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नीतीश कुमार तीन महीने में ही क्यों छोड़ रहे हैं सीएम की कुर्सी, बेटे के भविष्य को लेकर लग रही हैं ये अटकलें

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Source :- BBC INDIA

तस्वीर बीते एक मार्च की है, नीतीश कुमार के जन्मदिन पर उनके बेटे निशांत उन्हें मिठाई खिला रहे हैं.

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21 मिनट पहले

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’25 से 30 एक बार फिर नीतीश’

इसी नारे के साथ एनडीए ने बिहार में साल 2025 का विधानसभा चुनाव लड़ा.

गठबंधन ने भारी बहुमत के साथ जीत दर्ज की और नीतीश कुमार ने दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.

बीते लगभग दो दशकों से बिहार की राजनीति की धुरी बने हुए नीतीश कुमार को शपथ लिए हुए 105 दिन ही गुज़रे हैं और अब वह राज्यसभा जाने की तैयारी में हैं.

उनके इस फ़ैसले ने कइयों को चौंकाया है, ख़ासकर उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं को.

उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं में रोष है, नाराज़गी है और इस बात को लेकर गहरा असमंजस भी कि आख़िर इतना बड़ा फ़ैसला इतनी अचानक कैसे और क्यों लिया गया.

नीतीश कुमार के सोशल मीडिया पोस्ट के मुताबिक़, वह अपनी स्वेच्छा से संसद के ऊपरी सदन का सदस्य बनना चाहते हैं लेकिन पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए यह स्वीकार कर पाना मुश्किल हो रहा है.

बाढ़ से आए एक कार्यकर्ता ने कहा कि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की ख़बर सामने आने के बाद से उनकी होली की खुशी गायब हो गई है.

वो कहते हैं, ”ये फ़ैसला नीतीश कुमार का नहीं है. अगर वह फ़ैसला लेते भी तो होली के बाद कार्यकर्ताओं और पार्टी के लोगों के साथ रायशुमारी करने के बाद लेते. रात में मैंने जैसे ही न्यूज़ देखी, सुबह आनन-फ़ानन में पटना पहुंचे. विश्वास ही नहीं हो रहा कि ऐसा कुछ हुआ है.”

4 मार्च की रात टीवी चैनलों पर नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की ख़बर सुनने के बाद, 5 मार्च की सुबह जेडीयू दफ़्तर और एक अणे मार्ग पहुंचने वाले वह अकेले कार्यकर्ता नहीं हैं.

सैकड़ों की तादाद में जेडीयू कार्यकर्ताओं की भीड़ 5 मार्च की सुबह से ही पार्टी दफ़्तर और एक अणे मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास के बाहर जुटनी शुरू हो गई थी.

सीएम आवास के बाहर तो हालात ऐसे बन गए कि पुलिस बल की अतिरिक्त तैनाती करानी पड़ी, यहां तक कि कार्यकर्ताओं के वहां खड़े रहने पर भी पाबंदी लगा दी गई.

रही बात जेडीयू दफ़्तर की तो नाराज़गी में डूबे कार्यकर्ताओं ने यहां तोड़फोड़ तक कर दी.

राज्यसभा नामांकन के लिए जब गृहमंत्री अमित शाह के साथ नीतीश कुमार का काफ़िला सीएम आवास से निकला तो बाहर कार्यकर्ताओं ने ‘अमित शाह और ललन सिंह मुर्दाबाद के नारे लगाए. वहीं कुछ नारे ऐसे भी कि ‘वोट हमारा, राज तुम्हारा नहीं चलेगा, नहीं चलेगा.’

जिन कार्यकर्ताओं से हमारी बात हुई उनमें से ज़्यादातर ने यह आरोप लगाया है कि नीतीश कुमार को राज्यसभा भेजने के पीछ किसी और का नहींं, बल्कि उन्हीं की पार्टी के ‘कुछ लोगों’ का हाथ है. वहीं कुछ को अभी भी उम्मीद है कि शायद नीतीश कुमार अपना नामांकन वापस ले लें.

पर फ़िलहाल के लिए ऐसा होता नज़र नहीं आता. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि नीतीश कुमार के इस फ़ैसले के पीछे की मुख्य वजहें क्या रही होंगी, क्या उन पर वाकई किसी का दबाव था, बिहार का अगला मुख्यमंंत्री कौन होगा, किस पार्टी से होगा? नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की राजनीति में प्रवेश करने के दावों में कितनी सच्चाई है और साथ ही सवाल ये भी कि अब जेडीयू का भविष्य क्या होगा.

कितना चौंकाने वाला फ़ैसला

नीतीश कुमार के उस पोस्ट की तस्वीर जिसमें उन्होंने अपने राज्यसभा जाने की इच्छा सार्वजनिक की.

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बिहार के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक संतोष सिंह नीतीश कुमार के इस फ़ैसले को कहीं से भी चौंकाने वाला नहीं बताते, न ही साल 1973 से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा.

दोनों के मुताबिक़ नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ना और राज्यसभा जाना पहले से तय था.

संतोष सिंह के मुताबिक़ एक तारीख़ से ही मुख्मंत्री आवास में यह ख़बर उड़ने लगी थी कि ‘साहब जाने वाले हैं’.

तो आख़िर नीतीश कुमार के इस निर्णय के पीछे क्या वजहें रहीं?

संतोष सिंह इसके पीछे के कुछ मुख्य कारण गिनाते हैं. पहला ये कि राज्यसभा की वैकेंसी लगभग हर दो साल पर आती है, तो अगर इस वाली वैकेंसी में नीतीश कुमार नामांकन नहीं भरते तो उन्हें दो और साल का इंतज़ार करना पड़ता.

दूसरी कि उनकी सेहत जवाब दे रही थी. वह फ़ैसले लेने में उतने सक्षम नहीं रहे, जितना कि पहले हुआ करते थे.

तीसरा ये कि उनके उत्तराधिकारी की रेस में पार्टी के नेशनल सेक्रेटरी और पूर्व ब्यूरोक्रैट मनीष वर्मा का नाम सामने आने लगा था, जिससे नीतीश कुमार के लिए थोड़ी असहज स्थिति पैदा हो गई थी. इसके बाद उनके बेटे निशांत कुमार को राज्यसभा भेजने की चर्चा होने लगी. पर निशांत दिल्ली जाने के लिए तैयार नहीं हुए. नतीजतन ललन सिंह, संजय झा, विजय चौधरी जैसे लोगों ने नीतीश कुमार को मनाया और यह भरोसा दिलाया कि उनके लिए राज्यसभा जाने का यही सही समय है.

संतोष सिंह यहां इस तथ्य पर भी ध्यान खींचते हैं कि नीतीश कुमार के बाद जेडीयू की जो लीडरशिप है, उसके बीजेपी के साथ बहुत सहज रिश्ते हैं.

वह कहते हैं, ” संजय झा तो बीजेपी में ही थे. ललन सिंह नरेंद्र मोदी के ही कैबिनेट में मंत्री हैं. नीतीश कुमार खुद फ़ैसले लेने में उतने सक्षम हैं नहीं, तो ऐसे में यह कह देना कि स्वतंत्र रूप से यह उन्हीं का फ़ैसला होगा, सही नहीं होगा.”

लव कुमार मिश्रा का मानना है कि नीतीश कुमार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्री अमित शाह का दबाव था. चुनाव के समय ही उनसे कहा गया था कि अब उन्हें राज्यसभा आ जाना चाहिए और प्रदेश में बीजेपी का मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए.

संतोष सिंह के अनुसार, नीतीश कुमार से कहा गया था कि अगला मुख्यमंत्री उनकी सहमति से ही चुना जाएगा. साथ ही अगर बीजेपी का सीएम बनता है तो दो डिप्टी सीएम जेडीयू के होंगे.

कौन होगा अगला सीएम?

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी.

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तो नीतीश कुमार के बाद अब बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी कौन संभालेगा?

लव कुमार मिश्रा और संतोष सिंह दोनों ही सम्राट चौधरी को एक प्रबल दावेदार के रूप में देखते हैं.

संतोष सिंह कहते हैं, ” मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सम्राट चौधरी को पसंद करते हैं, जातीय समीकरणों को भी देखा जाए तो सम्राट चौधरी एक सुरक्षित विकल्प हैं. बिहार में पिछड़ी जातियों में यादव और कोइरी-कुर्मी सबसे प्रभावशाली जातियां हैं. कोइरी-कुर्मी नीतीश कुमार के कोर वोटर रहे हैं. तो उन्हें तुरंत नाराज़ करने का रिस्क कोई नहीं उठाना चाहेगा. ऐसे में अगर मुख्यमंत्री कोइरी जाति से ताल्लुक रखने वाले सम्राट चौधरी को बनाया जाएगा, तो डिप्टी सीएम कुर्मी और अगड़ी जाति का होगा. ”

लेकिन वह इस बात को भी नज़रअंदाज़ नहीं करते कि बीजेपी चौंकाने वाले फ़ैसले के लिए जानी जाती है.

मुख्यमंत्री की रेस में नित्यानंद राय, विजय सिन्हा, दिलीप जायसवाल,संजीव चौरसिया, प्रमोद चंद्रवंशी, रामकृपाल यादव, जनक राम जैसे लोगों का भी नाम चल रहा है और साथ ही चर्चा निशांत कुमार के डिप्टी सीएम बनने की भी है, तो इसमें कितनी सच्चाई है?

निशांत की राजनीति में एंट्री?

अपने इकलौते बेटे निशांत के साथ नीतीश कुमार.

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इस पर लव मिश्रा कहते हैं कि फ़िलहाल के लिए निशांत की राजनीतिक एंट्री को कुछ दिनों के लिए टाल दिया गया है.

पार्टी के ही कुछ नेताओं का हवाला देते हुए वह कहते हैं, ”अगर निशांत को अभी राजनीति में उतारा गया तो नीतीश कुमार पर भी परिवारवाद के आरोप लगेंगे. इसलिए उन्हें तत्काल कोई राजनीतिक भूमिका नहीं मिलने जा रही.”

पर संतोष सिंह का मानना है कि जेडीयू के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए निशांत का राजनीति में प्रवेश करना ज़रूरी है. उनका मानना है कि चुनावी राजनीति में अगर जेडीयू को प्रासंगिक बने रहना है तो निशांत को सामने आना ही पड़ेगा.

निशांत कुमार, नीतीश कुमार के इकलौते बेटे हैं. वे सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन से लगभग दूर ही रहे हैं. उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है.

वे सक्रिय राजनीति में नहीं हैं और न ही किसी पार्टी पद पर हैं. मगर समय-समय पर उनके राजनीति में आने की अटकलें लगती रही हैं, पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान और उसके बाद भी वह कई मौकों पर नीतीश कुमार के साथ नज़र आए और मीडिया से रूबरू भी हुए.

लेकिन अब तक उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई राजनीतिक भूमिका नहीं निभाई है.

जेडीयू का भविष्य क्या होगा?

रहा सवाल पार्टी के भविष्य का, तो संतोष सिंह कहते हैं कि साल 2030 तक पार्टी को कोई दिक्कत नहीं होगी और अगर निशांत सक्रिय राजनीति में उतरते हैं, साथ ही पांच साल में एक परिपक्व नेता के रूप में खुद को स्थापित कर लेते हैं तो 2030 के बाद भी जद(यू) बिहार में एक राजनीतिक फ़ोर्स बनी रहेगी. लेकिन अगर उनकी राजनीति में एंट्री नहीं होती तो पार्टी के लिए भविष्य चुनौतीपूर्ण होगा.

नीतीश कुमार के ‘युग का अंत’

राज्यसभा नामांकन पत्र भरकर सौंपते नीतीश कुमार, साथ में बीजेपी के अध्यक्ष नितिन नबीन, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा मौजूद हैं.

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इसी संदर्भ में कई लोग नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फ़ैसले को बिहार की राजनीति में उनके लंबे दौर के एक संभावित अंत के संकेत के तौर पर भी देख रहे हैं.

गुरुवार को जब नीतीश कुमार ने अपना नामांकन पत्र भरा, तब वहीं मौजूद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कार्यकाल बिहार के इतिहास में स्वर्णिम काल के रूप में दर्ज होगा.

उन्होंने आगे कहा, ”इतना लंबा राजनीतिक करियर होते हुए भी उनके ऊपर कभी कोई दाग नहीं लगा. मुख्यमंत्री रूप में उनका जो कार्यकाल रहा और इस दौरान उन्होंने जो काम किए उसे बिहार के लोग न केवल याद रखेंगे बल्कि उसका सम्मान भी करेंगे.”

नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा छात्र राजनीति से शुरू हुई. 1970 के दशक में वे जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से जुड़े और आपातकाल के दौरान सक्रिय राजनीति में पहचान बनाई. 1985 में पहली बार बिहार विधानसभा के सदस्य बने और बाद में 1989 में लोकसभा पहुंचे.

केंद्र में उन्होंने रेल मंत्री और कृषि मंत्री जैसे अहम पद संभाले.

2000 में वे पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री तो बने, लेकिन उनका पहला कार्यकाल मात्र सात दिनों का रहा. साल 2005 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया.

मई, 2014 से लेकर फ़रवरी, 2015 के बीच के छोटे अंतराल को छोड़ दें तो वे तब से लगातार बिहार की सत्ता के केंद्र में बने रहे हैं और राज्य की राजनीति की धुरी माने जाते हैं.

साल 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव भी उन्हीं के चेहरे पर लड़ा गया. एनडीए गठबंधन को दो तिहाई बहुमत से भी अधिक सीटें आईं और बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.

इसके बावजूद मुख्यमंत्री पद की कमान एक बार फिर नीतीश कुमार को ही सौंपी गईं.

हालांकि चुनावी नतीजों के बाद से ही विपक्षी दलों और कई राजनीतिक विश्लेषकों की ओर से यह कहा जाता रहा कि शायद इस बार नीतीश कुमार बतौर मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे. अब हालात उसी दिशा में आगे बढ़ चुके हैं.

नीतीश कुमार की केंद्रीय राजनीति में वापसी होने जा रही है पर वरिष्ठ पत्रकारों के मुताबिक़ इसमें अभी कम से कम एक महीने का वक़्त लग सकता है, क्योंकि राज्यसभा का नया कार्यकाल 10 अप्रैल के बाद शुरू होगा. माना जा रहा है कि उसी के बाद वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे सकते हैं और बिहार में नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

SOURCE : BBC NEWS