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6 घंटे पहले
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मंगलवार, 21 अप्रैल को ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि ईरान पाकिस्तान में अमेरिका के साथ शांति वार्ता में शामिल होने पर विचार कर रहा है.
वहीं ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) से जुड़ी फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक़, मेजर जनरल अब्दुल्लाही ने फ़ारसी भाषा में लिखा, “आईआरजीसी ने इसराइल और अमेरिका को थका दिया है, जिससे उन्हें मजबूर होकर युद्धविराम की मांग करनी पड़ी है.”
उसके थोड़ी देर पहले ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने कहा कि ईरान, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों के बीच बातचीत को स्वीकार नहीं करेगा.
सोमवार को ही ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि ईरान ने अभी तक अमेरिका के साथ बातचीत में शामिल होने का कोई फ़ैसला नहीं किया है.
वहीं राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने सोमवार को कहा कि अमेरिका के साथ तनाव कम करने के लिए हर कूटनीतिक रास्ता देखा जाना चाहिए. हालांकि उन्होंने ये ज़रूर कहा कि अमेरिका की हालिया कार्रवाई से उस पर अविश्वास बढ़ा है.
विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने भी थोड़ा सा नरम रवैया अख़्तियार करते हुए कहा था कि अमेरिका के साथ संबंधों को लेकर ईरान “सभी पहलुओं की समीक्षा करेगा और आगे की रणनीति पर फ़ैसला करेगा.”
अलग-अलग बयान
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सोमवार को ही ईरानी सांसद इब्राहिम अज़ीजी ने कहा है कि ईरान अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखेगा. लेकिन उन्होंने कहा कि ईरान की अपनी सीमाएं हैं, जिनका सम्मान होना ज़रूरी है.
यानी अमेरिका से ही बातचीत के मसले पर 24 घंटे के अंदर इतने सारे अलग-अलग बयान.
इससे साफ़ नहीं हो पा रहा है कि ईरान मौजूदा बातचीत में अमेरिका के साथ आगे बढ़ना चाहता है या नहीं. इस्लामाबाद में 11 अप्रैल को दोनों पक्षों के बीच पहले दौर की बातचीत हुई.
उससे पहले दोनों पक्ष दो सप्ताह के सीज़फ़ायर के लिए राज़ी हुए जिसके ख़त्म होने में बस एक दिन बचा है और पता नहीं चल पा रहा है कि ईरान में आख़िर फ़ैसले कौन ले रहा है?
डोनाल्ड ट्रंप ईरान को धमकी देने के साथ-साथ बीच-बीच में ये भी कहते जा रहे हैं कि ईरान के नए नेता पुराने नेताओं की तरह कट्टरपंथी नहीं हैं. उनसे बेहतर बात होने की संभावना है.
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कौन ले रहा है फ़ैसले?
ट्रंप ने सोमवार को कहा कि अगर ईरान के नए नेता समझदार निकले, तो ईरान का भविष्य बहुत ही उज्ज्वल और समृद्ध हो सकता है.
लेकिन वो कौन से नेता हैं, उनका क्या नाम है ये ट्रंप ने एक बार भी साफ़ नहीं किया.
कभी लगता है कि ईरान की अमेरिका के साथ शांति प्रक्रिया पटरी पर है तो कभी हालात डांवाडोल नज़र आते हैं.
इससे सबसे बड़ा सवाल यही उठ खड़ा हुआ है कि अमेरिका की ईरान में किससे बात चल रही है, पीस टॉक समेत होर्मुज़ को खोलने या बंद करने के फ़ैसले आख़िर कौन ले रहा है. राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान, विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची, ईरानी संसद के स्पीकर बग़र ग़ालिबाफ़ या फिर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी).
ईरानी मामलों के जानकार सईद गोलकर ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा कि ईरान में इस वक़्त एक ऐसी केंद्रीय शख़्सियत की कमी है जो पूरे देश को जोड़कर रख सके. इसी वजह से वहां कन्फ़्यूज़न की स्थिति है.
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क्या आईआरजीसी है सबसे ताक़तवर?
शुक्रवार 17 अप्रैल को ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि युद्धविराम की बाक़ी बची अवधि के लिए स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से सभी वाणिज्यिक जहाज़ों के लिए आवागमन पूरी तरह से खोल दिया गया है.
लेकिन उसके कुछ घंटों बाद ख़बर आई कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने कहा कि जब तक अमेरिका की नाकाबंदी जारी रहती है तब तक वो होर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण नहीं छोड़ेगा.
फिर अगले ही दिन, शनिवार 18 अप्रैल को ख़बर आई कि भारत के झंडे लगे दो जहाज़ों पर गोलीबारी हुई. आईआरजीसी नौसेना ने होर्मुज़ स्ट्रेट के पश्चिम में सफ़र के दौरान दो भारतीय जहाज़ों को होर्मुज़ स्ट्रेट से पीछे हटने के लिए मजबूर किया था.
इससे साफ़ पता चला कि अराग़ची के बयान के उलट होर्मुज़ को ईरान ने खोला नहीं बल्कि उस पर अब भी उसका नियंत्रण है.
आईआरजीसी ने साफ़ कहा कि वो फ़ैसला करेगा कि कौन होर्मुज़ को क्रॉस करे.
विदेश मामलों के जानकार हर्ष पंत ने बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा से बातचीत में कहा, “मुझे ऐसा लग रहा है कि ईरान की सरकार और आईआरजीसी के बीच भी कुछ मतभेद हैं. आईआरजीसी अपना प्रभुत्व जताना चाह रही है और वास्तविकता यह है कि आईआरजीसी ही कंट्रोल में है, ईरान में अभी आईआरजीसी के ऊपर किसी का कंट्रोल नहीं है.”
बीबीसी से ख़ास बातचीत में अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार स्मिता शर्मा कहती हैं कि अब्बास अराग़ची जैसे इक्का-दुक्का लोग ही ईरान में बचे हुए हैं, जो इस वक़्त अमेरिका और वेस्टर्न वर्ल्ड से बातचीत कर सकते हैं, लेकिन उन्हें भी ईरान के अंदर अलग-थलग करने की कोशिशें चल रही हैं.
वो कहती हैं, “अराग़ची को ईरान में अपमानित किया जा रहा है. आईआरजीसी के वीडियो क्लिप्स में उनका मज़ाक बनाया जा रहा है.”
ग़ालिबाफ़ का रोल
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इस्लामाबाद में पहले दौर की बातचीत से पहले भी ईरान ने पहले संकेत दिए कि बातचीत मुश्किल है. फिर बात हुई. बातचीत के बाद संसद के स्पीकर ग़ालिबाफ़ ने कहा कि बातचीत में गैप है.
इसके पहले भी 23 मार्च को द गार्डियन के मुताबिक़ मिस्र की मध्यस्थता में ट्रंप के विशेष दूत, स्टीव विटकॉफ़ और अब्बास अराग़ची के बीच बैकचैनल के ज़रिए बात हुई थी, जिसे पहले मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने नकारा था और कहा था कि अमेरिका भरोसा करने लायक नहीं है.
जबकि अराग़ची ने सभी पहलुओं की समीक्षा करने वाली बात कही थी.
एक मार्च को ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के एक दिन बाद ग़ालिबाफ़ ने कहा था, “उन्होंने (अमेरिका और इसराइल) रेड लाइन क्रॉस की है और उन्हें इसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी.”
उन्होंने स्टेट मीडिया में कहा था कि “हम बेहद घातक हमले करेंगे.” उन्होंने ट्रंप और नेतन्याहू को ‘अपराधी’ कहा था.
और इस बयान के छह सप्ताह बाद, 11 अप्रैल को वही ग़ालिबाफ़ इस्लामाबाद में अमेरिका से बातचीत में ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे थे. ये दोनों देशों के बीच 1979 के बाद पहली उच्च स्तरीय बातचीत थी.
ग़ालिबाफ़ अमेरिका से बातचीत का ईरानी चेहरा बनकर उभरे हैं लेकिन साथ ही वो अमेरिका के ख़िलाफ़ सख़्त रवैया अपनाए हुए हैं. ऐसे में भी असमंजस की स्थिति बन रही है और पीस टॉक के कामयाब होने को लेकर कई विशेषज्ञ आशंका जता रहे हैं.
क्या शांति वार्ता से ईरान के कट्टरपंथी हैं नाराज़?
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जब अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में शांति वार्ता के पहले दौर की बातचीत का फ़ैसला हुआ था तो कट्टरपंथी गुट इससे ख़ुश नहीं हुआ. वे इस बात से ज़्यादा उत्साहित तब हुए थे जब ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद कर दिया था और मिसाइलों और ड्रोन के ज़रिए खाड़ी देशों में भारी तबाही मचाने की क्षमता दिखाई थी.
उनका मानना था कि ईरान को युद्ध जारी रखना चाहिए था, क्योंकि अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ उसकी स्थिति मज़बूत थी. तेहरान से आई रिपोर्टों के मुताबिक़, युद्धविराम समझौते की घोषणा के बाद उन्होंने सड़कों पर अमेरिकी और इसराइली झंडे जलाए थे.
तब इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के नियंत्रण वाली बसीज मिलिशिया के कुछ लोग आधी रात को इस फ़ैसले का विरोध करने के लिए विदेश मंत्रालय तक मार्च करते हुए पहुंचे थे.
साफ़ है कि तब भी आईआरजीसी और ईरानी सरकार का रुख़ बिलकुल अलग-अलग था.
स्मिता शर्मा कहती हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के लगातार बदलते बयानों से ईरान में कट्टरपंथी ताक़तों को मज़बूत होने का मौक़ा मिल रहा है क्योंकि वो फिर ईरान की जनता को ये दिखाने में कामयाब रहते हैं कि अमेरिका भरोसे के क़ाबिल नहीं है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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SOURCE : BBC NEWS























