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ईरान युद्ध ने बता दिया कि दुनिया खाड़ी के तेल और गैस पर किस हद तक निर्भर है

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Source :- BBC INDIA

मध्य पूर्व में छिड़े संघर्ष के कारण दुनिया के कई देशों में पेट्रोल-डीज़ल और गैस की सप्लाई बाधित हो रही है.

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ईरान के साथ अमेरिका और इसराइल के युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया खाड़ी क्षेत्र से मिलने वाले तेल और गैस पर कितनी निर्भर है.

जब से यह लड़ाई शुरू हुई है, तेल की कीमत आसमान छू गई है और अभी यह 100 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई है. शिपिंग और ऊर्जा के बुनियादी ढांचे पर हवाई हमलों और होर्मुज स्ट्रेट के पूरी तरह बंद होने से यह और बढ़ गया है.

यह जलमार्ग एनर्जी शिपमेंट के लिए एक ज़रूरी रास्ता है, जहां से दुनिया भर में तेल सप्लाई का क़रीब 20% गुज़रता है.

तेल और गैस का यह संकट जिस तरह से एशियाई देशों में महसूस हो रहा है, वैसा कहीं और नहीं है. पिछले साल, होर्मुज स्ट्रेट से गुज़रने वाले कुल तेल और गैस का लगभग 90% इसी इलाक़े में भेजा गया था.

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आम लोग अपने घरों को गर्म करने, अपनी गाड़ियों में ईंधन भरने और बिजली उत्पादन के लिए इस पर निर्भर हैं. इस इलाके के बड़े मैन्युफैक्चरिंग उद्योग को चलाने के लिए कारोबार जगत को भी तेल और गैस की ज़रूरत होती है.

फ़ारस की खाड़ी में रुकावट के कारण ख़ासकर साउथ-ईस्ट एशिया इसकी वजह से बहुत ज़्यादा असुरक्षित है.

यहां तक ​​कि मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देश जो ख़ुद तेल बनाते हैं, उन्होंने भी पिछले दस सालों में धीरे-धीरे तेल के उत्पादन को कम कर दिया है और इसका ज़्यादा आयात करना शुरू कर दिया.

एशियाई देशों का संकट

फिलीपींस की रिफ़ाइनरी की फ़ाइल फ़ोटो

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यह परेशानी कुछ हद तक मध्य पूर्व में मिलने वाले तेल की गुणवत्ता और इस इलाक़े के देशों में इसे रिफाइन करने के तरीके से भी जुड़ी है.

सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ में एनर्जी सिक्योरिटी एंड क्लाइमेट चेंज प्रोग्राम से जुड़ी जेन नाकानो कहती हैं, “मिडिल ईस्टर्न क्रूड आम तौर पर ‘हैवी सॉर’ या ‘मीडियम सॉर’ होता है.”

नाकानो बताती हैं कि साउथ ईस्ट एशिया में रिफाइनरियां इस तरह के कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए बनाई गई हैं और अमेरिका जैसे किसी दूसरे तेल उत्पादकों के पास इनका जाना आसान नहीं है.

वह कहती हैं, “रिफाइनरी को इसके लिहाज से तैयार करने और पुराने ढांचे को बदलने के लिए काफ़ी निवेश करना होगा.”

इसने कई देशों को मुश्किल में डाल दिया है. उदाहरण के लिए, फिलीपींस को अपना लगभग 95% कच्चा तेल मध्य पूर्व से मिलता है. देश के राष्ट्रपति ने पहले ही सरकारी कर्मचारियों से कहा है कि वे ईंधन बचाने के लिए हफ़्ते में चार दिन काम करें.

इस इलाक़े की कई सरकारें घर से काम करने को बहुत बढ़ावा दे रही हैं. थाईलैंड के ऊर्जा मंत्री ने मंगलवार को बताया कि फ्यूल बचाने के दूसरे तरीके भी अपनाए जा रहे हैं, जैसे सरकारी दफ़्तरों में एयर कंडीशनर का तापमान 26°C पर सेट करना, यानी सामान्य से ज़्यादा रखना.

साउथ ईस्ट एशिया खाने के आयात पर भी बहुत ज़्यादा निर्भर है. उदाहरण के लिए सिंगापुर अपना 90% खाना आयात करता है और इंडोनेशिया का सारा गेहूं देश के बाहर से आता है.

इससे खाने की चीज़ों की कीमतें ढुलाई की लागत बढ़ने की वजह से ख़ास तौर पर नाज़ुक हालात में हैं. पिछले हफ़्ते, विमानों में इस्तेमाल होने वाले फ्यूल की कीमत लगभग 60% बढ़ गई थी.

कीमतों की बढ़ोतरी पर लगाम

सियोल के एक पेट्रोल स्टेशन पर लोग अपनी कारों में पेट्रोल भरवाते हुए

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इस स्थिति का दबाव वियतनाम भी महसूस कर रहा है. पिछले महीने से वहां डीज़ल की कीमत लगभग 60% बढ़ गई है. इस हफ़्ते कुछ शहरों में पेट्रोल पंपों पर मोपेड चलाने वालों की लंबी लाइनें लगीं, जो घबराहट में तेल ख़रीद रहे थे. बांग्लादेश में भी ऐसे ही नज़ारे देखने को मिले.

पेट्रोल पंपों पर तेल की कीमतें दुनिया भर में बढ़ रही हैं, हालांकि एशियाई देशों की तुलना में वहां कीमतें कम बढ़ रही हैं.

अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमतें एक महीने पहले की तुलना में 23% ज़्यादा हैं, जबकि डीज़ल की कीमतें एक तिहाई बढ़ गई हैं. वहीं ब्रिटेन में डीज़ल की कीमत 9% बढ़ी है.

यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर सभी देशों की सरकारों का बहुत ज़्यादा ध्यान है.

साउथ कोरिया ने तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंता कम करने के लिए ईंधन की कीमत पर अस्थायी सीमा निर्धारित करने का आदेश दिया है.

जापान ने कहा है कि वह खुदरा पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए तेल के थोक विक्रेताओं को सब्सिडी देगा.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, फ्रांस में ऊर्जा कंपनी ‘टोटल एनर्जीज़’ ने कहा है कि वह शुक्रवार से महीने के अंत तक अपने सर्विस स्टेशनों पर पेट्रोल और डीज़ल की कीमत की सीमा तय करेगा.

वहीं ब्रिटेन में सितंबर में फ्यूल ड्यूटी में बढ़ोतरी की योजना पर फिर से विचार किया जा रहा है.

गैस से दुनिया को लगा झटका

चीन में बिकने वाली नई कारों में एक-तिहाई इलेक्ट्रिक कार हैं, जो उसे मौजूदा संकट में सुरक्षा देती हैं

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एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन, इस तूफ़ान का सामना करने के लिए निश्चित तौर पर सबसे अच्छी स्थिति में है. इसने दुनिया के सबसे बड़े तेल रिज़र्व में से एक बनाया हुआ है, जो कुछ महीनों तक चल सकता है.

चीन ईरान से लाखों बैरल तेल ख़रीदता है, जिस पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखे हैं, हालाँकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है.

पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी का चीन में उतना असर नहीं होगा, क्योंकि वहां बिकने वाली सभी नई कारों में से एक तिहाई इलेक्ट्रिक कार हैं.

दूसरे एशियाई देशों की तुलना में, बिजली उत्पादन के मामले में भी चीन तेल पर बहुत कम निर्भर है. चीन का ज़्यादातर बिजली उत्पादन कोयले से होता है.

बुधवार को घोषित हुए इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के समझौतों के मुताबिक़, एशिया की अन्य बड़ी अर्थव्यवस्था जापान और साउथ कोरिया नेशनल स्टॉक से लाखों बैरल तेल छोड़ने पर सहमत हो गए हैं.

फिर भी साल 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद रूस से कम तेल और गैस खरीदने का फैसला करने के बाद से दोनों देशों की मिडिल ईस्ट एनर्जी पर निर्भरता बढ़ गई है.

ब्रिटेन का एक पेट्रोल स्टेशन

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जब गैस की बात आती है, तो यूक्रेन युद्ध का इस बात पर भी बड़ा असर पड़ा कि यूरोप को अपनी सप्लाई कहाँ से मिलती है. क्योंकि यूरोप इस मामले में रूस पर अपनी निर्भरता ख़त्म करना चाहता था.

ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन अब अपनी ज़्यादातर लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएजी) नॉर्वे और अमेरिका से लेते हैं.

कैपिटल मैनेजमेंट कंपनी, ‘कैपिटल इकोनॉमिक्स’ के अनुसार यूरोपियन यूनियन को अपनी गैस का महज़ लगभग 10% सीधे क़तर से मिलता है, जबकि ब्रिटेन को क़रीब 2% मिलता है.

लेकिन यूरोप के देशों पर खाड़ी से गैस सप्लाई में कमी का असर कम पड़ सकता है – दुनिया के सबसे बड़े निर्यातकों में से एक ‘क़तर एनर्जी’ ने पिछले हफ़्ते अपने ठिकानों पर “मिलिट्री हमलों” के बाद उत्पादन रोक दिया.

कैपिटल के चीफ़ क्लाइमेट और कमोडिटीज़ इकोनॉमिस्ट डेविड ऑक्सले कहते हैं, “इसका मतलब यह नहीं है कि वे इससे बचे हुए हैं. एशियाई ग्राहक जिन्हें अब वह गैस नहीं मिल रही है, तो वे कहीं और जा रहे हैं और गैस की वैश्विक कीमतें बढ़ा रहे हैं.”

क़तर की एलएनजी लाइन

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लेकिन अमेरिका इसका अपवाद साबित हो रहा है.

ऑक्सले कहते हैं कि हाल के सालों में उसने अपनी फ्रैकिंग (चट्टानों के बीच काफ़ी गहराई से तेल और गैस निकालना) बढ़ा दी है और अपना गैस प्रोडक्शन बढ़ाया है, जिससे वह “इस झटके से सबसे ज़्यादा सुरक्षित” है.

लेकिन गैस निर्यात करने की उसकी क्षमता में कुछ रुकावटें हैं, इसके लिए अपना बुनियादी ढांचा तैयार करना एक महंगी और समय लेने वाली प्रक्रिया है.

इसलिए, भले ही अब ज़्यादा गैस ऑनलाइन (पाइप के ज़रिए लगातार) आ रही हो, जिसकी वजह से गैस की कीमतों में साल 2002 जैसी बढ़ोतरी नहीं हुई है, लेकिन ऑक्सले का कहना है कि फिलहाल यह खाड़ी क्षेत्र से आने वाली आपूर्ति में कमी की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS