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सन 1977 में नए साल की पूर्व-संध्या पर तेहरान में एक सरकारी भोज के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने ईरान के शाह को क्षेत्र में ‘आइलैंड ऑफ़ स्टेबिलिटी’ यानी ‘स्थायित्व के द्वीप’ की संज्ञा दी थी.
यही नहीं, कार्टर ने शाह की बुद्धिमत्ता, विवेक, संवेदनशीलता और बारीक़ नज़र के क़सीदे भी पढ़े थे.
उस समय ईरान पर नज़र रखने वाले जानकारों को शाह की ये तारीफ़ न सिर्फ़ ग़ैर-ज़रूरी लगी थी बल्कि नागवार भी गुज़री थी.
इसकी वजह ये थी कि उनकी नज़र में शाह एक बड़े तानाशाह थे जिन्हें अपने राजनीतिक विरोधियों को कुचलने में अमानवीय हथकंडे अपनाने में कोई हिचक नहीं थी.
इरवांद अब्राहामियन ने अपनी किताब ‘बिटवीन टू रिवोल्यूशंस’ में लिखा है, “ईरान के रज़ा शाह पहलवी तेहरान में सीआईए के एजेंट कर्मिट रूज़वेल्ट की मेहरबानी से ईरान की गद्दी पर बैठे थे. पहलवी के पिता ने सन 1925 में एक विद्रोह के बाद सत्ता हथियाई थी लेकिन जब वह दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी जर्मनी की तरफ़ खुल्लम-खुल्ला झुकने लगे तो ब्रिटेन और सोवियत संघ ने उन्हें सत्ता से बेदख़ल कर दिया था.”
“दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र देशों का ईरान पर नियंत्रण था. उन्होंने ईरान की तेल संपदा का इस्तेमाल हिटलर के ख़िलाफ़ लड़ाई में किया था.”
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रज़ा पहलवी को पिता की गद्दी दी गई
युवा पहलवी को उनके पिता की गद्दी दे दी गई क्योंकि दुनिया को ये दिखाना ज़रूरी था कि ईरान एक आज़ाद देश है.
स्विट्ज़रलैंड में पढ़े रज़ा शाह पहलवी अपना समय एक अमीर प्ले-ब्वॉय की तरह बिताते थे.
उनको सत्ता देने का एक मुख्य कारण था पश्चिमी देशों की ईरानी तेल पाने की ललक.
नाममात्र के शासनाध्यक्ष होते हुए भी शाह ने प्रस्ताव दिया कि उनका देश तेल से होने वाली आमदनी का आधा मुनाफ़ा अपने पास रखे जिससे देश की समृद्धि हो सके और संभावित राजनीतिक आंदोलनों की ज़मीन तैयार न हो सके.
लेकिन शक्तिशाली एंग्लो-ईरानी तेल कंपनी ने वह प्रस्ताव सिरे से ख़ारिज कर दिया था.
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मोसद्देक बने ईरान के प्रधानमंत्री
इसके बाद नाराज़ ईरानवासी एक करिश्माई ईरानी मोहम्मद मोसद्देक के पीछे लामबंद हो गए. मोसद्देक उस परिवार से आते थे जिसने पहलवी परिवार के सत्ता में आने से क़रीब दो सौ साल पहले से ईरान पर राज किया था.
मार्क बाउडेन अपनी किताब ‘गेस्ट ऑफ़ द आयतुल्लाह’ में लिखते हैं, “मोसद्देक ने सत्ता में आते ही वह किया जिसे करने की शाह कभी हिम्मत नहीं कर सकते थे. उन्होंने पूरे तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया. इस क़दम की उनके देश में बहुत सराहना हुई.”
टाइम पत्रिका ने मोसद्देक को ‘मैन ऑफ़ द ईयर’ घोषित किया.
संयुक्त राष्ट्र में दिए भाषण में मोसद्देक ने कहा कि ‘ईरान के तेल संसाधन, उसकी मिट्टी, उसकी नदियों और उसके पहाड़ों की तरह ईरान के लोगों की संपत्ति हैं.’
मार्क बाउडेन ने लिखा, “एंग्लो-ईरानी तेल कंपनी के वित्तीय हितों को नुक़सान तो हो रहा था, इसके अलावा अमेरिका को डर था कि मोसद्देक समाजवादी झुकाव की वजह से सोवियत प्रभाव में चले जाएंगे, उनके ख़िलाफ़ विद्रोह को बढ़ावा दिया जिसके पीछे अमेरिका के राष्ट्रपति आइज़नहावर और ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल थे.”
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शाह की तेहरान वापसी
सीआईए के एजेंट रूज़वेल्ट ने मोसद्देक के ख़िलाफ़ ईरान की प्रेस में ग़लत ख़बरें छपवाईं और सड़कों पर प्रदर्शन आयोजित किए.
उसकी शह पर सैन्य अधिकारियों ने देशद्रोह के झूठे आरोपों पर मोसद्देक को गिरफ़्तार कर लिया.
तीन साल जेल में रखने के बाद उन्हें उनके घर में नज़रबंद कर दिया गया जहाँ 1967 में उनकी मृत्यु हो गई.
सेना के विद्रोह के दौरान शाह अपनी पत्नी के साथ भागकर रोम चले गए. जब सब कुछ सामान्य हो गया तो शाह ने वापस आकर दोबारा राजगद्दी संभाल ली.
अमेरिका ने शाह का पूरा साथ दिया. उसका तर्क था कि कम्युनिस्टों को रोकने और तेल की निरंतर आपूर्ति के लिए उसका ऐसा करना ज़रूरी था.
शाह ने अपने देशवासियों से वादा किया कि वह अपने जीवनकाल में ईरान को वित्तीय और सांस्कृतिक रूप से पश्चिमी देशों के समकक्ष बना देंगे.
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‘अमेरिका की कठपुतली’
शाह ने बहुत हद तक अपना यह वादा पूरा भी किया.
स्टीफ़न किनज़र ने अपनी किताब ‘आल द शाह्ज़ मेन’ में लिखा, “शाह के राज में ईरान में समृद्धि आई, महिलाओं का सशक्तीकरण हुआ और वह अपने देश को क़ुरान की शिक्षा से दूर ले गए. अमेरिकी मदद से वह खुले तौर पर एक अहंकारी सम्राट बन गए. उनको अपने विरोधियों को कुचलने पर गर्व होने लगा. उन्होंने उस सेना का नेतृत्व किया जो संख्या और आधुनिकता में इसराइल से टक्कर ले सकती थी.”
किनज़र लिखते हैं, “मगर दूसरी तरफ़, शाह ने खरबों डॉलर उन आर्थिक योजनाओं में बर्बाद किए जिनका कोई औचित्य नहीं था. नतीजा ये रहा कि ईरान की अधिकतर जनता ग़रीब ही रही. 1970 का दशक आते-आते ईरान के 40 फ़ीसदी लोग कुपोषण के शिकार हो गए.”
तेल से मिला धन शहरों में रहने वाले शिक्षित, पश्चिमी देशों के रंग में रंगे लोगों को पसंद आया लेकिन अमीर वर्ग और ग़रीब ईरानियों के बीच आर्थिक दूरी बढ़ती चली गई.
अपने शासन का 20वाँ वर्ष आते-आते अपने लोगों के बीच शाह की लोकप्रियता घटने लगी और उन्हें ‘अमेरिका की कठपुतली’ कहा जाने लगा.
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ईरानी लोग हुए शाह के ख़िलाफ़
1970 के दशक के मध्य में शाह के ख़िलाफ़ सड़क पर प्रदर्शनों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो वह रुका ही नहीं.
1978 आते-आते शाह की गद्दी चरमराने लगी थी. फिर भी बाहरी दुनिया को आभास था कि शाह इस संकट को झेल जाएंगे लेकिन 1979 की इस्लामी क्रांति ने धार्मिक तौर पर संगठित शक्तियों को सत्ता में पहुँचा दिया.
मार्क बाउडेन लिखते हैं, “बाहरी दुनिया को यह एहसास नहीं हुआ कि ईरान में परंपरागत इस्लाम फिर से सिर उठा रहा है और वह आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के ख़िलाफ़ बग़ावत करने के लिए तैयार हो रहा है. कॉलेज परिसरों और यहाँ तक कि शाह की सैनिक नौकरशाही में भी बदलाव के लिए समर्थन बढ़ने लगा था, लेकिन मौलवियों और समाज के दूसरे वर्गों में इस बात पर सहमति नहीं बन पा रही थी कि आगे क्या किया जाए.”
जब 16 जनवरी को शाह ने मिस्र जाने का फ़ैसला किया तो किसी ने भी उनके लिए आँसू नहीं बहाए.
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आयतुल्लाह ख़ुमैनी पेरिस से तेहरान पहुंचे
शाह के ईरान छोड़ते ही फ़्रांस में निर्वासित जीवन जी रहे धार्मिक नेता आयतुल्लाह ख़ुमैनी ने वापस अपने देश लौटने का फ़ैसला किया.
एक फ़रवरी, 1979 को रात एक बजे ख़ासतौर से चार्टर किए गए एक बोइंग 747 विमान ने तेहरान के लिए टेकऑफ़ किया. उसमें सवार थे शाह के धुर विरोधी और 16 साल से निर्वासन में रह रहे आयतुल्लाह रोहिल्ला ख़ुमैनी.
विमान पर सवार 168 यात्रियों में से एक थे बीबीसी संवाददाता जॉन सिंपसन. उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘न्यूज़ फ़्रॉम नो मैंस लैंड’ में लिखा, “ख़ुमैनी के साथ तेहरान जाना एक डरावना अनुभव था. हमारे साथ चल रहे यात्रियों को पूरा यक़ीन था कि ईरान की वायु सेना हमारे विमान को गिरा देगी. फ़्लाइट के दौरान हमने कुछ मिनटों के लिए ख़ुमैनी से बात की थी. वह बहुत बोलने वाले शख़्स नहीं थे. जब मैं उनसे कोई सवाल करता तो वह विमान की खिड़की के बाहर देखने लगते.”
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अमेरिका और इसराइल से दुश्मनी
जब ख़ुमैनी तेहरान पहुंचे तो लाखों लोग उनका स्वागत करने के लिए हवाई अड्डे पर मौजूद थे. ईरान राजशाही की जगह अब इस्लामी गणराज्य बन चुका था.
ख़ुमैनी को सुप्रीम लीडर का पद दिया गया और उन्होंने इस्लामी नियमों के अनुसार ईरान पर शासन करना शुरू कर दिया.
ख़ुमैनी ने अमेरिका की ‘बड़ा शैतान’ कहकर निंदा की और इसराइल को उन्होंने फ़लस्तीनी भूमि पर ग़ैर क़ानूनी कब्ज़ा करने वाला कहकर संबोधित किया.
ख़ुमैनी के सुप्रीम नेता के रूप में कार्यभार संभालने के कुछ दिनों के अंदर ही उनके छात्र समर्थकों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर क़ब्ज़ा कर 66 अमेरिकियों को बंधक बना लिया.
उनकी माँग थी कि अमेरिका में कैंसर का इलाज करा रहे शाह को अमेरिका वापस ईरान भेजे ताकि उन्हें उनके ‘गुनाहों की सज़ा’ मिले.
अमेरिका और इसराइल से दुश्मनी ईरानी विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया.
1979 की इस्लामी क्रांति को अभी बहुत समय गुज़रा नहीं था कि सद्दाम हुसैन के नेतृत्व वाले इराक़ ने ईरान पर हमला कर दिया.
ये युद्ध क़रीब नौ सालों तक चला. कुछ ही समय में लोगों का ख़ुमैनी से मोहभंग होने लगा.
कॉन कफ़लिन ने अपनी किताब ‘ख़ुमैनीज़ गोस्ट’ में एक प्रजातंत्र समर्थक कार्यकर्ता को कहते बताया, “मैंने समझा था कि ख़ुमैनी ईरान में लोकतंत्र लाने वाले हैं. लेकिन अब हमें अहसास हुआ है कि हमने एक तानाशाह को बदल कर दूसरा तानाशाह ला खड़ा किया है.”
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सलमान रुश्दी के ख़िलाफ़ फ़तवा
जब 1989 में भारतीय मूल के लेखक सलमान रुश्दी ने ‘सेटेनिक वर्सेस’ किताब लिखी तो दुनिया भर के मुसलमानों ने उसका घोर विरोध किया.
14 फ़रवरी, 1989 को आयतुल्लाह ख़ुमैनी ने फ़तवा जारी किया कि ‘ये पुस्तक इस्लाम, पैग़ंबर मोहम्मद और क़ुरान के ख़िलाफ़ है. इस पुस्तक से जुड़े हर व्यक्ति को मैं मौत की सज़ा सुनाता हूँ. मैं दुनिया भर के मुसलमानों से अपील करता हूँ कि वे जहाँ कहीं भी इन लोगों को पाएं इन्हें मौत के घाट उतार दें.’
ईरान की एक संस्था ने सलमान रुश्दी के सिर पर 2 करोड़ 60 लाख डॉलर के इनाम का ऐलान किया. उग्र भीड़ ने ब्रिटेन, इटली और अमेरिका में उन सभी किताबों की दुकानों को अपना निशाना बनाया जो ‘सैटेनिक वर्सेस’ बेच रही थीं. इसके बाद कई यूरोपीय देशों ने तेहरान से अपने राजदूत वापस बुला लिए.
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ख़ामेनेई बने ख़ुमैनी के उत्तराधिकारी
जैसे-जैसे ख़ुमैनी की उम्र बढ़ी उनके उत्तराधिकारी के नाम पर विचार होने लगा. ख़ुमैनी ने इसके लिए इस्लामी क्रांति के एक बड़े समर्थक और अपने अनुयायी आयतुल्लाह मोहम्मद मोंतज़री को चुना.
हालांकि ख़ुमैनी उनके धार्मिक ज्ञान के बारे में ऊँची राय रखते थे लेकिन उन्हें देश के संरक्षक के रूप में उनकी योग्यता पर संदेह होने लगा.
कॉन कफ़लिन लिखते हैं, “मार्च, 1989 में ख़ुमैनी ने मोंतज़री को कई पृष्ठों का पत्र लिखा जिसमें उन्होंने उन पर आरोप लगाया कि वह ईरान के लोगों को उदारवादियों के हाथ में सौंप रहे हैं. मोंतज़री ने इस लंबे पत्र का जवाब पाँच पंक्तियों में देते हुए ऐलान किया कि वह ख़ुमैनी के उत्तराधिकारी की दौड़ से बाहर हो रहे हैं. वह पहले भी ये पद पाने के इच्छुक नहीं थे. इसके बाद ख़ुमैनी ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में तत्कालीन राष्ट्रपति अली ख़ामेनेई को चुना.”
ईरान की धार्मिक सत्ता के मामले में ख़ामेनेई ओहदे में बहुत जूनियर थे और उनका अनुभव इतना नहीं था कि उन्हें शीर्ष धार्मिक पद के लायक समझा जाए.
अपने ख़राब स्वास्थ्य को देखते हुए ख़ुमैनी ने संसद की विशेष बैठक बुलाई जिसमें संविधान संशोधन कर ख़ामेनेई को ख़ुमैनी का उत्तराधिकारी बनाने का रास्ता साफ़ हुआ लेकिन इससे पहले ख़ुमैनी ने सुनिश्चित कर दिया कि उनकी मौत के बाद भी ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखेगा और पश्चिम के प्रति उसकी टकराव की नीति भी जारी रहेगी.
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9/11 के बाद अमेरिका से सहानुभूति
ख़ुमैनी की मृत्यु के बाद ख़ामेनेई ने उनकी जगह ली और रफ़सनजानी ईरान के नए राष्ट्रपति बने. ख़ामेनेई वैसे तो अमेरिका विरोधी नीति पर ही चले लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने अमेरिका का समर्थन भी किया.
जब 11 सितंबर, 2001 को अल क़ायदा ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला किया तो ईरान ने राष्ट्रपति बुश और अमेरिकी लोगों को संवेदना का संदेश भेजा.
केनेथ पोलक ने अपनी किताब ‘द पर्शियन पज़ल: द कनफ्लिक्ट बिटवीन अमेरिका एंड ईरान’ में लिखा है, “एक ऐसा देश जिसे 90 के दशक में पूरी दुनिया से अलग-थलग कर दिया गया था, अपने सबसे बड़े दुश्मन को जिसे वह हमेशा एक ‘शैतान’ का दर्जा देता आया था वह अपनी संवेदना देता दिखाई दिया था. तेहरान में हज़ारों लोगों ने मारे गए लोगों के लिए मोमबत्ती जलाकर जुलूस निकाला था. ऐसा करने वाला ईरान मध्य पूर्व में अकेला देश था.”
