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क्या सचमुच कोई सिर्फ़ आपके लिए है? क्या है सोलमेट्स का विज्ञान

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Source :- BBC INDIA

एक कांच के बीकर के अंदर रखे दो दिल

वैलेंटाइन डे पर अक्सर यह भावना ज़ोर मारती है कि कहीं न कहीं ‘वह’ (द वन) ज़रूर होगा- एक ऐसा इंसान जो हमारी आत्मा का साथी है, बिल्कुल परफ़ेक्ट मेल, वह शख़्स जो मेरे साथ रहने के लिए ही बना है.

पूरे इतिहास में इंसान हमेशा इस ख़याल की तरफ़ खिंचता आया है कि प्यार यूं ही नहीं होता. प्राचीन ग्रीस में, प्लेटो ने कल्पना की थी कि कभी हमारा पूरा अस्तित्व था- चार हाथ, चार पैर, दो चेहरों वाला और हम इतने चमकदार थे कि ज़्यूस ने हमें दो हिस्सों में बांट दिया; तब से हर आधा हिस्सा धरती पर अपने खोए हुए दूसरे हिस्से को ढूंढता फिर रहा है.

यही मिथक आज के ‘सोलमेट’ को उसकी काव्यात्मक पहचान देता है- और ये उम्मीद भी कि कहीं न कहीं कोई ऐसा है जो हमें आख़िरकार पूरा महसूस करवाएगा.

मध्य युग में, ट्रूबेडॉ और आर्थरियन कहानियों ने उसी तड़प को ‘शिष्ट प्रेम’ के रूप में दिखाया- एक गहरी, अक्सर वर्जित भक्ति, जैसे लैंसलॉट का ग्विनिवियर के लिए प्यार, जिसमें एक शूरवीर अपनी कीमत यह दिखाकर साबित करता था कि वह अपनी प्रिया, जिसका नाम वह खुलकर ले भी नहीं सकता, के लिए आत्म बलिदान तक दे सकता है.

पुनर्जागरण के समय तक, शेक्सपियर जैसे लेखक ‘नियति से बिछड़े प्रेमी’ की बात करने लगे- ऐसे प्रेमी जो एक अटूट जुड़ाव से बंधे हों, लेकिन परिवार, किस्मत या हालात उन्हें अलग कर दें. जैसे ब्रह्मांड ही उनकी प्रेम कहानी लिख रहा हो और उन्हें सुखद अंत पाने से रोक रहा हो.

आधुनिक दौर में, हॉलीवुड और रोमांस नॉवल्स ने हमें परी-कथा जैसी प्रेम कहानियां बेच दी हैं.

लेकिन ताज़ा विज्ञान सोलमेट्स के बारे में क्या कहता है? क्या सच में कहीं कोई ख़ास इंसान सिर्फ़ हमारे लिए बना है?

हम कैसे ‘उसी को’ दिल दे बैठते हैं

प्लेटो (बाएं) ने कल्पना की थी कि इंसान कभी पूरे हुआ करते थे- चार हाथ, चार पैर और दो चेहरे वाले. बाद में ज़्यूस (दाएं) ने उन्हें दो हिस्सों में बांट दिया, और तब से हर आधा हिस्सा अपने दूसरे आधे को ढूंढता फिर रहा है

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कैम्ब्रिज की एंग्लिया रस्किन यूनिवर्सिटी (एआरयू) में सोशल साइकोलॉजी के प्रोफ़ेसर वीरेन स्वामी ने हमारे आज के यूरोपीय रोमांटिक प्रेम के नज़रिये की पड़ताल मध्यकालीन यूरोप तक की है- जहां कैमेलॉट, लैंसलॉट, ग्विनिवियर और राउंड टेबल के नाइट्स की शिष्टता वाली कहानियां पूरे महाद्वीप में फैल गई थीं.

वह कहते हैं, “इन कहानियों ने पहली बार यह ख़्याल आगे बढ़ाया कि आपको एक ही इंसान को अपना साथी चुनना चाहिए- और वही साथी पूरी ज़िंदगी के लिए होता है.”

“उससे पहले, यूरोप के बड़े हिस्से में आप जितने चाहे उतनों से प्रेम कर सकते थे, और प्रेम बहुत लचीला था, और अक्सर उसका सेक्स से कोई ख़ास लेना देना नहीं होता था.”

वक़्त के साथ, जब औद्योगीकरण लोगों को उनकी कृषि-आधारित बस्तियों और जान-पहचान वाले रिश्तों से दूर ले जाने लगा, तो लोग ‘अलग-थलग’ पड़ने लगे. वह कहते हैं. “वे किसी एक ऐसे इंसान को ढूंढ़ने लगे जो उन्हें उनकी बदतर ज़िंदगी की हालतों से बचा ले.”

आज के डेटिंग ऐप्स उस कहानी को एक एल्गोरिदम में बदल देते हैं, जिसे स्वामी ‘रिलेशन-शॉपिंग’ कहते हैं.

सोलमेट की तलाश आख़िरकार उसी चीज़ के उलट बन जाती है जिसे लोग ढूंढ़ रहे होते हैं: “कई लोगों के लिए यह बहुत ही नीरस अनुभव बन जाता है.”

वह कहते हैं, “आप एक पार्टनर की शॉपिंग कर रहे होते हैं… डेटिंग ऐप पर शायद दर्जनों लोगों को देखते हुए, जब तक कि आप उस मुकाम पर न पहुंच जाएं जब आपको लगे… बस, अब मुझे रुकना पड़ेगा.”

एकमात्र वही या ‘द वन’

वीरेन स्वामी का मानना है कि आज के रोमांटिक प्रेम के विचारों की जड़ें मध्यकालीन यूरोपीय कहानियों में मिलती हैं- जैसे लैंसलॉट और ग्विनिवियर की कथा

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अमेरिका के यूटा राज्य के प्रोवो में स्थित ब्रिघम यंग यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर, जेसन कैरोल मैरिज ऐंड फैमिली स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर हैं. वह ‘द वन’ की तड़प के प्रति सहानुभूति रखते हैं.

वह कहते हैं, “हम ऐसे जीव हैं जो जुड़ाव पर टिके हैं. हमें उस बंधन की चाहत होती है.” लेकिन अपने लेक्चरों में वे छात्रों से कहते हैं कि उन्हें सोलमेट वाले विचार को त्यागना होगा, बिना ‘द वन’ की चाहत को छोड़े हुए.

यह सुनने में विरोधाभासी लगता है, लेकिन कैरोल के लिए यह किस्मत और मेहनत के बीच का फ़र्क है.

वह कहते हैं, “सोलमेट तो बस मिल जाता है. वह पहले से बना हुआ होता है. लेकिन ‘एक वही और एकमात्र वही’, वह होता है जिसे दो लोग मिलकर सालों की एडजस्टमेंट, माफ़ी मांगने और कभी-कभी दांत भींचकर निबाहने से गढ़ते हैं.”

सोलमेट का जाल

कैरोल की दलील दशकों की रिसर्च पर आधारित है, जिसे उन्होंने अपनी रिपोर्ट ‘द सोलमैट ट्रैप’, में डाला है. यह रिसर्च दो तरह की सोचों में फर्क बताती है… पहला तो वह जिसे मनोवैज्ञानिक ‘किस्मत पर यक़ीन’ कहते हैं- यानी यह मान्यता कि सही रिश्ता बिना मेहनत के अपने आप चलता रहेगा और दूसरी है- ‘कोशिशों पर भरोसा’, जो इस पर ज़ोर देती है कि पार्टनर क्या कर सकते हैं ताकि रिश्ता बेहतर बने.

1990 के दशक के अंत और 2000 के शुरुआती सालों में यूनिवर्सिटी ऑफ ह्यूस्टन के प्रोफ़ेसर सी रेमंड नी के नेतृत्व में की गई और खूब उद्धृत की जाने वाली कई स्टडीज़ में पाया गया कि जो लोग मानते थे कि रिश्ते ‘बने बनाए’ होते हैं, वे विवाद के बाद अपने कमिटमेंट पर कहीं ज़्यादा शक करते थे. वहीं जिनका नज़रिया ज़्यादा ग्रोथ-माइंडेड या कोशिशों पर भरोसा वाला था, वे बहस होने वाले दिनों में भी रिश्ते में ज़्यादा टिके रहते थे.

