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भारत की विदेश नीति में कुछ साल पहले तक बिना अवामी लीग के चुनाव और बीएनपी के सत्ता में आने को किसी बड़े झटके के रूप में देखा जाता था.
अब भारत तारिक़ रहमान और उनकी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के सत्ता में आने पर स्वागत करने में कोई कसर नहीं छोड़ता दिख रहा है.
बिना अवामी लीग के बांग्लादेश में चुनाव पर भी भारत ने ‘आपत्ति’ नहीं जताई.
साथ ही अवामी लीग का खुलकर समर्थन भी भारत नहीं कर रहा. तो क्या इसका ये संदेश जाता है कि बांग्लादेश में जुलाई 2024 में हुए सियासी विद्रोह के दौरान भारत ने जो रुख़ अपनाया था, वो रणनीतिक रूप से ठीक नहीं था?
बात केवल बीएनपी की ही नहीं है. भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफ़ीक़ुर रहमान से भी मिल रहे हैं और इस मुलाक़ात की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर पोस्ट की जा रही हैं.
जमात से मिलने की सार्वजनिक सूचना देना एक अहम टर्न है.
बांग्लादेश में 12 फ़रवरी को हुए आम चुनाव में तारिक़ रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को जीत मिली तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 फ़रवरी को बधाई देने में बिल्कुल भी देरी नहीं की.
पीएम मोदी ने एक्स पर बधाई संदेश पोस्ट करने के बाद तारिक़ रहमान को फोन किया और बातचीत की. तारिक़ रहमान के शपथ ग्रहण समारोह में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला गए और पीएम मोदी ने एक पत्र लिखकर बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री को भारत आमंत्रित भी किया.
लेकिन तारिक़ रहमान ने न्योता स्वीकार किया या नहीं अभी तक कुछ बताया नहीं है.
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तारिक़ रहमान की दुविधा
प्रधानमंत्री मोदी के इस रुख़ से स्पष्ट है कि भारत तारिक़ रहमान को लेकर गर्मजोशी दिखा रहा है और अंतरिम सरकार के दौरान तनातनी वाले संबंधों से बाहर निकलना चाहता है.
लेकिन तारिक़ रहमान की तरफ़ से अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसी कोई गर्मजोशी देखने को नहीं मिली. एक दिन बाद बीएनपी के आधिकारिक एक्स अकाउंट से पीएम मोदी की पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए शुक्रिया ज़रूर कहा गया. लेकिन तारिक़ रहमान के सोशल मीडिया अकाउंट से कुछ नहीं कहा गया.
ऐसा नहीं है कि तारिक़ रहमान जीत के बाद सक्रिय नहीं थे. जीत के बाद भी वह ढाका में कई राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हो रहे थे.
15 फ़रवरी को बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफ़ीक़ुर रहमान के आधिकारिक एक्स अकाउंट से एक पोस्ट की गई. इस पोस्ट में बताया गया कि बीएनपी प्रमुख तारिक़ रहमान उनके आवासीय कार्यालय में मिलने आए थे.
बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी बीएनपी की सहयोगी रही है लेकिन इस चुनाव में उनकी प्रतिद्वंद्वी थी. जमात-ए-इस्लामी को कई मामलों में भारत विरोधी देखा जाता है क्योंकि इसने बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम का समर्थन नहीं किया था.

बांग्लादेश पर करीबी नज़र रखने वालों का मानना है कि तारिक़ रहमान के लिए यह आसान नहीं है कि वह जमात के विपक्ष में रहते हुए भारत के साथ संबंधों में ऐसा इंप्रेशन दें कि बीएनपी की सरकार भारत के हितों के लिए काम कर रही है.
निरुपमा सुब्रमण्यम दक्षिण एशिया की जियोपॉलिटिक्स पर गहरी नज़र रखती हैं. बीबीसी हिन्दी ने उनसे पूछा कि भारत जितना खुलकर तारिक़ रहमान का स्वागत कर रहा है, उसे वह हाथों-हाथ क्यों नहीं ले रहे हैं?
निरुपमा सुब्रमण्यम कहती हैं, ”तारिक़ रहमान और भारत के बीच का अतीत बहुत अच्छा नहीं रहा है. 2001 से 2006 तक जब ख़ालिदा ज़िया बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थीं तब बांग्लादेश में भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त ने मुझसे कहा था कि तारिक़ रहमान वहाँ के संजय गांधी थे. लेकिन भारत के पास अब तारिक़ से बेहतर विकल्प नहीं है. भारत ने पहले कहा था कि वह चुनी हुई सरकार से बात करेगी और अब वहां के लोगों ने जनादेश दे दिया है. ऐसे में भारत स्वागत ही कर सकता था.”
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जमात की चुनौती
दरअसल, बांग्लादेश की राजनीति से शेख़ हसीना की अवामी लीग के बाहर होने के बाद बीएनपी को एक मध्यमार्गी पार्टी के रूप में देखा जा रहा है. बीएनपी जमात नहीं हो सकती है क्योंकि बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में तारिक़ रहमान के पिता ज़िया-उर रहमान भी शामिल थे. बीएनपी जमात की तरह मुक्ति संग्राम को ख़ारिज नहीं करती है.
शेख़ हसीना के उलट बीएनपी मुक्ति संग्राम और इस्लाम दोनों के बीच संतुलन बनाकर चलने की कोशिश करती है. लेकिन यह संतुलन जमात के विपक्ष में रहते हुए इतना आसान नहीं होगा. जमात इस्लाम की अतिवादी लाइन की ओर बढ़ेगा तो बीएनपी के लिए संतुलन बनाने में मुश्किलें होंगी.

निरुपमा सुब्रमण्यम कहती हैं, ”ज़िया-उर रहमान भी ख़ुद को मुक्ति योद्धा ही समझते थे. कई टकरावों में शेख़ मुजीब-उर रहमान और ज़िया-उर रहमान के बीच एक अहम लड़ाई यह भी थी कि किसने सबसे पहले बांग्लादेश की मुक्ति की घोषणा की. बीएनपी और उनके समर्थकों का मानना है कि सबसे पहले इसकी घोषणा ज़िया-उर रहमान ने की थी. इसे लेकर लेकर सिलेबस भी बदलते रहे हैं. बांग्लादेश का संस्थापक कौन है, इसे लेकर भी लड़ाई होती रही है. लेकिन दूसरी तरफ़ जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान की सेना का साथ दे रही थी.”
शेख़ हसीना जिस तरीक़े से जमात से निपटती थीं, उस तरह से तारिक़ रहमान शायद ही निपट पाएं. जमात-ए-इस्लामी चुनावी राजनीति में इस बार काफ़ी मज़बूत बनकर उभरी है.
जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन को 77 सीटें मिली हैं. बांग्लादेश के चुनाव में भारत अहम मुद्दा था. जिन छात्रों ने शेख़ हसीना को सत्ता छोड़ भागने पर मजबूर किया, उनकी नेशनल सिटिजन पार्टी भारत के ख़िलाफ़ खुलकर बोल रही थी और जमात के साथ इनका गठबंधन था. दूसरी तरफ़ तारिक़ रहमान पूरे चुनाव में किसी भी स्तर पर भारत विरोधी नहीं दिखे.
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर महेंद्र पी लामा कहते हैं कि जमात अगर भारत के लिए समस्या बनेगी तो बीएनपी के लिए भी बनेगी.
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तारिक़ रहमान की विदेश नीति
प्रोफ़ेसर लामा कहते हैं, ”जमात जिस हद तक ख़तरा भारत के लिए बनेगी, उतना ही बीएनपी के लिए भी बनेगी. ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि बांग्लादेश में अब कोई तीसरी पार्टी नहीं है. बीएनपी और जमात दोनों एक-दूसरे के ख़िलाफ़ एक झटके में नहीं हो सकती हैं. जमात और बीएनपी दोनों ने मिलकर शेख़ हसीना को हटाया है. जमात और बीएनपी दोनों आमने-सामने होंगी लेकिन इसमें अभी वक़्त लगेगा.”
प्रोफ़ेसर लामा कहते हैं कि थोड़ा इंतज़ार कीजिए अवामी लीग भी बीएनपी को समर्थन करेगी.
अपनी जीत के बाद 15 फ़रवरी को तारिक़ रहमान ने पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस की थी. इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में रहमान से भारत के साथ संबंधों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ”हमने विदेश नीति के संबंध में अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है, जो बांग्लादेश के हित में है और बांग्लादेशी लोगों का हित सबसे पहले आता है. बांग्लादेश और बांग्लादेश के लोगों के हितों की रक्षा करते हुए, हम अपनी विदेश नीति तय करेंगे.”
चीन और पाकिस्तान सहित अन्य क्षेत्रीय देशों के साथ संबंधों पर सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि उनकी प्राथमिकता बांग्लादेश के हितों की रक्षा करना होगी.
तारिक़ रहमान ने कहा था, “अगर कोई बात बांग्लादेश के हित में नहीं होगी तो स्वाभाविक रूप से हम उस पर नहीं चल सकते. मुझे पूरा विश्वास है कि पारस्परिक हित ही हमारी पहली प्राथमिकता होगी.”
यानी तारिक़ रहमान भारत को लेकर कुछ भी खुलकर बोलने से परहेज़ कर रहे हैं. गंगा वाटर ट्रीटी के 30 साल इसी साल पूरे हो रहे हैं और इसे फिर से आगे बढ़ाने के लिए नई संधि करनी होगी.
बीएनपी इस संधि को भारत की तरफ़ झुका हुआ बताती रही है और विरोध भी किया था. लेकिन सरकार में रहते हुए बीएनपी ने इसे कभी रद्द नहीं किया. अब बीएनपी को ही इसे नए सिरे से करना है. बीएनपी मानती है कि शेख़ हसीना की सरकार में भारत के साथ हुईं कई संधियां एकतरफ़ा थीं और इनकी समीक्षा होनी चाहिए.
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भारत की देरी
प्रोफ़ेसर लामा कहते हैं कि अगर बांग्लादेश को लगता है कि अब तक भारत के साथ संबंध डिपेंडेंट वाला था तो भारत को स्पष्ट कहना चाहिए कि हम अब इंटर डिपेंडेंट संबंधों के लिए तैयार हैं.
निरुपमा सुब्रमण्यम कहती हैं, ”मेरा मानना है कि तारिक़ रहमान सार्वजनिक रूप से ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे, जिससे यह संदेश जाए कि वह भारत को कुछ दे रहे हैं या किसी मामले में छूट दे रहे हैं. कोई समझौता होगा, उसमें तारिक़ रहमान ख़ुद को ऐसे नहीं दिखा सकते हैं, जिससे ये संदेश जाए कि भारत को उन्होंने कुछ ज़्यादा दे दिया है. अगर ऐसा करेंगे तो उन्हें बांग्लादेश में दिक़्क़त होगी. बांग्लादेश का जनादेश भारत का फेवर करने के लिए तो नहीं लगता है. मुझे लगता है कि बैकरूम डीलिंग ज़्यादा होगी.”
प्रोफ़ेसर महेंद्र पी लामा कहते हैं कि भारत जो काम अभी कर रहा है, उसे शेख़ हसीना के हटते ही शुरू कर देना चाहिए था.
प्रोफ़ेसर महेंद्र लामा कहते हैं, ”तारिक़ रहमान और बीएनपी के साथ सहयोग के लिए हाथ तब बढ़ा रहे हैं, जब बांग्लादेश की जनता के बीच भारत की छवि नकारात्मक बन गई है. किसी भी देश की लोकप्रिय सरकार अपने यहाँ के लोकप्रिय जनादेश के ख़िलाफ़ जाकर संबंध नहीं बनाना चाहती है. भारत अब बिल्कुल सही कर रहा है लेकिन तारिक़ रहमान उसी गर्मजोशी से पेश आएं, ऐसा अभी मुश्किल है.”
कहा जा रहा है कि बीएनपी की जीत भारत-बांग्लादेश के बीच ज़्यादा जटिल द्विपक्षीय राजनीतिक संबंधों के एक नए दौर की शुरुआत हो सकती है.
अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग से एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक्स के सीईओ राजीव बिस्वास कहते हैं, ”बीएनपी के नेतृत्व में बांग्लादेश चीन और पाकिस्तान से संबंध गहरा करेगा. ऐसे में भारत को इस इलाक़े में में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को मैनेज करना पड़ेगा.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
SOURCE : BBC NEWS



