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पर्दे के पीछे ईरान का कर्ज चुका रहे पुतिन? एक ही दांव से 3 सूरमाओं को कैसे कर रहे चित; एक्सपर्ट ने बताया

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Source :- LIVE HINDUSTAN

चेलानी ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा है कि यूक्रेन युद्ध के शुरुआती सालों में ईरान ने रूस को अहम मदद दी थी। उसने 50,000 से ज़्यादा ‘शाहिद’ ड्रोन रूस को दिए थे, जो रूसी सेना के हथियारों के जखीरे में एक जानलेवा इजाफा साबित हुए।

मध्य-पूर्व में जारी तनाव और जंग में एक तरफ ईरान है तो दूसरी तरफ ताकतवर अमेरिका और उसका दोस्त इजरायल है, जो रोज ईरान की राजधानी तेहरान समेत अन्य शहरों को निशाना बना रहा है। बावजूद इसके इस जंग के 14वें दिन भी ईरान पूरी ताकत के साथ डटा हुआ है और खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डों और तेल ठिकानों पर हमले कर उन्हें आर्थिक और रणनीतिक नुकसान पहुंचा रहा है। इस जंग में ईरानी हमले में अमेरिका और इजरायल को भी बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंच रहा है। ऐसे में इस बात की अटकलें जोर मारने लगी हैं कि क्या रूस अपने मित्र ईरान को गुपचुप समर्थन दे रहा है, जिसकी बदौलत वह दो बड़ी ताकतों से लोहा ले रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध के शुरुआती वर्षों में ईरान ने रूस को सैन्य सहायता की थी। इस वजह से मॉस्को अब किसी न किसी रूप में दोस्ती के उस कर्ज को चुका रहा है और अपने इस दांव से वह न केवल तीन सूरमाओं (अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप,इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमीर जेलेंस्की) को साध रहा है बल्कि अपने खिलाफ खुले युद्ध के मोर्चे को भी कमजोर कर रहा है। नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में स्ट्रैटेजिक स्टडीज के प्रोफेसर और अंतरराष्ट्र्रीय मामलों के जानकार ब्रह्म चेलानी ने लिखा है कि पुतिन ईरान की मदद का कर्ज उतार रहे हैं।

यूक्रेन युद्ध में ईरान की भूमिका

चेलानी ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, “यूक्रेन युद्ध के शुरुआती सालों में ईरान ने रूस को अहम मदद दी थी। उसने 50,000 से ज़्यादा ‘शाहिद’ ड्रोन रूस को दिए थे, जो रूसी सेना के हथियारों के ज़खीरे में एक जानलेवा इज़ाफ़ा साबित हुए। इसलिए, इस बात की संभावना बहुत कम है कि आज रूस, ट्रंप और नेतन्याहू की आक्रामक युद्ध की चाल का मुकाबला करने में ईरान की किसी न किसी तरह से मदद न कर रहा हो।” उन्होंने आगे लिखा, “मॉस्को का मुख्य मकसद शायद “दुश्मन को ज़्यादा से ज़्यादा नुकसान पहुँचाना” होगा। यानी अमेरिका को मध्य-पूर्व में अपने गोला-बारूद और संसाधनों को खर्च करने पर मजबूर करना, जो शायद यूक्रेन को दिए जा सकते थे।” ऐसा कर रूस अपने खिलाफ युद्ध को यूक्रेनी मोर्चे को भी कमजोर कर रहे हैं और दोस्ती का कर्ज भी उतार रहे हैं और लगे हाथ तीनों सूरमाओं को रणनीतिक चोट भी दे रहे हैं।

मॉस्को का संभावित रणनीतिक लक्ष्य

उनके अनुसार रूस का मुख्य उद्देश्य सीधे युद्ध में कूदना नहीं होगा, बल्कि अमेरिका पर दबाव बढ़ाना हो सकता है। यदि अमेरिका को मध्य-पूर्व में अधिक संसाधन और हथियार खर्च करने पड़ें, तो इससे यूक्रेन को मिलने वाली सैन्य सहायता पर असर पड़ सकता है। उनका मानना है कि रूस की मदद खुलकर नहीं बल्कि गुप्त या तकनीकी सहयोग के रूप में हो सकती है, जैसे: खुफिया जानकारी साझा करना – अमेरिकी या इज़रायली सैन्य गतिविधियों से जुड़ा रियल-टाइम डेटा साझा करना और सिग्नल इंटेलिजेंस – रडार और रेडियो फ्रीक्वेंसी की जानकारी साझा करना, ताकि ईरानी ड्रोन और मिसाइलें वायु-रक्षा प्रणालियों से बच सकें।

यूक्रेन युद्ध का अनुभव भी रूस ईरान से साझा कर रहा

चेलानी के मुताबिक, रूस यूक्रेन युद्ध से सीखे ड्रोन युद्ध की रणनीति और अनुभव भी ईरान से साझा कर रहा है ताकि ईरान अपने ड्रोनों की रक्षा कर सके और ड्रोनों से मिडिल इस्ट में दुश्मन के ठिकानों पर हमले कर सके। उन्होंने लिखा है, “रूस ‘सिग्नल्स इंटेलिजेंस’ (signals intelligence) भी साझा कर सकता है- जैसे कि खास रडार और रेडियो फ्रीक्वेंसी- जिससे ईरानी ड्रोन और मिसाइलों को रास्ता ढूँढ़ने और अमेरिका व इज़रायल की हवाई सुरक्षा को भेदने में ज़्यादा आसानी होगी।” उनके मुताबिक, ‘रिवर्स मेंटरशिप’ (reverse mentorship) की संभावना भी कम अहम नहीं है। यानी ईरान को उन सबकों को आज़माने में मदद करना जो रूस ने यूक्रेन में सीखे हैं।

चेलानी के मुताबिक, रूस पश्चिमी देशों से मिली हथियार प्रणालियों- जैसे कि ‘पैट्रियट’ और ‘IRIS-T’ को, बड़ी संख्या में ड्रोन का इस्तेमाल करके (mass-drone saturation tactics) नाकाम करने से जुड़ी जानकारी भी ईरान को साझा कर सकता हैं। दरअसल, यूक्रेन युद्ध ने रूस को ड्रोन के झुंडों और बैलिस्टिक मिसाइलों की बौछारों के बीच तालमेल बिठाने में माहिर बना दिया है; लेकिन यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे दोहराने में ईरान को अभी भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में समझा जा रहा है कि रूस की ये जानकारी और मदद ईरान को इस जंग में रणनीतिक लाभ दे सकता है।

वैश्विक रणनीतिक समीकरण

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान अभी इस स्तर की समन्वित ड्रोन-मिसाइल रणनीति को पूरी तरह लागू नहीं कर पाया है, इसलिए रूस के अनुभव उसके लिए उपयोगी हो सकते हैं। मौजूदा हालात में यदि रूस और ईरान के बीच सैन्य सहयोग बढ़ता है, तो यह संघर्ष केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी असर डाल सकता है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या रूस वास्तव में ईरान की मदद करता है या वह केवल कूटनीतिक समर्थन तक ही सीमित रहता है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN