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चार मार्च, बुधवार को अमेरिका ने एक वीडियो जारी किया और बताया कि उसकी एक पनडुब्बी ने हिन्द महासागर में ईरान के एक युद्धपोत पर हमला किया और उसे डुबो दिया.
बीबीसी सिंहला को दी गई आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ यह हमला बुधवार को दक्षिण श्रीलंका के शहर गॉल के पास सुबह क़रीब पांच बजे हुआ.
श्रीलंका की सरकार ने बताया कि अब तक 32 क्रू मेंबर्स को बचा लिया गया है और उनका इलाज चल रहा है, वहीं और 84 शव पाए गए हैं और बाकियों के लिए तलाश जारी है.
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची के मुताबिक़ इस जहाज़ का नाम था ‘देना’ जिस पर लगभग 130 क्रू मेंबर्स सवार थे. उन्होंने यह भी बताया कि यह जहाज़ भारतीय नौसेना के न्यौते पर आया था और इसे बिना किसी वॉर्निंग के डुबो दिया गया.
इस ख़बर के आने के बाद कई सवाल उठे हैं जैसे कि यह हमला ईरान से इतनी दूर क्यों किया गया?
क्या यह हमला वैध है?
क्या इसका मतलब यह लड़ाई अब भारत के और क़रीब आ रही है?
इसको लेकर भारत क्या कर सकता था?
ईरान के इस युद्धपोत की सुरक्षा क्या किसी तरह भारत की ज़िम्मेदारी थी?
हमले के बारे में हम क्या जानते हैं?
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अमेरिका ने कहा कि ईरानी युद्धपोत को डुबोने में उसने अपने मार्क 48 टॉरपीडो का इस्तेमाल किया.
टॉरपीडो पानी के अंदर एक मिसाइल की तरह ही काम करता है और इसे दुश्मन की पनडुब्बी या जहाज़ पर हमले के लिए इस्तेमाल किया जाता है. टॉरपीडो को पनडुब्बी या युद्धपोत या विमान से भी फ़ायर किया जा सकता है.
अमेरिका की नौसेना के मुताबिक़ उनकी सभी पनडुब्बियों पर यह मार्क 48 टॉरपीडो मौजूद है. यूएस नेवी इस टॉरपीडो का पिछले तीन दशकों से इस्तेमाल करती आई है और इस टॉरपीडो के नए वर्ज़न का वज़न लगभग 1700 किलोग्राम है.
यह हमला ईरान से इतनी दूर क्यों किया गया?
इस सवाल का जवाब दो मार्च को पेंटागन में एक ब्रीफिंग के दौरान अमेरिका के एयर फोर्स जनरल दान केन ने दिया था, “पूरे क्षेत्र और दुनिया भर में हमारे अभियान जारी रहेंगे.”
यह शब्द अमेरिका की नीयत को साफ़ तौर पर बताते हैं.
क्या यह हमला वैध था?
बीबीसी सिंहला की रिपोर्ट के मुताबिक़ श्रीलंका की सरकार ने देश की संसद में बताया कि यह युद्धपोत जहां डुबोया गया वह जगह दक्षिण श्रीलंका के गॉल हार्बर से लगभग 19 नॉटिकल माइल्स या 35 किलोमीटर दूर थी.
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राहुल नारीचनिया सीनियर एडवोकेट हैं जो समुद्री और अंतरराष्ट्रीय व्यापार क़ानून के विशेषज्ञ भी हैं.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “किसी भी देश के तट से 12 नॉटिकल माइल्स तक का इलाक़ा ‘प्रादेशिक जल’ कहलाता है. इसका मतलब है कि वहां होने वाली कोई भी घटना ऐसे मानी जाती है जैसे वह ज़मीन पर हुई हो, और क़ानूनी नियम भी वैसे ही लागू होते हैं. इसके आगे, 200 नॉटिकल माइल्स तक का क्षेत्र ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ होता है. यहां देश को कुछ व्यावसायिक अधिकार मिलते हैं, जैसे तेल-गैस, मछली पकड़ने आदि पर अधिकार- लेकिन यह क्षेत्र प्रादेशिक जल जैसा नहीं होता.”
“अब, अगर यह घटना श्रीलंका के उस ज़ोन में हुई है तो उसे इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने का पूरा हक़ है. जैसे, अगर इस जहाज़ के डूबने से तेल फैलने का ख़तरा हो, या दूसरे जहाज़ों के लिए रास्ते में रुकावट पैदा हो, या किसी तरह से श्रीलंका के व्यावसायिक हित प्रभावित हों, तो श्रीलंका इसका विरोध कर सकता है.”
भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी रियर एडमिरल सुधीर पिल्लै कहते हैं, “एक ये सवाल भी है कि क्या अमेरिका और इसराइल का जंग शुरू करना क़ानूनी दायरे में था या नहीं. लेकिन लड़ाई के दौरान खुले समुद्र में चल रहे संघर्ष के बीच अमेरिका के दुश्मन देश यानी ईरान का युद्धपोत एक वैध सैन्य लक्ष्य माना जाएगा.”
जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि आप भारत में इस लड़ाई को कहां से देख रहे हो.
अमेरिका के रक्षा मंत्रालय के एक नक्शे के मुताबिक और चार मार्च को अपनी ब्रीफ़िंग में अमेरिका के एयर फ़ोर्स जनरल दान केन के मुताबिक यूएसएस अब्राहम लिंकन अरब सागर में तैनात रहा है. यह युद्धपोत विश्व के सबसे बड़े एयरक्राफ्ट कैरीअर युद्धपोतों में से एक है.
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हालांकि यह समझना ज़रूरी है कि भारत ने इस संदर्भ में एक बयान जारी करके बताया कि उसने यूएस नेवी को अपने बंदरगाहों का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी है.
अमेरिका ने यह भी कहा है कि फ़रवरी की शुरुवात से ही वह ईरान के आस-पास के इलाक़ों में अपनी सैन्य ताक़त को बढ़ाने के काम में जुटा था.
एयर फोर्स जनरल केन ने कहा था, “इस तैनाती में सभी सैन्य शाखाओं के हज़ारों सैनिक, सैकड़ों उन्नत लड़ाकू विमान, कई ईंधन भरने वाले टैंकर, लिन्कन और फोर्ड विमानवाहक पोत समूह और उनके हवाई दस्ते शामिल थे. इनके लिए लगातार ईंधन, गोला बारूद और सामान भेजा गया, और इन सबको कमान, नियंत्रण, ख़ुफ़िया, निगरानी और जासूसी नेटवर्क का समर्थन मिला.”
भारत के पश्चिम तट से लगे अरब सागर में भी अमेरिकी युद्धपोतों की तैनाती नज़र आई.
जिन विशेषज्ञों से हमने बात की उनका कहना था कि हमलों और जवाबी हमलों का यह सिलसिला पहले दिन से यानी 28 फ़रवरी से ही देखा गया है जब ईरान ने इसराइल और अमेरिका के अलावा खाड़ी के कई देशों को भी निशाना बनाया था. श्रीलंका के पास जो हुआ उसे उसी संदर्भ में देखना चाहिए.
यह भी समझना ज़रूरी है कि इस हमले के बारे में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने चेतावनी दी है और कहा है कि अमेरिका अपने लिए हुए क़दम पर पछतावा करेगा. यानी देखना होगा कि आगे क्या होता है.
भारत क्या कर सकता था?
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भारतीय नौसेना ने 5 मार्च को एक बयान जारी करके बताया कि ईरान के युद्धपोत पर हमले के बाद श्रीलंका के साथ उसने भी मदद के लिए कई क़दम उठाए थे.
एडमिरल सुधीर पिल्लै मानते हैं कि इन हालात में, भारत उस जहाज़ को हमले से बचाने के लिए क़ानूनी तौर पर शायद ही कुछ कर सकता था क्योंकि ऐसा करने से भारत ख़ुद ही इस संघर्ष में शामिल माना जाता.
“अगर वह जहाज़ भारतीय क्षेत्रीय जलक्षेत्र में होता या किसी भारतीय बंदरगाह पर होता, तो उसे भारत की न्यूट्रल स्थिति के कारण सुरक्षा मिलती, और किसी भी लड़ाकू पक्ष को वहां हमला करने की अनुमति नहीं होती.”
“लेकिन जब जहाज़ न हमारे जलक्षेत्र में है और न हमारे बंदरगाह में, तो नौसैनिक युद्ध के नियमों के अनुसार लड़ाई में शामिल देश उसे वैध सैन्य लक्ष्य मान सकते हैं. अगर भारत उस जहाज़ को सुरक्षा देने के लिए अपने युद्धपोतों के साथ एस्कॉर्ट करता, तो इसे भारत संघर्ष में एक पक्ष लेने के रूप में देखा जा सकता था.”
जिन विशेषज्ञों से हमने बात की उनका कहना था कि भारत में हुई मिलिट्री एक्सरसाइज़ के बाद युद्धपोत की सुरक्षा उसके देश की और ख़ुद की ज़िम्मेदारी है.
डिप्लोमेटिक लेवल पर भारत बातचीत के समर्थन में है और संघर्ष को ख़त्म होते देखना चाहता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
SOURCE : BBC NEWS