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ख़ातमी बने बदलाव के प्रतीक
विश्लेषकों का मानना है कि ऐसा मोहम्मद ख़ातमी के ईरान के पाँचवें राष्ट्रपति चुने जाने की वजह से संभव हो पाया था.
इस चुनाव में ख़ामेनेई ने कट्टरपंथी नेता अली अकबर नूरी का समर्थन किया था लेकिन इसके बावजूद ख़ातमी की जीत हुई थी.
कॉन कफ़लिन लिखते हैं, “इसकी वजह ये थी कि सन 1997 तक ईरानी लोगों का इस्लामी सरकार से मोहभंग हो चुका था. ईरान की ख़राब होती अर्थव्यवस्था और बाहरी दुनिया से उसके अलग-थलग होने के लिए वह उसे ज़िम्मेदार मानने लगे थे. मुद्रास्फीति 40 फ़ीसदी तक बढ़ गई थी.”
“ईरानी मुद्रा रियाल की क़ीमत आधी रह गई थी और बेरोज़गारी की दर 30 फ़ीसदी हो गई थी. हालांकि तब तक ख़ातमी ईरान की राजनीति में कोई बड़ा नाम नहीं था लेकिन जैसे जैसे चुनाव प्रचार ने ज़ोर पकड़ा उनका नाम बदलाव का प्रतीक बन गया.”
ख़ातमी ने चुनाव जीतते ही सबसे बड़ी पहल की सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देशों से अपने संबंध सुधारने की.
यही नहीं, उन्होंने सितंबर, 1998 में सलमान रुश्दी के ख़िलाफ़ जारी फ़तवे को भी वापस ले लिया.
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ख़ामेनेई के ख़िलाफ़ विपक्ष एकजुट नहीं
लेकिन सन 2005 में मोहम्मद अहमदीनेज़ाद के सत्ता में आने के बाद ईरान अपनी पुरानी नीतियों पर वापस चला गया. ख़ामेनेई ने आत्मनिर्भरता, मज़बूत रक्षा क्षमता और चीन-रूस की तरफ़ झुकाव को अपनी मुख्य नीति बनाया.
अमेरिका और इसराइल विरोध उनकी विदेश नीति का हिस्सा बना रहा लेकिन ईरान पर जब भी कोई गंभीर ख़तरा आया उन्होंने लचीलापन दिखाने से परहेज़ नहीं किया.
अमीन सैकाल अपनी किताब ‘ईरान राइज़िंग: द सर्वाइवल एंड फ़्यूचर ऑफ़ इस्लामिक रिपब्लिक’ में लिखते हैं, “ख़ामेनेई के पास बेइंतहा संवैधानिक और धार्मिक सत्ता है. उन्होंने ईरान में राज्य की शक्ति को बढ़ाने वाले कई साधनों जैसे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर और इसकी पैरा अर्धसैनिक शाखा ‘बसीज’ के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. अब भी कई ईरानी लोग सरकार से असंतुष्ट हैं लेकिन उसके ख़िलाफ़ राष्ट्र को जोड़ने वाला संगठित विपक्ष का नेता उभर कर सामने नहीं आया है.”
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शाह के बेटे की चुनौती पर सवाल
ईरान के पूर्व शाह के बेटे रज़ा पहलवी हाल के दिनों में कुछ लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं.
पिछले दिनों एक्स पर दिए बयानों में उन्होंने अपने देशवासियों से अपील की है कि “वे 46 साल से चले आ रहे युद्ध का अंत करें. ईरान के शासकों का अपने ही लोगों को कुचलने का कुचक्र धराशायी हो रहा है. इस दु:स्वप्न को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए एक देशव्यापी आंदोलन की ज़रूरत है.”
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अपने पिता के पद से हटाए जाने के बाद उन्होंने अमेरिका में निर्वासित जीवन बिताया है लेकिन अमेरिका और इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू से उनके नज़दीकी रिश्तों के कारण उनको ईरान में कितनी गंभीरता से लिया जाएगा इस पर कई सवाल उठे हैं.
अगर वह कभी अमेरिका की मदद से सत्ता में वापस लौटते भी हैं तो उनको भी उसी राजनीतिक वैधता की समस्या का सामना करना पड़ेगा जिसका सामना उनके पिता ने किया था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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