Home राष्ट्रीय समाचार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद ट्रंप की नई धमकी क्या भारत...

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद ट्रंप की नई धमकी क्या भारत के लिए है?

19
0

Source :- BBC INDIA

अमेरिका

इमेज स्रोत, Getty Images

20 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 7 मिनट

अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ़्ते राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्लोबल टैरिफ़ को रद्द किया तो ऐसा लग रहा था कि भारत समेत दुनिया भर के कई देश राहत की सांस लेंगे.

ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को शर्मनाक बताया था और जजों पर व्यक्तिगत हमले किए थे. अब ट्रंप उन देशों को चेतावनी दे रहे हैं जो अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को देखते हुए ट्रेड डील पर फिर से विचार करने के लिए सोच रहे हैं.

सोमवार को ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट में उन देशों को धमकी दी है कि उन्हें और बुरे नतीजों का सामना करना पड़ेगा.

ट्रंप ने लिखा है, ”कोई भी देश सुप्रीम कोर्ट के बकवास फ़ैसले की आड़ में हमसे ‘गेम खेलना’ चाहता है, ख़ासकर वे देश जिन्होंने वर्षों और यहाँ तक कि दशकों तक अमेरिका को छला है, तो उन्हें और उँचे टैरिफ़ का सामना करना होगा. अभी जिस टैरिफ़ पर सहमति बनी है, उससे कहीं ज़्यादा बुरे परिणाम भुगतने होंगे.”

भारत-अमेरिका

इमेज स्रोत, Getty Images

‘भारत ने दौरा टाला’

22 फ़रवरी को अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग और ब्रिटिश न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने ख़बर दी थी कि भारत ने इस हफ़्ते अपना व्यापार प्रतिनिधिमंडल वॉशिंगटन भेजने की योजनाओं को टाल दिया है.

ब्लूमबर्ग और रॉयटर्स का कहना है कि मुख्य रूप से जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ़ को रद्द कर दिया है, ऐसे में अनिश्चितता की स्थिति है और इसी को देखते हुए भारत ने इसे टालने का फ़ैसला किया है.

रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ”भारत के वाणिज्य मंत्रालय के एक सूत्र ने कहा कि दोनों देशों के अधिकारियों के बीच चर्चा के बाद यात्रा को स्थगित करने का फ़ैसला किया गया. यात्रा के लिए कोई नई तारीख़ तय नहीं की गई है.”

रॉयटर्स के मुताबिक़ प्रतिनिधिमंडल रविवार को रवाना होने वाला था ताकि एक अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए वार्ता की जा सके. दोनों देश एक ऐसे ढांचे पर सहमत हुए थे, जिसके तहत अमेरिका कुछ भारतीय निर्यातों पर लगाए गए 50% टैरिफ़ को कम करेगा जो भारत के रूसी तेल ख़रीद से जुड़े थे.

अमेरिकी टैरिफ़ को 18% तक घटाया जाना था जबकि भारत ने पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर की क़ीमत के अमेरिकी उत्पाद ख़रीदने पर सहमति दी थी.

पिछले हफ़्ते वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि अंतरिम समझौता अप्रैल में लागू हो सकता है, बशर्ते प्रतिनिधिमंडल की वॉशिंगटन यात्रा के दौरान लंबित मुद्दों का समाधान हो जाए.

अमेरिका

ट्रंप की नई धमकी को भारत के ख़िलाफ़ भी लोग देख रहे हैं. ट्रंप की ट्रुथ पोस्ट को एक्स पर रीपोस्ट करते हुए भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने लिखा है, ”उन्होंने भारत के संदर्भ में ‘छलने’ वाली बात का उपयोग किया है, जो भारत के साथ फ्रेमवर्क डील पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के प्रभाव के बारे में मीडिया के एक प्रश्न के उत्तर में कहा गया. उनकी अहंकार से प्रेरित सोच एक गंभीर समस्या है.”

ट्रंप की इस पोस्ट पर अमेरिका के विदेश और वाणिज्य मंत्रालय में सलाहकार रहे इवान ए फेइजेनबॉम ने एक्स पर लिखा है, ”ट्रंप ने कनाडा पर टैरिफ़ बढ़ाने की धमकी दी थी क्योंकि उन्हें ओंटारियो के उस टेलीविजन विज्ञापन से आपत्ति थी, जिसमें रोनाल्ड रीगन के शब्दों को हूबहू उद्धृत किया गया था. ट्रंप ने कहा कि उन्होंने स्विट्जरलैंड पर टैरिफ़ इसलिए बढ़ाया क्योंकि फोन कॉल पर वहां के राष्ट्रपति के बोलने के लहजे से नाराज़गी थी.”

”पिछले हफ़्ते ट्रंप ने 24 घंटे से भी कम समय में टैरिफ 10% से बढ़ाकर 15% करने की घोषणा कर दी और इसके लिए क़ानून की उसी धारा का सहारा लिया, जिसके ख़िलाफ़ उनका अपना जस्टिस डिपार्टमेंट सुप्रीम कोर्ट में दलील दे चुका था. उन्होंने ब्राज़ील पर दुनिया की सबसे ऊंची टैरिफ दर लगा दी क्योंकि वे इस बात से नाराज़ थे कि वहाँ उनके एक राजनीतिक सहयोगी पर मुक़दमा चलाया जा रहा था.”

”उन्होंने भारत पर रूसी तेल ख़रीद से जुड़ा टैरिफ़ लगा दिया जबकि चीन पर ऐसा कोई टैरिफ़ नहीं लगाया, जो वास्तव में भारत से अधिक रूसी तेल ख़रीदता है. इसके बावजूद ट्रंप को लगता है कि टैरिफ़ को लेकर ‘खेल’ दूसरे देश खेल रहे हैं.”

भारत ने अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं कहा है, जिससे माना जाए कि इस महीने की शुरुआत में अमेरिका के साथ हुए द्विपक्षीय व्यापार समझौते से पीछे हटने पर विचार कर रहा है.

अमेरिका-ब्राज़ील

इमेज स्रोत, Getty Images

क्या भारत को फ़ायदा होगा?

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भारत सावधानीपूर्वक क़दम बढ़ा रहा है. भारत अपने व्यापारिक हितों का संतुलन साधते हुए और ट्रंप प्रशासन के साथ टकराव से बचने की कोशिश कर रहा है. भारत के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर बस इतना कहा था कि वह इसका अध्ययन कर रहा है.

विश्व व्यापार संगठन में भारत के पूर्व राजदूत जयंत दासगुप्ता ने ब्लूमबर्ग टेलीविजन की हसलिंडा अमिन से कहा कि भारत को “अमेरिका के साथ संवाद जारी रखना चाहिए ताकि यह समझा जा सके कि उनके मन में क्या है, वे कौन से क़दमों पर विचार कर रहे हैं. उनके साथ बातचीत करनी चाहिए. हमें स्पष्ट नहीं है कि यह किस दिशा में आगे बढ़ेगा.”

भारत ने रूसी तेल की ख़रीद कम की है लेकिन यह रुख़ बनाए रखा है कि वह अपनी ऊर्जा ज़रूरतों और बाज़ार की परिस्थितियों के आधार पर कच्चा तेल ख़रीदने का अधिकार सुरक्षित रखता है.

एमकाय ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड की अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा ने ब्लूमबर्ग से कहा, ”भारत अब अपने अमेरिकी व्यापार समझौते पर फिर से विचार कर सकता है, ख़ासकर जब रूसी तेल ख़रीद से संबंधित टैरिफ़ का ख़तरा ख़त्म हो गया है. हालांकि ट्रंप के साथ संबंध बनाए रखने के लिए भारत ख़रीद में कटौती जारी रख सकता है. अब भारत वार्ताओं में अधिक अनुकूल शर्तों की मांग कर सकता है.”

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी ट्रंप का दावा है कि वह अपनी इच्छा अनुसार ही काम करेंगे. हालांकि ट्रंप ने अदालत के फ़ैसले की अवहेलना करने का कोई संकेत नहीं दिया है बल्कि उन्होंने जल्द ही अन्य, अधिक सीमित, उपलब्ध तंत्रों का उपयोग करते हुए नए टैरिफ़ लगाने की ओर रुख किया.

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में ट्रंप के लिए सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली बात यह रही है कि कंजर्वेटिव जजों ने भी उनका साथ नहीं दिया. यहाँ तक कि जिन दो जजों को ट्रंप ने ख़ुद नियुक्त किया था, उन्होंने भी टैरिफ़ को अवैध बताया.

अमेरिकी अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ”सालों से कंजर्वेटिव जजों को ट्रंप के “आज्ञाकारी” के रूप में चित्रित किया गया है. ऐसे में जब जज अपेक्षित ढंग से काम नहीं करते, तो राष्ट्रपति की समान सोच या असंतोष की आलोचना करना कुछ हद तक विरोधाभासी प्रतीत होता है.”

”अब भी कुछ उदारवादी चिंतक यह देखकर हैरानी व्यक्त कर रहे हैं कि कोई कंजर्वेटिव जज ट्रंप के ख़िलाफ़ निर्णय कैसे दे सकता है. क़ानूनविद् नोआ फेल्डमैन लिखते हैं, “लगभग एक दशक बाद चीफ़ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट ने आख़िरकार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कार्यकारी शक्तियों के अतिक्रमण के ख़िलाफ़ खड़े होने का रास्ता खोज लिया.”

अमेरिका

इमेज स्रोत, Getty Images

भारत की तैयारी

जब कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने दावोस में कहा था कि मिडिल पावर वाले देशों को सुपर पावर वाले देशों की राजनीति के दौर से निपटने के लिए अपने आर्थिक संबंधों को गहरा करना चाहिए. शायद भारत ऐसा कर भी रहा था. भारत ने कई देशों के साथ फ्री ट्रेड डील को अंजाम दिया था ताकि अपने कारोबार की निर्भरता अमेरिका से कम करे.

राष्ट्रपति ट्रंप और उनके प्रशासन की तरफ़ से भारत के ख़िलाफ़ कई आक्रामक बातें कही गईं लेकिन मोदी सरकार की तरफ़ से बहुत ही सधी हुई प्रतिक्रिया आती थी.

कहा जा रहा है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से चीन, भारत और ब्राज़ील जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों को लाभ हो सकता है, क्योंकि ट्रंप के टैरिफ़ समाप्त होने से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर टैरिफ़ दरें कम होंगी. मॉर्गन स्टैनली के अनुसार, चीन से आने वाले सामान पर औसत टैरिफ 32% से घटकर 24% रह सकता है जबकि एशिया के लिए औसत टैरिफ़ दर 20% से घटकर 17% हो सकती है.

हालाँकि ट्रंप ने बाद में 15% टैरिफ़ की घोषणा की. यह यूके और ऑस्ट्रेलिया जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जिन्होंने पहले 10% की कम दरों पर समझौते किए थे.

ब्रिटिश चैंबर्स ऑफ कॉमर्स का अनुमान है कि इस वृद्धि से यूके के अमेरिका को निर्यात की लागत में लगभग चार अरब डॉलर तक की बढ़ोतरी हो सकती है और लगभग 40,000 ब्रिटिश कंपनियाँ प्रभावित हो सकती हैं.

यह फ़ैसला ऐसे समय आया है, जब ट्रंप अगले महीने बीजिंग यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ वार्ता की तैयारी कर रहे हैं, जिससे उनकी मोलभाव की स्थिति कमज़ोर हो सकती है.

ब्लूमबर्ग के अनुसार, अमेरिकी अधिकारी यह कहते रहे हैं कि व्यापार साझेदारों के साथ पहले हुए समझौते यथावत रहेंगे. अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर ने उन्हें “अच्छे समझौते” बताया. फिर भी, सभी देश इससे सहमत हों, यह ज़रूरी नहीं है. यूरोपीय संसद के व्यापार प्रमुख ने संकेत दिया है कि जब तक ट्रंप प्रशासन अपनी नीति स्पष्ट नहीं करता, ईयू–अमेरिका व्यापार समझौते की पुष्टि रोकने का प्रस्ताव रखा जा सकता है.”

”इसी तरह, भारतीय अधिकारियों ने भी अनिश्चितता का हवाला देते हुए इस हफ़्ते अमेरिका में अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने से जुड़ी वार्ताएँ स्थगित कीं. आगे क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है. लेकिन यह निश्चित है कि वैश्विक व्यापार वार्ताओं में दबाव बनाने के लिए ट्रंप का सबसे प्रभावशाली साधन अब कमज़ोर पड़ गया है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS