Source :- LIVE HINDUSTAN
War Impacts: ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई ने भारत के उर्वरक क्षेत्र पर गंभीर प्रभाव डाला है। गैस की सप्लाई में भारी कमी के चलते देश के अधिकांश यूरिया प्लांट्स अपनी क्षमता का महज 60 फीसदी ही उत्पादन कर पा रहे हैं।
ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई ने भारत के उर्वरक क्षेत्र पर गंभीर प्रभाव डाला है। खाड़ी क्षेत्र में बिगड़ते हालात के कारण भारत को प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे देश का यूरिया उत्पादन 60% पर आ गया है।
रूरल वॉयस ने उद्योग सूत्रों के के हवाले से बताया है कि गैस की सप्लाई में भारी कमी के चलते देश के अधिकांश यूरिया प्लांट्स अपनी क्षमता का महज 60 फीसदी ही उत्पादन कर पा रहे हैं। केवल दक्षिण भारत में स्थित कुछ प्लांट ही पूरी क्षमता से चल रहे हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए कई कंपनियां अप्रैल में होने वाले अपने वार्षिक रखरखाव यानी शटडाउन को एक सप्ताह पहले करने की योजना बना रही हैं, ताकि गैस की कमी से उत्पन्न दबाव को कम किया जा सके।
होर्मुज संकट और खाड़ी देशों में उत्पादन ठप
ईरान द्वारा किए गए हमलों के जवाब में कतर, यूएई, कुवैत, बहरीन और सऊदी अरब ने अपने कई गैस संयंत्रों को बंद कर दिया है। इसके अलावा, होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री आवाजाही रुकने से इन देशों से तेल और गैस की सप्लाई पूरी तरह ठप हो गई है। भारत अपनी गैस जरूरतों का करीब 50% आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा इन्हीं खाड़ी देशों से आता है।
गैस और यूरिया की कीमतों में उछाल
रूरल वॉयस की खबर के मुताबिक संकट के कारण वैश्विक बाजार में गैस की कीमतें 20 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू के पार पहुंच गई हैं, जो भारतीय प्लांट्स को गेल के जरिये मिलने वाली पूल्ड कीमत (13.63 डॉलर) से कहीं अधिक है। इसका सीधा असर यूरिया की कीमतों पर पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया के दाम पिछले एक महीने में 25% से अधिक बढ़कर 600 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गए हैं, जो फरवरी में लगभग 475 डॉलर प्रति टन था।
फिलहाल राहत, लेकिन आगे संकट की आशंका
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, फिलहाल देश में उर्वरकों का स्टॉक पिछले साल की तुलना में बेहतर स्थिति में है…
· यूरिया: फरवरी 2026 के अंत में स्टॉक 55 लाख टन (पिछले साल 49 लाख टन)
· डीएपी: फरवरी 2026 के अंत में स्टॉक 25 लाख टन (पिछले साल 13 लाख टन)
· एनपीके (कॉम्प्लेक्स): स्टॉक 54 लाख टन (पिछले साल 32 लाख टन)
हालांकि, उद्योग जगत का मानना है कि अगर यह युद्ध मार्च के अंत तक जारी रहता है और खाड़ी देशों में बंद संयंत्रों को चालू होने में एक महीने का समय लगता है, तो आने वाले समय में यूरिया और अन्य उर्वरकों की भारी किल्लत हो सकती है।
डीएपी और अन्य उर्वरकों पर भी संकट
यूरिया के अलावा डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) के आयात पर भारत की निर्भरता लगभग 100% है। युद्ध शुरू होने से पहले ही डीएपी की कीमत 65 डॉलर प्रति टन बढ़कर 740 डॉलर पर पहुंच गई थी। रूस को छोड़कर फिलहाल डीएपी आयात के और कोई विकल्प नजर नहीं आ रहे हैं। युद्ध के लंबा खिंचने से एलएनजी, अमोनिया, सल्फर और फॉस्फेटिक उर्वरकों की आपूर्ति पर भी गहरा संकट मंडरा रहा है।
क्या ओमान बनेगा विकल्प?
भारत के पास ओमान से यूरिया आयात का विकल्प है, जहां इफको और कृभको का संयुक्त उद्यम संचालित है। हालांकि, उद्योग सूत्रों का कहना है कि अकेले ओमान से आयात भारत की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता। ऐसे में सरकार को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।
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