रिसर्च बताती है कि रिश्तों के बारे में 'कोशिशों पर भरोसा' रखने वाले लोग भी कुछ खास चाहते हैं, लेकिन उन्हें रास्ते में आने वाली चुनौतियों की उम्मीद रहती है

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कैरोल कहते हैं कि कोशिशों पर भरोसा करने वाले लोग भी कुछ ख़ास चाहते हैं, लेकिन वे मुश्किल दौर की उम्मीद भी रखते हैं. “वे पूछते हैं… कि वे क्या कर सकते हैं जिससे उनका रिश्ता बेहतर हो, उसमें सुधार आए और उसमें विकास हो?”

उनके मुताबिक परेशानी सोलमेट में नहीं, बल्कि इस उम्मीद में है कि प्यार में कभी कठिनाई नहीं आनी चाहिए. वह कहते हैं कि एक लंबे रिश्ते का सबसे ‘सोलफुल’ हिस्सा कोई फ़िल्मी-सा पल नहीं होता, बल्कि एक-दूसरे की ताकतों के साथ साथ उनकी चुनौतियों और कमज़ोरियों को दिखाने वाली ‘फ्रंट-रो सीट्स’ होती हैं.

वह कहते हैं, “वह एक काफ़ी पवित्र सी जगह होती है. हम उन चीज़ों को सिर्फ़ इसलिए जानते हैं क्योंकि उन्होंने हमें वहां रहने दिया है.”

कैरोल के अनुसार, जब प्यार को किस्मत से मिला मान लिया जाता है, तो लोग वह साधारण-सा लेकिन ज़रूरी काम कम करने लगते हैं जो असल में रिश्ते को ज़िंदा रखता है. वह कहते हैं कि सोलमेट वाला जाल रिश्ते में पहली गंभीर कठिनाई आने पर चीज़ों को और मुश्किल बना देता है.

“पहली बार जब किसी दिक्कत का सामना करना पड़ता है, तो तुरंत ख़्याल आता है- ‘मुझे लगा था तुम मेरे सोलमेट हो. लेकिन शायद नहीं, क्योंकि सोलमेट्स को तो ऐसी चीज़ों को नहीं झेलना चाहिए’.”

वह कहते हैं, “लेकिन अगर कोई रिश्ता लंबा चलना है, तो वह कभी भी एक सीधी ढलान में उतरने की तरह आसान नहीं हो सकता.”

स्पार्क या ट्रॉमा?

विक्की पैविट लंदन में बसी लव कोच हैं. वह अक्सर उन लोगों की मदद करती हैं जिन्हें लगा था कि उन्हें उनका सोलमेट मिल गया है- लेकिन बाद में पता चला कि उस परी कथा के साथ भावनात्मक जोड़-तोड़, अस्थिरता और लगातार बेचैनी भी जुड़ी हुई थी.

वह कहती हैं, “जब बहुत ज़्यादा केमिस्ट्री और स्पार्क होता है, तो कई बार वह पुराने, तकलीफ़देह पैटर्न खुलने की वजह से भी हो सकता है… जैसे पुरानी चोटें.”

“कोई ऐसा इंसान जो लगातार बदलता रहे या कभी गर्म, कभी ठंडा व्यवहार करे… वह आपको ऐसा महसूस करा सकता है कि ‘मैं इनसे फिर से मिलने का इंतज़ार नहीं कर सकता.’ लेकिन असल में हो क्या रहा होता है- वह आपको इतनी चिंता दे रहे होते हैं कि वही बेचैनी आपको और ज़्यादा खींचती है.”

लव कोच विक्की पैविट अक्सर ऐसे लोगों के साथ काम करती हैं जिन्हें लगा था कि उन्हें उनका सोलमेट मिल गया है- लेकिन बाद में पता चला कि उस रिश्ते ने उन्हें चिंता ही दी

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पैविट कहती हैं कि जिसे हम किस्मत मान लेते हैं, वह असल में हमारे नर्वस सिस्टम का खिंचाव भी हो सकती है- जो किसी ऐसी चीज़ को पहचानता है जिसने हमें पहले चोट पहुंचाई थी और जिसे हम अब ठीक करना चाहते हैं. थेरेपिस्ट इसे ‘ट्रॉमा बॉन्ड’ कहते हैं.

वह कहती हैं कि यह बॉन्ड कई बार प्यार जैसा लगता है- और लोग अस्वस्थ रिश्तों की तरफ चुंबकीय रूप से खिंचते चले जाते हैं, इसलिए नहीं कि वे सही मेल हैं, बल्कि सिर्फ़ इसलिए कि वे रिश्ते परिचित लगते हैं.

कनाडाई मनोवैज्ञानिक डोनाल्ड डटन और सूज़न पेंटर की एक स्टडी का भी अक्सर ज़िक्र होता है. 1993 में ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय में रहते हुए उन्होंने 75 महिलाओं का अध्ययन किया, जिन्होंने उसी समय अपने हिंसक पार्टनरों को छोड़ा था.

टीम ने मापा कि तब भी वे महिलाएं अपने एक्स से कितना जुड़ाव महसूस करती थीं- और इसकी तुलना उनके रिश्तों की असलियत से की.

उन्होंने पाया कि सबसे मज़बूत जुड़ाव उन महिलाओं में नहीं था जिन्हें लगातार प्रताड़ित किया गया था, बल्कि उन महिलाओं में था जिनके पार्टनर कभी आकर्षक और कभी क्रूर होते थे.

डटन और पेंटर कहते हैं कि यह ट्रॉमा बॉन्ड समझाता है कि लोग उन रिश्तों की ओर क्यों फिर से खिंच जाते हैं जो उनके लिए साफ़ तौर पर बुरे हैं- क्योंकि ख़तरे और स्नेह का मिला जुला एहसास उनके लिए जाना पहचाना होता है, न कि इसलिए कि वह रिश्ता स्वस्थ है.

कोचिंग में पैविट इसी फ़र्क को सामने लाने की कोशिश करती हैं, “यह समझने की बात है कि जो केमिस्ट्री आप महसूस कर रहे हैं- क्या वह यह बता रही है कि यह इंसान मेरे लिए सही है, या यह वही परिचित बेचैनी है?”

वह कहती हैं, “अपनी भाषा में, मैं कभी सोलमेट्स की बात नहीं करती. मैं व्यक्तिगत तौर पर नहीं मानती कि हर किसी के लिए एक ही व्यक्ति बना है… लेकिन मैं मानती हूं कि हम किसी के लिए ‘द वन’ बन जाते हैं.”

असल केमिस्ट्री

अगर सोलमेट के अस्तित्व को नकारना आपको ग़ैर रोमांटिक लगे, तो आकर्षण की बायोलॉजी भी उसी दिशा की ओर इशारा करती है.

हार्मोनल गर्भनिरोधक यह सूक्ष्मता से बदल सकते हैं कि पार्टनर एक दूसरे के बारे में कैसा महसूस करते हैं. रिसर्च बताती है कि ऐसी गोलियां जो प्रजनन चक्र की प्राकृतिक लय को सपाट कर देती हैं, वे आकर्षण में आने वाले उन बदलावों को दबा सकती हैं जो आमतौर पर मासिक चक्र के दौरान आते हैं- और इससे साथी चुनने पर भी असर पड़ सकता है.

कुछ शोध बताते हैं कि हार्मोनल गर्भनिरोधक साथी के प्रति आकर्षण पर सूक्ष्म असर डाल सकते हैं

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365 हेट्रोसेक्सुअल कपल्स पर हुए एक बड़े अध्ययन से पता चला कि महिलाओं की यौन संतुष्टि तब ज़्यादा थी जब उनका मौजूदा गर्भनिरोधक स्तर वही था, जो तब था जब उन्होंने अपने पार्टनर को पहली बार चुना था. इससे यह संकेत मिलता है कि दवा के इस्तेमाल में बदलाव से साथी को महसूस करने का तरीका भी बदल सकता है. ये असर छोटे होते हैं, लेकिन समय के साथ कपल्स की ‘केमिस्ट्री’ में आने वाले हैरत अंगेज़ बदलावों को समझने में मदद कर सकते हैं.

अगर हार्मोन और गोलियां इस बात को प्रभावित कर सकती हैं कि कौन ‘द वन’ जैसा लगता है, तो यह मानना मुश्किल हो जाता है कि कोई एक पहले से तय मैच है – और यहीं पर गणितज्ञ तस्वीर में आते हैं.

द वन – लेकिन एकमात्र वही नहीं

साइकोलॉजी और बायोलॉजी ‘द वन’ को देखने का एक तरीका बताते हैं, लेकिन गणित एक अलग तस्वीर दिखाता है.

टेनेसी के नैशविल में वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री डॉक्टर ग्रेग लियो ने एक कम्पैटिबिलिटी एल्गोरिदम बनाया है. इससे पता चलता है कि आपके पास सिर्फ ‘एक’ नहीं, बल्कि ‘कई वन’ हो सकते हैं.

पब्लिक इकोनॉमिक थ्योरी जर्नल में प्रकाशित अपने ‘मैचिंग सोलमेट्स’ पेपर में, उन्होंने कंप्यूटर सिम्युलेटेड डेटिंग पूल बनाया, जिसमें हज़ारों डिजिटल डेटर्स एक दूसरे को रैंकिंग देते हैं. उनका एल्गोरिदम ‘फर्स्ट ऑर्डर सोलमेट्स’ चुनता है- ऐसे जोड़े जो एक दूसरे को स्टेबल मैचिंग में चुनते हैं. फिर उन्हें हटा कर वही प्रक्रिया बाकी बचे लोगों के साथ दोहराई जाती है- और आपको सेकंड ऑर्डर सोलमेट्स मिलते हैं, फिर थर्ड ऑर्डर, और इसी तरह अन्य.

उनके सिम्युलेशनों में, यह बहुत ही कम देखने को मिला कि किसी व्यक्ति को उसका म्यूचुअल फ़र्स्ट पिक मिले; लेकिन बहुत से लोगों के पास ऐसे साथी थे जो दूसरी या तीसरी बार में पसंद आते थे. इस मॉडल में कपल तब ‘खुश’ माने जाते हैं जब वे एक दूसरे की सूची में ऊपर हों- और न उन्हें और न ही सामने वाले को ऐसा कोई और व्यक्ति मिल सके जिसे दोनों ज़्यादा पसंद करें.

यह सब भले ही सिर्फ़ नंबरों का खेल लगे, लेकिन यह ‘लव एल्गोरिदम’ हमें बताता है कि हमारे लिए कई उपयुक्त साथी होते हैं- सिर्फ द वन ही नहीं.

छोटी-छोटी बातों का असर

पैविट कहती हैं कि जो चीज़ किस्मत जैसी महसूस होती है, वह कई बार ट्रॉमा बॉन्ड भी हो सकती है

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तो फिर एक कपल कैसे मिलकर एक-दूसरे के लिए ‘द वन’ बन सकते हैं?

द ओपन यूनिवर्सिटी में सोशियोलॉजी और इंटिमेसी की प्रोफ़ेसर जैकी गैब ने इसे अपनी एन्ड्यूरिंग लव परियोजना में परखा, जो 2015 में सोशियोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुई थी.

इस प्रोजेक्ट में लगभग 5,000 लोगों का सर्वे किया गया, और फिर 50 कपल्स को बेहद बारीकी से- कभी कभी थोड़ी दखलअंदाज़ी वाली डिटेल्स तक- फॉलो किया गया. आंकड़ों के साथ साथ इसमें डायरी, इंटरव्यू और घर के भीतर क्या हुआ इसके ‘इमोशन मैप्स’ भी शामिल थे.

जब उन्होंने लोगों से पूछा कि किन चीजों ने उन्हें सराहा हुआ महसूस करवाया, तो जवाब न तो सनसेट प्रपोज़ल थे और न ही पेरिस की सरप्राइज ट्रिप.

बल्कि थीं- “अचानक दिए गए तोहफ़े, सहृदयतापूर्ण व्यवहार और बिस्तर पर चाय लाकर देने जैसी चीज़ें.”

ठंडी सुबह में कार को पहले से गरम कर देना. रास्ते से जंगली फूल तोड़कर फूलदान में रखना. किसी पार्टी में आपको देखकर चुपचाप मुस्कुराना.

गैब के मुताबिक, ये ‘हर रोज़ की ध्यान देने वाली बातें’ बड़े रोमांटिक जेस्चर्स से कहीं ज़्यादा प्रभावशाली निकलीं.

उनके सर्वे में, 22% माताओं और 20% ऐसी महिलाओं, जिनके बच्चे नहीं थे, ने इन छोटे इशारों को उन दो शीर्ष चीज़ों में गिना जिनसे उन्हें खुद को ख़ास महसूस होता था- यह बड़ी पार्टियों या महंगे तोहफ़ों से ज़्यादा था.

'हर रोज़ की ध्यान देने वाली बातें' बड़े रोमांटिक जेस्चर्स से कहीं ज़्यादा प्रभावशाली होती हैं

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डेटा में रिश्ते की संतुष्टि का मुख्य कारण न पैसा था न रोमांस; बल्कि था ‘इंटिमेट कपल नॉलेज’- एक दूसरे को गहराई से जानना और इसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में व्यक्त करना.

इस प्रोजेक्ट के लिए लिखी गई एक युवा कपल की डायरी में, सुमैरा अपने पार्टनर के घर वापस आने का वर्णन करती है, उस खाने के बारे में बताती हैं जो उसने बनाया है, हॉलवे में एक आलिंगन और दोनों के मेज़ पर साथ खाने का ज़िक्र करती हैं.

वह अपनी शोध डायरी में लिखती है, “यह परफ़ेक्ट है. बस हम और खाना. मुझे और क्या चाहिए?”

फिर लिविंग रूम में अचानक किया गया एक डांस, घास में लंबी सैर जहां वह अंधेरे से डर जाती है, और एक फ़ोटो जिसे उनका पार्टनर इतना पसंद करता है कि उसे अपने फोन की बैकग्राउंड बना लेता है.

यह एक प्यारी, रोज़मर्रा की कहानी की तरह लगता है- कोई परी कथा नहीं: कांच की चप्पलें नहीं, बल्कि रबर की जूतियां.

गैब बताती हैं कि इस मिठास के साथ ही पैसे की चिंता, पारिवारिक ज़िम्मेदारियां और डिप्रेशन का इतिहास भी गुंथा हुआ है जिनसे यह कपल मिलकर निपटना सीख रहा है.

वह कहती हैं, “यहां सोलमेट जैसा एहसास ज़िंदगी से ऊपर तैरता नहीं है; यह ज़िंदगी से ही, धीरे धीरे, इंच दर इंच बनता है- इस बात में कि दोनों उन दबावों का सामना कैसे करते हैं.”

वैलेंटाइन का डिनर

कैरोल के मुताबिक, विज्ञान रोमांस को छीनता नहीं है- बल्कि अच्छे और बुरे दोनों समय में उसे खिलने में मदद करता है.

वह कहते हैं, “मैं इस ख्वाहिश से पूरी तरह सहज हूं कि कोई एक बेहद ख़ास रिश्ता हो- बस यह याद रहे कि उसे हमें ख़ुद बनाना पड़ता है.”

पैविट का मानना है कि “यह बिल्कुल ठीक है, बल्कि मददगार भी, कि आप यह मानें कि आपका ख़ास इंसान कहीं न कहीं है- बशर्ते आप यह भी जानते हों कि आप कई लोगों के साथ एक बेहतरीन जुड़ाव बना सकते हैं, और किसी से भी परफ़ेक्ट होने की उम्मीद करना छोड़ दें.”

जहां तक सोलमेट्स का सवाल है, विज्ञान एक विरोधाभास दिखाता है. जिन लोगों को आख़िर में ऐसा रिश्ता मिलता है जो अनोखे तरीके से ‘नियति द्वारा तय’लगता है- अक्सर वही लोग होते हैं जिन्होंने किस्मत का इंतज़ार करना छोड़ दिया, सामने वाले अपूर्ण इंसान की तरफ़ रुख किया और मानो कहा: क्यों न हम मिलकर कुछ बनाएं?

अतिरिक्त रिपोर्टिंग- फ़्लोरेंस फ़्रीमैन

सबसे ऊपर वाली तस्वीर का क्रेडिटः गेटी इमेजिस

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS