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‘लखनऊ का बड़ा इमामबड़ा’, वास्तुकला का ऐसा नमूना जहां ग्रैविटी भी हो जाती है ‘फेल’

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Source :- LIVE HINDUSTAN

Must visit place in Lucknow: यूपी में रहते हैं तो एक बार अपनी राजधानी लखनऊ की सैर जरूर कर आएं। खासतौर पर यहां बने बड़े इमामबाड़े को देखने का मौक हरगिज ना छोड़ें। जो वास्तुकला के कई अद्भुत नमूनों को दिखाता है।जानें आखिर क्यों खास है बड़ा इमामबड़ा। 

लखनऊ को नवाबों का शहर बोला जाता है। जहां के कबाब का स्वाद अक्सर लोगों की जुबान से नहीं उतरता। लेकिन यूपी की राजधानी लखनऊ में और भी बहुत कुछ खास है। जिसे देखने के लिए आपको एक बार इस शहर की सैर जरूर करनी चाहिए। यहां पर आपको वास्तुकला का अनोखा उदाहरण देखने को मिलेगा। जो एक नवाब की दरियादिली का भी नमूना है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं लखनऊ शहर में बने बड़े इमामबाड़े की, जिसे नवाब आसुफद्दौला ने लोगों को रोजगार देने के लिए तैयार करवाया था। साथ ही ये इमामबाड़ा अपनी वास्तुकला की वजह से भी बेहद खास है। क्योंकि यहां पर आपको ग्रैविटी फेल होती नजर आएगी। तो आप भी जान लें राजधानी लखनऊ में बने बेहद खास बड़े इमामबड़े के बारे में जिसे आमतौर पर लोग भूलभुलैया के नाम से जानते हैं। जो इस इमामबाड़े का एक हिस्सा है।

आखिर क्यों खास है बड़ा इमामबाड़ा

बड़े इमामबाड़े को 1780 में नवाब आसफुद्दौला ने बनवाना शुरू करवाया था। इस साल इलाके में भयंकर अकाल पड़ा और नवाब ने इस बिल्डिंग को बनवाना शुरू करवाया, जिससे लोगों को रोजगार मिल सके। ये इमारत केवल धार्मिक काम के लिए नहीं थी बल्कि इसको बनवाने का मकसद हजारों लोगों को रोजगार देना था। जिससे आवाम की रोटी-रोटी चल सके। इसलिए देखा जाए तो ये बिल्डिंग धार्मिक से ज्यादा इंसानियत का प्रतीक है। रोजगार के लिए काम कर रहे कामगारों ने ये भव्य बिल्डिंग बनाकर तैयार की। जिसमे विदेश की कंस्ट्रक्शन शैली का भी इस्तेमाल किया गया है।

इस बड़ी सी बिल्डिंग में तीन हॉल है। यहां पर बने हॉल को धनुषाकार बनाया गया है और इसकी छत को सपोर्ट देने के लिए किसी भी तरह के बीम, पिलर का इस्तेमाल नहीं किया गया है। बिना किसी सहारे या पिलर के बना ये बड़ा सा हॉल अपने खास आकार के आधार पर ही टिका हुआ है। जिसमे हजारों लोग एक साथ आ सकते हैं। इस हॉल को बनाने के लिए किसी लकड़ी या मेटल का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

यहां पर है दीवारों के कान

सेंट्रल हॉल की दीवारों की मोटाई 16 फिट है। जिसमे अगर फुसफुसाया जाए या माचिस की तीली को जलाया जाए तो आवाज दूसरे कोने में बिल्कुल साफ सुनाई देती है। शायद इसीलिए कहा जाता है कि दीवारों के भी कान होते हैं। ये वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। जो शायद ही किसी और महल या किले में देखने को मिलता है। आज भी जब आप इमामबाड़े की सैर के लिए जाएंगे तो गाइड आपको इन आवाजों को सुनवाते हैं। जिसे सुनकर आश्चर्य महसूस होता है।

वास्तुकला का एक और अनोखा नमूना ‘भूलभुलैया’

बड़े इमामबाड़े के अंदर ही बना है भूलभुलैया। जो अपनी एक जैसी डिजाइन की वजह से जाना जाता है। इसके अंदर एक जैसी डिजाइन के कई सारे रास्ते बने हैं। लगभग माना जाता है कि इसमे 1024 रास्ते हैं लेकिन ये आंकड़ा अभी भी सटीक नहीं माना जाता। इस बिल्डिंग में जा कर लोग बाहर आने का रास्ता भूल जाते हैं। इसी लिए इसे भूलभुलैया नाम दिया गया है। इमामबाड़े की सैर इसके अंदर गए बिना अधूरी मानी जाती है। अगर आप कभी जाएं और इस भूलभुलैया का लुत्फ लेना चाहते हैं तो गाइड के साथ जाना ज्यादा बेहतर होगा। अकेले जाने पर उम्मीद है कि आप को सही रास्ता ढूंढकर आने में वक्त लगे। यहां के गाइड भी इन रास्तों को सीढ़ियों की गिनती करके पहचानते हैं। तो सोचिए पहली बार जाने वाले विजिटर के लिए रास्तों को खोजना कितना मुश्किल होगा।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN