिस्तान को दलाल कहकर खारिज किया था. लेकिन अब स्वयंभू विश्वगुरु पूरी तरह एक्सपोज़ हो चुके हैं उनका स्वयं घोषित 56 इंच का सीना सिमटकर रह गया है.”

कांग्रेस ने एक बयान जारी कर कहा, “बीजेपी सरकार की ग़लतियों के कारण पाकिस्तान को युद्धरत पक्षों के बीच मध्यस्थता में भूमिका निभाने का मौका मिला, जबकि भारत एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में बेहतर स्थिति में था.”

लेकिन शिवसेना-यूबीटी की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स पर लिखा, “भारत को अमेरिका और ईरान के बीच किसी बातचीत की मेज़ पर क्यों होना चाहिए था? आलोचना समझ नहीं आती, क्योंकि यह हमारी लड़ाई नहीं थी. पाकिस्तान के लिए यह ऐसा है जैसे कोई कछुआ जो पैसे लेकर कहे कि वह संकट सुलझा देगा, जैसा कि भारत के विदेश मंत्री ने सर्वदलीय बैठक में अच्छे तरीके से बताया.”

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने एक्स पर लिखा, “युद्धविराम से होर्मुज़ स्ट्रेट फिर से खुल गया, वही होर्मुज़ स्ट्रेट जो युद्ध शुरू होने से पहले सबके लिए खुला और आसानी से इस्तेमाल करने लायक था. तो आखिर इस 39 दिन के युद्ध से अमेरिका ने क्या हासिल किया?”

क्या भारत अलग थलग पड़ गया?

निरूपमा राव

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पूर्व विदेश सचिव निरूपमा मेनन राव ने एक्स पर एक लंबे लेख में युद्धविराम पर टिप्पणी करते हुए लिखा, “पाकिस्तान की भूमिका मध्यस्थ के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे माध्यम के रूप में उभरी है जिसके द्वारा संदेश पहुंचाए गए, समय सीमा बढ़ाई गई और एक छोटा राजनयिक चैनल खोला गया.”

हर्षपंत की तरह उनका भी मानना है कि ‘यह पारंपरिक अर्थों में मध्यस्थता नहीं है, लेकिन इसके महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता.’

निरूपमा राव कहती हैं, “भारत को अपना रुख़ स्पष्ट करना चाहिए. उसे युद्धविराम का समर्थन करना चाहिए. उसे समुद्री मार्गों की रक्षा के लिए काम करना चाहिए और इस युद्ध में किसी एक पक्ष के प्रभुत्व को रोकना चाहिए. यह चुप रहने का समय नहीं है. यह समझदारी और बुद्धिमत्ता से बोलने का समय है.”

उन्होंने लिखा, “पाकिस्तान की सफल युद्धविराम वार्ता इस बात का प्रमाण है कि उसे न केवल अमेरिका और ईरान का, बल्कि चीन का भी भरोसा हासिल है. मोदी पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करना चाहते थे, लेकिन इसके उलट, भारत खुद ही अलग-थलग पड़ गया है.”

इसी बीच, रॉयटर्स समाचार एजेंसी ने बताया कि 7 साल में पहली बार ईरान से ख़रीदा गया तेल इस सप्ताह भारत पहुंच रहा है.

‘भारतीय विदेश नीति में काफ़ी संयम बरता गया’

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SOURCE : BBC NEWS