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क्या एक से ज़्यादा ब्रह्मांड हैं?

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Source :- BBC INDIA

एक आदमी की पीठ की ओर से ली गई या बनाई गई तस्वीर जिसमें  सामने कई रंग-बिरंगे, एक-दूसरे पर चढ़े हुए गोल घेरे हों, जिनमें सितारे और अन्य छोटे, चमकीले तत्व भरे हैं

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क्या आपने कभी यह कल्पना की है कि किसी और समानांतर ब्रह्मांड में आप कोई रॉकस्टार या अंतरिक्ष यात्री हों?

‘मल्टीवर्स’ यानी कई ब्रह्मांडों की कल्पना ने लोगों के दोपहरी के सपनों से लेकर साइंस‑फिक्शन की कहानियों तक में जगह बनाई है लेकिन कुछ वैज्ञानिक भी इसे गंभीरता से लेते हैं.

बस फ़र्क यह है कि यह मल्टीवर्स शायद वैसा नहीं है जैसा हॉलीवुड अक्सर दिखाता है. और असल में यह क्या या कैसा हो सकता है, इस पर किसी की राय एक जैसी नहीं है.

बारीकी से संतुलित ब्रह्मांड

जिस ब्रह्मांड में हम मौजूद हैं, निश्चित ही वह हमारे लिए एकदम ‘फाइन‑ट्यून्ड’ यानी बेहद बारीकी से संतुलित लगता है.

प्रोफ़ेसर पॉल हैल्पर्न अमेरिका के सेंट जोसेफ़ यूनिवर्सिटी के भौतिक विज्ञानी हैं और ‘द एल्योर ऑफ़ द मल्टीवर्स’ किताब के लेखक हैं.

वह कहते हैं कि उदाहरण के तौर पर, अगर गुरुत्वाकर्षण थोड़ा भी कम या कमज़ोर होता, तो हमारे तारे और ग्रह शायद बन ही नहीं पाते.

“दूसरी तरफ़, अगर गुरुत्वाकर्षण बहुत ज़्यादा मज़बूत होता, तो ब्रह्मांड शुरुआत में ही ढह जाता.”

असल में, प्रकृति में करीब दो दर्जन मूलभूत स्थिरांक हैं- उनके सटीक मूल्य (अंक) ही हमारे भौतिकी के नियमों को चलने देते हैं.

लेकिन ये आए कहाँ से?

जिस ब्रह्मांड में हम मौजूद हैं, वह हमारे लिए बेहद बारीकी से संतुलित लगता है

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कुछ लोग कहते हैं कि ये किसी दैवी रचनाकार- यानी ईश्वर- की देन हैं, जिसने हमारे ब्रह्मांड को बेहद सटीकता से तैयार किया.

लेकिन दूसरे इसे मल्टीवर्स के ज़रिए समझाते हैं. मान लें कि ब्रह्मांडों की संख्या अनंत हो, और हर ब्रह्मांड में ये स्थिरांक अलग‑अलग मूल्यों के साथ मौजूद हों, तो हम बस उस ब्रह्मांड में मौजूद हैं जहां परिस्थितियां बुद्धिपूर्ण जीवन के लिए बिल्कुल सही हैं.

इतने ‘खुशनसीब’ होने की संभावना क्या है? कुछ लोग कहेंगे- काफी ज़्यादा. क्योंकि जिन तमाम ‘निर्जीव’ ब्रह्मांडों में जीवन संभव नहीं होता, वहां हम मौजूद ही नहीं होते कि यह सवाल पूछ सकें. इसे ही एंथ्रोपिक प्रिंसिपल कहते हैं.

भौतिकशास्त्री ने यह समझाने के लिए कई तरह के काल्पनिक विचार सुझाए हैं कि ये ब्रह्मांड कैसे बनते होंगे- ज़्यादातर बेहद जटिल गणित के आधार पर. आइए, बस उनमें से दो को देखते हैं.

कई दुनिया का विचार

पहला विचार क्वांटम मैकेनिक्स से आता है- यानी इलेक्ट्रॉनों जैसे बेहद छोटे कणों की अजीब दुनिया से.

जब हम इस सूक्ष्म दुनिया में ज़ूम करते हैं, तो क्वांटम भौतिक विज्ञानी बताते हैं कि किसी कण के गुण पहले से तय नहीं होते. एक इलेक्ट्रॉन न यहां होता है और न वहाँ. इसके बजाय, उसके किसी भी जगह होने की कुछ संभावनाएं निश्चित होती हैं, यहाँ, वहाँ, या किसी और संभावित स्थान पर.

क्लासिकल थ्योरी कहती है कि जब कोई उस कण को देखने लगता है, तो ये सारी संभावनाएं सिमटकर एक वास्तविकता बन जाती हैं- और इलेक्ट्रॉन एक तय स्थिति अपना लेता है.

और यह सब उसी ब्रह्मांड में होता है जिसे हम जानते हैं.

यह समझना थोड़ा कठिन हो सकता है, लेकिन आज विज्ञान में क्वांटम मैकेनिक्स को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है.

ऑस्कर जीतने वाली एवरीथिंग एव्रीवेयर ऑल ऐट वन्स- कई मल्टीवर्स आधारित साइंस-फिक्शन फिल्मों में से एक है

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1957 में, ह्यू एवरिट III नाम के एक ग्रैजुएट छात्र ने एक अलग विचार पेश किया, जिसे बाद में ‘मैनी-वर्ल्ड्स इंटरप्रिटेशन’ कहा गया: इसके अनुसार एक क्वांटम कण एक तय वास्तविकता ही नहीं अपनाता. इसके बजाय, वह एक साथ सभी संभावित वास्तविकताओं में शाखाओं में बँट जाता है- और हर वास्तविकता अपने‑अपने अलग ब्रह्मांड में मौजूद होती है.

हैल्पर्न बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति इस क्वांटम कण को देखता है, उस व्यक्ति का चेतन अस्तित्व भी बंट जाता है: एक संस्करण एक वास्तविकता देखता है, और उसके बाकी संस्करण बाकी वास्तविकताएं देखते हैं. वह ज़ोर देते हैं कि वे समानांतर स्वरूप किसी फ़िल्म में दिखने वाली रोमांचक समानांतर ज़िंदगियों वाले नहीं होते.

हैल्पर्न कहते हैं, “कल्पना कीजिए कि आप एक फ़िल्म देखने जाते हैं और फ़िल्म किसी ऐसे व्यक्ति पर बनी है जो इलेक्ट्रॉन को ज़ीरो नैनोमीटर मार्क पर देखने के बजाय एक नैनोमीटर मार्क पर देखता है.”

ऐसे सूक्ष्म अंतर “हॉलीवुड जैसी कहानी के लिए नहीं होते हैं.”

इस मल्टीवर्स विचार के समर्थक भी हैं.

लेकिन कई इसे नापसंद करते हैं, जो कहते हैं कि इसे परखा ही नहीं जा सकता: हम खुद को किसी दूसरे ब्रह्मांड में टेलीपोर्ट करके जांच तो नहीं सकते, है न?

और दार्शनिक कार्ल पॉपर के मुताबिक, अगर किसी सिद्धांत को ग़लत साबित नहीं किया जा सकता, तो वह असली विज्ञान नहीं है.

अंग्रेज़ मध्ययुगीन फ्रांसिस्कन भिक्षु विलियम ऑफ़ ऑकहम को अक्सर 'ऑकहम का रेज़र' सिद्धांत का श्रेय दिया जाता है- यानी दो समान रूप से संभव व्याख्याओं में से सबसे सरल को चुनना और अनावश्यक मान्यताओं को 'हटा देना'

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यह तर्क ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिडनी में ऐस्ट्रोफिज़िसिस्ट प्रोफ़ेसर गरेंट लुईस को परेशान नहीं करता. वह कहते हैं, शायद किसी दिन हम सचमुच किसी और ब्रह्मांड तक पहुंच भी सकें.

लुईस दलील देते हैं, “किसी चीज़ को असंभव कहने का मतलब है कि आपके पास पूरी तस्वीर होनी चाहिए और हमारे पास अभी वह नहीं है.”

वह एक अलग तरह की आपत्ति का उल्लेख करते हैं, जिसे ऑकैम का रेज़र कहा जाता है.

वह कहते हैं, “आप चाहते हैं कि सबसे सरल समीकरण सबसे ज़्यादा चीज़ें समझा दें. अपनी समस्या हल करने के लिए अनंत ब्रह्मांडों को बुला लेना सुनने में ऐसा नहीं लगता कि आप समस्या को सरल बना रहे हैं.”

अनंत विस्तार सिद्धांत

एक और मल्टीवर्स का विचार हमारे ब्रह्मांड के शुरुआती पलों पर केंद्रित है.

मौजूदा प्रमुख सिद्धांतों के मुताबिक, ब्रह्मांड ने एक सेकंड के बेहद छोटे हिस्से में बेहद तेज़ी से विस्तार किया.

हैल्पर्न बताते हैं, “एक ख़ास तरह की ऊर्जा थी जिसने इस अति तीव्र विस्तार को जन्म दिया.”

जैसे ही यह रुका, वह ऊर्जा पदार्थ और प्रकाश में बदल गई- जिसे हम आमतौर पर बिग बैंग के रूप में जानते हैं- और इसी ने वह ब्रह्मांड बनाया जिसे हम आज हर तरफ देखते हैं.

मौजूदा प्रमुख सिद्धांतों के मुताबिक, ब्रह्मांड ने एक सेकंड के बेहद छोटे हिस्से में बेहद तेज़ी से विस्तार किया. जैसे ही यह रुका, वह ऊर्जा पदार्थ और प्रकाश में बदल गई.

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यह पूरी तरह साफ़ नहीं है कि हमारे इस हिस्से में यह कॉस्मिक इन्फ्लेशन शुरू क्यों हुआ और रुका क्यों. और 1980 के दशक में कुछ भौतिकविदों ने सुझाव दिया कि यह विस्तार हर जगह एक साथ ख़त्म नहीं हुआ था. शायद यह हमारे हिस्से से आगे अब भी जारी है.

इस ‘अनंत विस्तार सिद्धांत’ के एक संस्करण के अनुसार, जहां‑जहां यह विस्तार रुकता है, वहां का वह हिस्सा सिकुड़कर अपना अलग ब्रह्मांड बना लेता है. और हर ब्रह्मांड अलग होगा, किसी में गुरुत्वाकर्षण बेहद शक्तिशाली होगा, तो किसी में बहुत हल्का.

लुईस कहते हैं, “इनमें से ज़्यादातर ब्रह्मांड पूरी तरह बंजर और निर्जीव होंगे. लेकिन कभी‑कभी कुछ ब्रह्मांड रहने योग्य भी बन जाते हैं.”

लेकिन ठीक क्वांटम मल्टीवर्स की तरह, इन दूसरे ब्रह्मांडों से संपर्क करने की कोशिश बेहद मुश्किल लगती है, क्योंकि हमारे और उनके बीच की जगह लगातार फैलती ही जा रही है.

सुराग़ों की तलाश

फिर भी, मल्टीवर्स के समर्थक कहते हैं कि अगर दो ब्रह्मांड लगभग एक ही समय पर, एक‑दूसरे के काफी क़रीब बने हों, तो संभव है कि वे अलग होने से पहले थोड़ी देर के लिए टकरा गए हों.

ब्रह्मांड विज्ञानी (कॉस्मोलॉजिस्ट) ऐसे टकरावों के निशान कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड (सीएमबी) में ढूंढ रहे हैं- यह हमारे शुरुआती ब्रह्मांड की पहली रोशनी के अवशेष हैं. ये अब ठंडे होकर माइक्रोवेव विकिरण में बदल चुके हैं, और जिन्हें हम दूरबीनों की मदद से पूरे ब्रह्मांड में देख सकते हैं.

हैल्पर्न के मुताबिक़, ऐसे निशान ‘एक तरह के बुल्सआई या टार्गेट के आकार’ जैसे दिखेंगे.

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के प्लैंक टेलीस्कोप ने कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड (सीएमबी) का मानचित्र तैयार किया है, जहाँ तापमान में अत्यंत सूक्ष्म उतार‑चढ़ाव प्रारंभिक ब्रह्मांड में पदार्थ के अलग‑अलग घनत्वों को दर्शाते हैं

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कुछ कॉस्मोलॉजिस्ट ने सीएमबी में मौजूद अजीब‑सी विशेषताओं पर भी ध्यान दिया, जैसे कथित कोल्ड स्पॉट, जो अपने आसपास के मुकाबले असामान्य रूप से ठंडा दिखाई देता है. कुछ का तर्क है कि यह हमारे ब्रह्मांड पर किसी दूसरे ब्रह्मांड के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव की वजह से हो सकता है.

हैल्पर्न कहते हैं, “जहाँ तक मैं जानता हूं, जब भी किसी ने ऐसा दावा किया है, दूसरी टीमों ने सांख्यिकीय विश्लेषण करके कहा है: ‘नहीं, यह दावा टिकता नहीं है.'”

सिर्फ़ कुछ विचार

अगर हमें सीएमबी में ऐसे निश्चित निशान मिल भी जाएं, तो क्या वह दूसरे ब्रह्मांडों पर विश्वास करने के लिए काफ़ी होगा जबकि हमारा कभी सीधे उनसे सामना न हो पाए?

हैल्पर्न कहते हैं, “विज्ञान में कई ऐसी चीजें हैं जहां हम अप्रत्यक्ष सबूतों पर भरोसा करते हैं.”

उदाहरण के तौर पर, हम मानते हैं कि पृथ्वी का केंद्र लोहे और निकेल से बना है, जबकि हम कभी वहां तक गए नहीं है.

असल में, उन्हें दूसरे ब्रह्मांडों का विचार पसंद है.

वह कहते हैं, “मौजूदा समय में जब तक कोई और बेहतर मॉडल नहीं मिल जाता, मैं ख़ुद को अनंत विस्तार सिद्धांत का समर्थक मानूँगा.”

लुईस भी किसी न किसी रूप में मल्टीवर्स के अस्तित्व को मानने के लिए तैयार हैं. लेकिन वह कहते हैं कि इतने अलग‑अलग विचार मौजूद होने के बावजूद, हम अभी इसे सही मायनों में परिभाषित करने से बहुत दूर हैं.

2025 के एक पेपर में, वह लिखते हैं कि मल्टीवर्स फिलहाल “मुश्किल से एक परिकल्पना है- बस तरह‑तरह के विचारों और अटकलें.”

वह बीबीसी से कहते हैं, “अगर हमें किसी पब में बैठकर मल्टीवर्स पर बहस करनी है, तो पहला कदम होना चाहिए: पहले यह तय कर लें कि आखिर हम बहस किस चीज़ के बारे में कर रहे हैं.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS