Source :- BBC INDIA
इमेज स्रोत, Getty Images
बुधवार को, भारत ने चीनी के निर्यात पर 30 सितंबर 2026 तक प्रतिबंध लगा दिया. यह फ़ैसला इस साल गन्ना उत्पादन के अनुमानित लक्ष्य से कम रहने और ईरान में युद्ध के कारण उर्वरक आयात में गंभीर बाधाएं पैदा होने के बाद लिया गया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला बढ़ती महंगाई की आशंकाओं के बीच अपनी विशाल आबादी के लिए स्थानीय आपूर्ति को स्थिर रखने पर सरकार के ध्यान देने को दर्शाता है.
भारत दुनिया में चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है और सबसे बड़े निर्यातकों में शामिल है. ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं, भारत की सबसे अधिक मूल्य वाली नकदी फ़सलों में से एक के निर्यात पर प्रतिबंध कई सवाल खड़े करता है.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार का यह फ़ैसला संभवतः घरेलू आपूर्ति को संभालने के लिए है, क्योंकि भारत चीनी के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक भी है.
इंडियन शुगर एंड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईएसएमए) के महानिदेशक दीपक बल्लानी ने कहा कि यह प्रतिबंध एहतियाती है, जिसका उद्देश्य देश के भीतर पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि निर्यात की स्थिति की ज़्यादा सुव्यवस्थित समीक्षा की उम्मीद थी.
बल्लानी ने बीबीसी से कहा, “हमने निर्यात की स्थिति की एक संतुलित समीक्षा की उम्मीद की थी, ख़ासकर इसलिए क्योंकि कुछ अनुबंध पहले ही हो चुके हैं. चीनी की उन खेपों को बाहर जाने की अनुमति दी जानी चाहिए थी, क्योंकि अनुबंधों का उल्लंघन करना सही नहीं है.”
उम्मीद से कम उत्पादन
विशेषज्ञों के अनुसार, निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की एक बड़ी वजह ये है कि इस सीज़न (2025–2026) के लिए अनुमानित उत्पादन की तुलना में गन्ने की पैदावार कम रही है.
बल्लानी ने बीबीसी से कहा कि शुरुआती अनुमानों के अनुसार 2025-26 में शुद्ध चीनी उत्पादन 3 करोड़ टन रहने की उम्मीद थी, लेकिन अब मौसम ख़राब होने की वजह से उत्पादन लगभग 2.8 करोड़ टन तक रहने का अनुमान है.
इमेज स्रोत, Prakash Singh/Bloomberg via Getty Images
उन्होंने आगे कहा, “पहले के अनुमानों के आधार पर भारत सरकार ने 15 लाख टन निर्यात की अनुमति दी थी, जिसमें से लगभग 6.5 लाख टन पहले ही भेजा जा चुका है. इसके बावजूद, उद्योग घरेलू उपलब्धता को संतुलित रखते हुए और वैश्विक चीनी बाज़ार में भारत की बढ़ती भूमिका का समर्थन करते हुए पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखे हुए है.”
उर्वरकों पर होर्मुज़ का प्रभाव
कम उत्पादन के अलावा, एक और कारण जो निर्यात प्रतिबंध का कारण बन सकता है, वह होर्मुज़ स्ट्रेट के बंद होने से भारत के उर्वरक भंडार पर पड़ा दबाव है.
सरकार इस बात पर ज़ोर दे रही है कि भारत के पास उर्वरक का पर्याप्त भंडार है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ गन्ना किसान पहले ही आपूर्ति की कमी का सामना कर रहे हैं.
बुलंदशहर में भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के ज़िला अध्यक्ष चौधरी अरव सिंह ने कहा, “इस समय उर्वरक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है, और किसान या तो महंगा उत्पाद ख़रीदने या उपयोग की मात्रा घटाने के बारे में सोच रहे हैं. भविष्य में स्थिति और मुश्किल हो सकती है.”
दीपक बल्लानी को भी लगता है कि भविष्य में उर्वरकों की कोई भी कमी गन्ने की पैदावार पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है.
उन्होंने कहा, “गन्ने की बुवाई हो चुकी है और उर्वरक, यूरिया आदि की आवश्यकता पड़ेगी. अगर कमी होती है या कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर निश्चित रूप से पैदावार पर पड़ेगा.”
इथेनॉल का सवाल
इमेज स्रोत, Sanchit Khanna/Hindustan Times via Getty Images
चीनी की घरेलू आपूर्ति का संबंध भारत के इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल की ओर बढ़ने के फ़ैसला से भी जुड़ा हुआ है. इथेनॉल मुख्य रूप से ख़मीर के जरिए चीनी और स्टार्च की फ़र्मेंटिंग से बनाया जाता है.
भारत में बनने वाले कुल इथेनॉल का लगभग 40% हिस्सा गन्ने से मिलने वाले कच्चे माल से बनता है. इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफ़ैक्चरर्स एसोसिएशन (आईएसएमए) के अनुसार, 2025-26 में भारत के कुल चीनी उत्पादन में से लगभग 35 लाख टन इथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया गया.
सरकार ने ईंधन में मिलाने के लिए गन्ना-आधारित इथेनॉल की आपूर्ति को तेजी से बढ़ाया है, जो 2013-14 में 38 करोड़ लीटर से बढ़कर 2023-2024 में 672 करोड़ लीटर हो गई है.
सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस की फ़ेलो प्रेरणा प्रभाकर ने बीबीसी से कहा कि भले ही यह प्रतिबंध मुख्य रूप से खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने के लिए लगाया गया है, लेकिन इसके पीछे ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा भी है.
प्रभाकर ने कहा, “ऐसा लगता है कि उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है, क्योंकि इससे कच्चे तेल पर निर्भरता कम होगी.”
हालांकि, चीनी उद्योग के विशेषज्ञों को इथेनॉल और चीनी निर्यात प्रतिबंध के बीच सीधा और तत्काल संबंध नज़र नहीं आता. उनका कहना है कि चीनी उत्पादन का मौसम पहले ही ख़त्म हो चुका है और अधिकतर मिलें बंद हो चुकी हैं. गन्ने का वार्षिक चक्र अक्तूबर में शुरू होता है और सितंबर में समाप्त होता है.
दीपक बल्लानी कहते हैं, “जितनी भी चीनी इथेनॉल के लिए भेजी जानी थी, वह पहले ही भेजी जा चुकी है. ऐसा नहीं है कि निर्यात प्रतिबंध से इथेनॉल उत्पादन बढ़ जाएगा.”
प्रतिबंध का वैश्विक और घरेलू प्रभाव
भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी निर्यातकों में से एक है, और अफ़्रीका इसका सबसे बड़ा बाज़ार है. वाणिज्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच भारत ने 1869.69 मिलियन डॉलर मूल्य की चीनी का निर्यात किया, जिसमें से अधिकांश अफ़्रीकी देशों को गया.
आईएसएमए के अनुसार, प्रमुख चीनी निर्यात गंतव्यों में जिबूती, सोमालिया, सूडान, केन्या, तंज़ानिया और श्रीलंका, अफ़गानिस्तान, इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि अब अफ़्रीकी देश अपनी चीनी की जरूरतों को पूरा करने के लिए ब्राज़ील या थाईलैंड की ओर रुख कर सकते हैं.
इमेज स्रोत, Prakash Singh/Bloomberg via Getty Images
इस बीच, वैश्विक स्तर पर चीनी की कमी को लेकर चिंताएं पहले ही उभर चुकी हैं.
यह प्रतिबंध ऐसे समय में लगाया गया है जब रुपया कमज़ोर हो रहा है और प्रधानमंत्री मोदी ने विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से मितव्ययिता के उपाय अपनाने की अपील की है.
लेकिन भारत के कृषि मंत्रालय में केंद्रीय सचिव रहे सिराज हुसैन ने कहा कि निर्यात प्रतिबंध का विदेशी मुद्रा भंडार पर कोई भी असर पड़ने की संभावना नहीं है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, “चूंकि वैश्विक स्तर पर चीनी की कीमतें कम हैं, इसलिए निर्यात पर प्रतिबंध के फ़ैसला का ज़्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा. किसी भी स्थिति में कुल निर्यात कोटा में से इस वर्ष केवल 7-8 लाख टन चीनी का ही निर्यात हुआ है.”
विशेषज्ञों के अनुसार निर्यात प्रतिबंध के कारण जहां घरेलू स्तर पर चीनी की आपूर्ति में बढ़ोतरी हो सकती है, वहीं यह फ़ैसला किसानों और मिल मालिकों के लिए बुरी ख़बर लेकर आया है.
कृषि और ग्रामीण क्षेत्र पर केंद्रित समाचार पोर्टल ‘रूरल वॉयस’ के प्रधान संपादक हरवीर सिंह कहते हैं, “वैश्विक स्तर पर कीमतें अभी मज़बूत हो रही थीं. भारतीय निर्यात के बढ़ने का अच्छा अवसर था, जो अब नहीं हो पाएगा.”
सिंह ने कहा कि यह निर्यात प्रतिबंध चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति को और ख़राब कर सकता है, जिससे किसानों का बकाया भुगतान चुकाने की उनकी क्षमता और प्रभावित होगी. उन्होंने यह भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में चीनी उत्पादन कम रहने के बावजूद इसकी कीमतें स्थिर बनी रही थीं. उद्योग को कीमतों में बढ़ोतरी की उम्मीद थी.
हरवीर सिंह कहते हैं, “ऐसा महसूस किया जा रहा था कि चीनी की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति में सुधार होता.”
“कीमतों में बढ़ोतरी से उनकी भुगतान क्षमता बेहतर होती, जो अंततः किसानों के लिए भी अच्छा होता.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
SOURCE : BBC NEWS



