Home विश्व समाचार कट्टर मुस्लिम हैं आयतुल्लाह अराफी, खामेनेई के बाद बन सकते हैं ईरान...

कट्टर मुस्लिम हैं आयतुल्लाह अराफी, खामेनेई के बाद बन सकते हैं ईरान के नए सुप्रीम लीडर

7
0

Source :- LIVE HINDUSTAN

आयतुल्लाह के बेटे होने के नाते अराफी ने मात्र 11 वर्ष की आयु में कौम जाकर इस्लामी धर्मशास्त्र की पढ़ाई शुरू कर दी थी। उन्होंने दर्शनशास्त्र और न्यायशास्त्र में महारत हासिल की और धीरे-धीरे ईरान के लिपिक में अपनी जगह बनाई।

28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका के हमलों में आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान नेतृत्व संकट से गुजर रहा है। इस कठिन समय में आयतुल्लाह अलीरेजा अराफी का नाम सबसे प्रमुखता से उभरा है। कट्टरपंथी विचारधारा के समर्थक अराफी अब राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और मुख्य न्यायाधीश गुलाम-हुसैन मोहसेनी-एजेई के साथ मिलकर उस परिषद का हिस्सा हैं, जिसे नए सर्वोच्च नेता के चयन और युद्ध की स्थिति से निपटने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

60 वर्षीय अराफी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भले ही उतने चर्चित न हों, लेकिन ईरान के भीतर उन्हें खामेनेई के सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों में गिना जाता है। 1959 में जन्मे अराफी की पूरी परवरिश और करियर खामेनेई की छत्रछाया में फला-फूला है। वे खामेनेई के उस दृष्टिकोण के प्रबल समर्थक हैं कि शासन पूरी तरह से शिया इस्लामी न्यायशास्त्र पर आधारित होना चाहिए। उनकी वफादारी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मात्र 33 वर्ष की आयु में खामेनेई ने उन्हें उनके गृहनगर मेयबोद का ‘जुमे का इमाम’ नियुक्त किया था।

अराफी की ताकत के तीन स्तंभ

अल-मुस्तफा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रमुख: इस संस्था के माध्यम से अराफी ने दुनिया के 50 से अधिक देशों में ईरान की धार्मिक विचारधारा का प्रसार किया। यह विश्वविद्यालय विदेशों में ईरान के ‘सॉफ्ट पावर’ का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है।

कौम (Qom) मदरसा नेटवर्क के प्रमुख: शिया धर्मशास्त्र के सबसे बड़े केंद्र ‘कौम’ के मदरसों का नेतृत्व करना उन्हें धार्मिक जगत में सर्वोच्च स्थान दिलाता है।

गार्जियन काउंसिल और असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के सदस्य: वे न केवल चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की पात्रता तय करते हैं, बल्कि उस परिषद के सदस्य भी हैं जिसे ईरान का अगला सुप्रीम लीडर चुनना है।

बचपन से ही धर्मशास्त्र में डूबा जीवन

आयतुल्लाह के बेटे होने के नाते अराफी ने मात्र 11 वर्ष की आयु में कौम जाकर इस्लामी धर्मशास्त्र की पढ़ाई शुरू कर दी थी। उन्होंने दर्शनशास्त्र और न्यायशास्त्र में महारत हासिल की और धीरे-धीरे ईरान के लिपिक में अपनी जगह बनाई।

अराफी के सामने वर्तमान में दो बड़ी चुनौतियां हैं। खामेनेई जैसे कद्दावर नेता की कमी को पूरा करना और देश के भीतर किसी भी विद्रोह या असंतोष को रोकना। चूंकि वे खुद ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ में हैं, इसलिए कयास लगाए जा रहे हैं कि वे खुद भी अगले ‘सर्वोच्च नेता’ की दौड़ में एक मजबूत दावेदार हो सकते हैं।

ईरान के विशेषज्ञों का मानना है कि अराफी का प्रमोशन मौजूदा व्यवस्था की निरंतरता का संकेत है। वे बदलाव के बजाय पुरानी कट्टरपंथी नीतियों को ही आगे बढ़ाने के पक्षधर दिखते हैं। ऐसे में उनके नेतृत्व में ईरान की विदेश नीति और परमाणु कार्यक्रम किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN